January 21, 2021

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राजा आगरिया भील 

राजा आगरिया भील - आगर मालवा के संस्थापक । 

आगर (Agar) भारत के मध्य प्रदेश राज्य के आगर मालवा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह उस ज़िले का मुख्यालय भी है।आगर की स्थापना राजा आगरिया भील ने 23 फरवरी को लगभग 2072 वर्ष पहले आगर की स्थापना करी थी( पुरानी तारीख को वर्तमान में बदलकर ) । राजा आगरिय भील के समय आगर का स्वर्णिम इतिहास था , यह क्षेत्र हर प्रकार से विकसित था।
राजा आशा भील
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राजा आशा भील उर्फ आशा पल्ली आशावल के राजा थे । राजा आशा भील का साम्राज्य अशावल के साबरमती से लेकर कच्छ क्षेत्र तक फैला हुआ था , वे एक बड़े राज्य के राजा थे । इतिहासकारों के मुताबिक राजा आशा भील सोलंकी वंश के राजा करनदेव‌ द्वारा हराए गए थे। , लेकिन यह स्पष्ट नहीं है , दर्शल राजा आशा भील के बारे में इतिहासकारों के दो मत है , मुस्लिम इतिहासकारों का मानना है कि राजा आशा भील ने अहमद शाह के विरूद्ध युद्ध किया जिनमें वीरगति को प्राप्त हुए , तो वहीं हिन्दू इतिहासकारों के मुताबिक राजा आशा भील और कर्णदेव के मध्य युद्ध हुआ , और कर्णदेव ने अशावल जीत लिया ।
इतिहास

राजा आशा भील , आशावल अहमदाबाद के शासक थे , उन्होंने अपने क्षेत्र में मुलभू सुविधाएं उपलब्ध करवाए , उनका समय 11 वी शताब्दी का था , उस दौरान उन्होंने अहमदाबाद में उद्योगों की नींव रखी , उन्होंने सड़कों का निर्माण करवाया , पेयजल व्यवस्था बनाई और इस प्रकार उन्होंने अहमदाबाद में विकास का आधार रखा ।

अलग - अलग इतिहासकारों की किताबों से अलग - अलग जानकारी प्राप्त होती है , मुस्लिम इतिहासकारों के मुताबिक राजा आशा भील अहमद शाह से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए , तो अन्य इतिहासकारों के अनुसार कर्णदेव से युद्ध करते हुए राजा आशा भील वीरगति को प्राप्त हुए ।
अबली मीणी 
अबली मीणी Ka Itihas

वो खूबसूरती की मिसाल थी, ऐसी सुंदरता महाराव मुकुंदसिंह ने पहले कभी नहीं देखी थी। साथ ही वीरांगना ऐसी कि जिसने भी वह दृश्य देखा तो आश्चर्य चकित रह गया। राजा मोहित हुआ उस सुंदर वीरांगना अबली पर और इतिहास ने उस प्रेम कथा को अपने में समेट लिया।
नेशनल हाईवे संख्या-12 पर कोटा-झालावाड़ के बीच दरा के सुरम्य जंगल में इस अमिट प्रेम कहानी का प्रतीक अबली मीणी का महल आज भी उन यादों को अपने में जीवित बनाए हुए है। दोनों के प्रेम के चर्चे हाड़ौती के गांवों की चौपालों पर यदाकदा सुनाई देते रहते हैं। इसका उल्लेख इतिहासकार जनरल सर कनिंघम ने भी अपनी किताब “रिपोर्ट ऑफ इंडियन आर्कियोलोजिकल सर्वे” में किया है। इस किताब के अनुसार कोटा के महाराव मुकुंदसिंह ने अपनी प्रेयसी अबली मीणी के लिए दरा के सुरम्य जंगल में इस महल का निर्माण करवाया था। मुकुंदसिंह कोटा के संस्थापक माधोसिंह के पुत्र थे।

इस तरह हुए थे महाराजा मोहित

उन्होंने सन् 1649 से 1657 तक शासन किया था। मुकुंदसिंह अक्सर दरा के जंगल में शिकार खेलने आया करते थे। एक बार जब वे यहां शिकार खेलने आए तो उन्होंने जंगल के बीच सुंदर महिला को देखा। जिसके सिर पर पानी से भरे दो घड़े रखे थे और वह लड़ते हुए दो सांडों के सिंग अपने हाथों से पकड़कर अलग कर रही थी। राजा मुकुंद न केवल इस दृश्य को देख कर चकित रह गए और उस सुंदर महिला पर मोहित हो गए। यह वीरांगना ही खैराबाद की अबली मीणा थी। अबली पर मोहित राव मुकुंद उसे हर कीमत पर पाना चाहते थे और उन्होंने अबली के समक्ष प्रेम का प्रस्ताव रखा। अबली ने भी मुकुंद के प्रेम को स्वीकार कर लिया। साथ ही अबली ने यह शर्त रखी कि उसके लिए उसी स्थान पर महल बनाया जाए, जहां वो पहली बार मिले थे। वहीं महल में रोज रात को एक दीपक ऐसे स्थान पर जलाया जाए, कि उस दीपक की रोशनी अबली के गांव खैराबाद तक दिखे। राव मुकुंद ने अबली की शर्त के अनुसार दरा के जंगल में ही इस महल का निर्माण करवाया। जिसे आज भी अबली के नाम पर अबली मीणी के महल के रूप में जाना जाता है।

यादगार इमारत....राहगीरों को आज भी आकर्षिक करता है महल

ऐसा है अबली मीणी का महल

इतिहासकार ललित शर्मा बताते हैं कि अबली मीणा का महल पहाड़ पर बना दो मंजिला महल है। जिसमें नीचे आमने-सामने दो चौबारे हैं। दोनों चौबारों के बीच में एक तिबारी है। महल में स्नान आदि के लिए एक चौकोर कुंड भी बनाया गया था। तथा शेष स्थान पर दास-दासियों के लिए मकान बनाए गए थे। महल की सुरक्षा के लिए ऊंची चारदीवारी बनाई गई थी। यह अबली मीणी का महल आज भी इधर से गुजरने वाले राहगीरों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। कुछ समय पूर्व ही इस महल का जीर्णोद्धार कराया गया है।

खुद के नाम से बसाया मुकुंदरा गांव

मुकुंद ने स्वयं के नाम पर भी यहां मुकुंदरा नाम से गांव बसाया था, जिसे वर्तमान में हम दरा गांव के नाम से जानते हैं। राव मुकुंद की 1657 में उज्जैन के पास धर्मद स्थान पर युद्ध में मृत्यु हो गई। इसके बाद कोटा में अंतिम संस्कार किया गया। वहीं अबली भी अन्य रानियों व खवासिनों के साथ सती हो गई। आज राव मुकुंद व अबली दोनों नहीं हैं, लेकिन उनके प्रेम की दास्तान को यह महल आज भी बयां करता है। महल में वो स्थान अभी भी मौजूद है, जहां प्रतिदिन रात को दीपक जलाया जाता था। इस महल में दीपक जलाने की परंपरा अबली के निधन के बाद भी कई वर्षों तक अनवरत रूप से जारी रही थी।

शादीशुदा थी अबली, पति को मिली थी जागीर

बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि अबली शादीशुदा थी। एक रात को अबली के पति ने राव मुकुंद पर छुर्रे से जानलेवा हमला कर दिया था। जिसे सुरक्षाकर्मियों ने नाकाम कर दिया। राव मुकुंद ने अबली के पति को खुश करने के लिए उसे दरा घाटी की जागीर दे दी। साथ ही यह हक भी दिया कि जो भी इस मार्ग से गुजरे, उससे अबली का पति शुल्क वसूल करे। उस समय हाडौती-मालवा को जोड़ने के लिए यही एक मात्र मार्ग था।(https://www.gkexams.com/ask/1157-Ka-Itihas)
राजा भानु भील
मध्यप्रदेश और और राजस्थान की सीमा से लगा हुआ भानपुरा मंदसौर जिले में स्थित है भानपुरा की स्थापना राजा भानु भील जी ने करी थी भानु भील और राणा भील दोनों सगे भाई थे राम भील या राणा भील ने रामपुरा बसाया इस क्षेत्र पर मेवाड़ शासकों ने भी राज किया ऐतिहासिक दृष्टि से भानपुरा बेहद ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है यहां पर कई वीर योद्धाओं ने जन्म लिया और भानपुरा को वीर योद्धाओं की भूमि बनाई ।
राजा भाभरदेव
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प्रतापगढ़
Pratapgarh
प्रतापगढ़ में नया कलेक्ट्रेट भवन: हे. शे.

प्रतापगढ़
राजस्थान में स्थिति
देश  भारत
जनसंख्या (2011)
• कुल 42,079
भाषा
• प्रचलित राजस्थानीहिन्दी
दूरभाष कोड 01478
वेबसाइट pratapgarh.rajasthan.gov.in

प्रतापगढ़ (Pratapgarh) भारत के राजस्थान राज्य के प्रतापगढ़ ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है।

विवरण

प्राकृतिक संपदा का धनी कभी इसे 'कान्ठल प्रदेश' कहा गया। प्रतापगढ़ में 1531 तक भील शासकों का शासन था अंतिम भील राजा भाभरदेव थे [3]। यह नया जिला अपने कुछ प्राचीन और पौराणिक सन्दर्भों से जुड़े स्थानों के लिए दर्शनीय है, यद्यपि इसके सुविचारित विकास के लिए वन विभाग और पर्यटन विभाग कोई बहुत उल्लेखनीय योगदान अब तक नहीं किया है।

अवस्थिति

राजस्थान के दक्षिणी हिस्से में उदयपुर सम्भाग में यह जिला २४°.०२' उत्तर और ७४°.४६' पूर्व के बीच अवस्थित है। संभाग मुख्यालय उदयपुर से यह 179 किलोमीटर या 111 मील दूर है|

भूगोल

प्रतापगढ़ जिला समुद्र तल से औसतन १६१० फीट या ५८० मीटर की ऊँचाई पर बसा है और कहा यह जाता है कि ऊँचाई की दृष्टि से राजस्थान में माउन्ट आबू के बाद सर्वाधिक ऊँचाई वाला यही जिला है। न यहां-पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जैसा दहकता हुआ रेगिस्तान है, न चूरु जैसे शहरों सी कड़ाके की ठंड! स्थानीय जलवायु मनभावन समशीतोष्ण है। पुराने प्रतापगढ़ राज्य के उत्तर में ग्वालियरदक्षिण में रतलामपश्चिम में मेवाड़ (उदयपुर) और बांसवाड़ापूर्व में जावरामन्दसौर और नीमच के राज्य और जिले थे।

भारतीय उपमहाद्वीप की सर्वाधिक प्राचीन पर्वतमाला अरावली और मालवा के पठार की संधि पर अवस्थित राजस्थान के इस जिले के भूगोल में अरावली और मालवा दोनों की ही भौगोलिक-विशेषताएँ एक साथ पहचानी जा सकती हैं।

पुराने दस्तावेजों के अनुसार जाखम, शिव, एरा, रेतम और करमोई मुख्य नदियाँ थीं। ३० ग्रामीण तालाबों के अलावा यहाँ ‘तेजसागर’ नामक प्रमुख तालाब था।[6] जाखममही और सिवाना यहाँ की तीन मुख्य नदियाँ हैं, छोटी-छोटी बरसाती नदियों के अलावा अन्य नदियों में सोम, एरा और करमोई नामक नदियाँ भी हैं, जो प्रायः ग्रीष्मकाल में सूख जाती हैं, पर पड़ौसी जिले बांसवाड़ा के विख्यात माही बांध में प्रतापगढ़ जिले की कई नदियों और प्राकृतिक जलधाराओं का पानी शामिल होता है।

जिले की औसत वार्षिक-वर्षा ८५६ से ९०० मिलीमीटर है, पर हर वर्ष इसमें हर बरस थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव देखे जाते रहे हैं। (उदाहरण के लिए २०१० में जिले की वर्षा का सालाना औसत ७९९ मिलीमीटर ही रहा था। भौगोलिक इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें- तो सन १८९३ में यहाँ ६४ इंच बारिश हुई थी, तो सन १८९९ में महज़ ११ इंच!) चित्तौडगढ़ के जिला गजेटियर के अनुसार "५ सितम्बर १९५५ को २४ घंटों के दौरान २७९.९ मिलीमीटर वर्षा का रिकॉर्ड प्रतापगढ़ के मौसम विभाग में दर्ज है".

यहाँ भूमि आम तौर पर उर्वरक काली मिट्टी (Black Cotton Soil) है, जो ज्वालामुखी-लावा से निर्मित है। जुलाई २०११ में प्रतापगढ़ के एक गंभीर शोधकर्ता मदन वैष्णव ने यह दावा किया था कि उन्होंने प्रतापगढ़ में लगभग २,५०० साल पहले हुए एक ज्वालामुखी विस्फोट के ठोस सूत्र ढूंढे हैं, "जिसके लावे की वजह से ही बहुत सारे गांवों की मिट्टी (भूमि) काली और लाल है।"

प्राचीन भू-अभिलेख दस्तावेजों के आधार पर इस जिले में खेती की भूमि किस्में 'सिंचित', 'असिंचित-काली-भूमि, 'धामनी', 'कंकरोट', 'अडान' और 'बंजर-काली' थीं।

छोटी सादडी के अलावा प्रतापगढ़ के बाकी चार उपखंड- प्रतापगढ़, अरनोदपीपलखूंट और धरियावद 'वन-क्षेत्र' के अंतर्गत आरक्षित हैं, इसलिए जिले में बड़े या मध्यम-श्रेणी के उद्योगों को शुरू करने की संभावनाएं बहुत कम हैं। 'राजस्थान इंडस्ट्रीज़ एंड इन्वेस्टमेंट कोर्पोरेशन (रीको) ने (प्रतापगढ़ शहर में) एक अलग औद्योगिक-क्षेत्र विकसित किया ज़रूर है, पर कल-कारखाने लगाने के इच्छुक उद्योगपतियों के अभाव में ये आज भी सुनसान पड़ा हुआ भूखंड है।

खनन-कार्य की यहाँ इसीलिए अनुमति नहीं है कि जिले का ज़्यादातर हिस्सा वन श्रेणी में वर्गीकृत है, हालाँकि [छोटी सादडी]] के अलावा प्रतापगढ़ और धरियावद तहसील के चुनिन्दा भागों में केल्साइट, डोलोमाइट, रेड ऑकर, सोप स्टोन, क्वार्ट्ज़, फेल्सपर आदि का खनिज-उत्खनन होता है। यहाँ (कम मात्रा में) संगमरमर, इमारती-पत्थर, चूना-पत्थर (लाइम-स्टोन) आदि के कुछ भंडार भी हैं।

खनि-अभियंता कार्यालय, प्रतापगढ़ से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार "धरियावद में ७५, छोटी साद्डी में ३० और प्रतापगढ़ में १० खानों को अनुज्ञापत्र दिए गए हैं, जिनके द्वारा क्रमशः ११७५ हेक्टेयर, १०९८ हेक्टेयर और ११ हेक्टेयर में संगमरमर, फेल्सपर, रेड-ऑकर और अन्य खनिज निकाले जा रहे हैं।"

प्रतापगढ़ जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल ४,११,७३६ हेक्टयर है, जिसमें से १,२०,९७६ हेक्टयर भाग सघन वनों से आच्छादित भूभाग है।  यह राज्य के वन-औसत से कहीं अधिक है। 

ऐतिहासिक दस्तावेज़ बतलाते हैं कि १८८१ में 'परताबगढ़' की जनसँख्या ७९,५६९ हुआ करती थी। यह आबादी १९५१ की जनगणना में १,१०,५३० अंकित है! २००१ की जनगणना के आंकड़ों की बात करें तो प्रतापगढ़ की जनसँख्या २,०६,९६५ थी, अरनोद की १,१२,०७२, धरियावद की १,५२,६५५, पीपल खूंट की- १,१८,४३९ और छोटी सादडी की आबादी १,१६,६७६ अंकित की गयी थी। भारत की जनगणना २०११ के आरंभिक आंकड़ों के अनुसार प्रतापगढ़ जिले की कुल आबादी ८,६८,२३१ है, जिसमें से ४,३७,९४१ पुरुष और ४,३०,२८१ स्त्रियां हैं, जब कि २००१ की गत जनगणना में यहां ७,०६,७०७ लोगों की गिनती की गयी थी। जैसलमेर जिले के बाद राज्य की सबसे कम आबादी वाला जिला प्रतापगढ़ दर्ज हुआ है।
भील
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भील

कुल जनसंख्या

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अन्य सम्बंधित समूह


भील मध्य भारत की एक जनजाति का नाम है। भील जनजाति भारत की सर्वाधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई जनजाति है। प्राचीन समय में यह लोग मिश्र से लेकर लंका तक फैले हुए थे । भील जनजाति के लोग भील भाषा बोलते है। भील जनजाति को " भारत का बहादुर धनुष पुरुष " कहा जाता है[8]भारत के प्राचीनतम जनसमूहों में से एक भीलों की गणना पुरातन काल में राजवंशों में की जाती थी, जो विहिल वंश के नाम से प्रसिद्ध था। इस वंश का शासन पहाड़ी इलाकों में था ।भील शासकों का शासन मुख्यत मालवा ,दक्षिण राजस्थान,गुजरात ,ओडिशा और महाराष्ट्र में था । भील गुजरातमध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़महाराष्ट्र और राजस्थान में एक अनुसूचित जनजाति है। अजमेर में ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के खादिम भी भील पूर्वजों के वंशज हैं। भील त्रिपुरा और पाकिस्तान के सिन्ध के थारपरकर जिले में भी बसे हुये हैं। भील जनजाति भारत समेत पाकिस्तान तक विस्तृत रूप से फैली हुई है। प्राचीन समय में भील जनजाति का शासन शिवी जनपद जिसे वर्तमान में मेवाड़ कहते है , स्थापित था , जब सिकंदर ने मिनांडर के जरिए भारत पर आक्रमण किया तब पंजाब और शिवी जनपद के भील शासकों ने विश्वविजेता सिकंदर को भारत में प्रवेश नहीं करने दिया , सिकंदर को वापस जाना पड़ा।

राजस्थान में राणा पूंजा भील जी को याद किया जाता है , जिन्होंने महाराणा प्रताप के साथ मिलकर मुगलों के छक्के छुड़ा दिए। 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में राणा पूंजा ने अपनी सारी ताकत देश की रक्षा के लिए झोंक दी। हल्दीघाटी के युद्ध के अनिर्णित रहने में गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का ही करिश्मा था, जिसे पूंजा भील के नेतृत्व में काम में लिया गया। इस युद्ध के बाद कई वर्षों तक मुग़लों के आक्रमण को विफल करने में भीलों की शक्ति का अविस्मरणीय योगदान रहा तथा उनके वंश में जन्मे वीर नायक पूंजा भील के इस युगों-युगों तक याद रखने योग्य शौर्य के संदर्भ में ही मेवाड़ के राजचिन्ह में एक ओर राजपूत तथा एक दूसरी तरफ भील प्रतीक अपनाया गया है। यही नहीं इस भील वंशज सरदार की उपलब्धियों और योगदान की प्रमाणिकता के रहते उन्हें ‘राणा’ की पदवी महाराणा द्वारा दी गई। अब राजा पूंजा भील ‘राणा पूंजा भील’ कहलाये जाने लगे। वास्तव में वे सच्चे देश सेबक थे। मेवाड़ और मेयो कॉलेज के राज चिन्ह पर भील योद्धा का चित्र अंकित है। बहुत से भील भारत में भील रेजिमेंट चाहते हैं। । साथ ही साथ भील कई वर्षों से खुद का एक अलग राज्य भील प्रदेश की मांग कर रहे हैं ।
भील इतिहास
सिंधु घाटी सभ्यता

सिंघु घाटी सभ्यता पर हो रहे शोध के दौरान वह से भगवान शिव और नाग के पूजा करने के प्रमाण मिले है साथ ही साथ बैल ,सूअर ,मछली , गरुड़ आदि के साथ - साथ प्रकृति पूजा के प्रमाण मिले है उस आधार पर शोधकर्ताओं के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भील प्रजाति के ही थे। भील प्रजाति अपने आप में एक विस्तृत शब्द है जिसमें निषाद , शबर , किरात , पुलिंद , यक्ष , नाग और कोल आदि सम्मिलित है । इतिहासकारों ने माना कि करोड़ों वर्ष पूर्व भील प्रजाति के लोग यही पर वानर के रूप जन्मे और निरंतर विकासक्रम के बाद वे होमो सेपियन बने , धीरे - धीरे यही लोग एक जगह बस गए और गणराज्य स्थापित किया , इनके शासक हुआ करते थे , सरदार के आज्ञा के बगैर कोई कुछ नहीं कर सकता था । भील प्रजाति के लोग धनुष का उपयोग करते थे , समय के साथ उन्होंने नाव चलना सीख ली और वे हिंदेशिया की तरफ आने वाले पहले लोग थे , ये भील प्रजाति के लोग मिश्र से लेकर लंका तक फैले हुए थे , इन्होंने ही सिंधु घाटी सभ्यता बसाई , जब फारस , इराक में बाढ आई तब वह के लोग भारत की तरफ आए , यहां के मूलनिवासियों ने उनकी सहायता करी , लेकिन उन लोगो ने भारत पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया , भील प्रजाति के शासकों के साथ छल - कपट कर उन्हें धोखे से हरा दिया फिर यही भील प्रजाति के लोग धीरे - धीरे बिखर गए ।

मुद्दे

भीलो के प्रमुख मुद्दे

भील प्रदेश - भील जनजाति करीब 30 वर्षों से भी अधिक समय से भील प्रदेश राज्य बनाने के लिए आंदोलन कर रही है , भील प्रदेश काफी पुराना मामला है , पहले जन्हा जंहा भीलों का शासन था , अथवा भीलों की जनसंख्या अधिक थी वह क्षेत्र भील प्रदेश कहलाता था , लेकिन जैसे जैसे भीलों का राजपाठ छीना गया , वैसे ही भील प्रदेशों के नाम बदल दिए गए ।

भील रेजिमेंट - भील भारत देश में एक भील रेजिमेंट चाहते है ,

हल्दीघाटी राणा पूंजा : भीलों का इतिहास हल्दीघाटी से जुड़ा रहा है ,लेकिन अभी तक वहां पर्यटन स्थल विकसित नहीं हुआ , हाल ही में वहां पर्यटन विकसित करने की घोषणा की गई

सिंगाही : एक समय उत्तरप्रदेश का सिंगाही क्षेत्र भील शासकों के खेरगढ़ राज्य की राजधानी हुआ करता था , खेरगढ उस दौरान नेपाल तक फैला था , हाल ही में इस क्षेत्र से खुदाई के दौरान भील युग कालीन मूर्तियां प्राप्त हुई जो उस दौरान के भील इतिहास को बयां करती है , लेकिन सरकार उस क्षेत्र संबंधित विकास कार्य नहीं कर रही है ।
सिंधु घाटी सभ्यता - सिंधु घाटी सभ्यता पर हो रहे शोध से पता चला है कि , सिंधु घाटी सभ्यता भील और अन्य आदिवासियों की सभ्यता थी , भीलों ने हजारों वर्ष पूर्व विशाल किले , महल , घर , नहरे , कुएं और अन्य विकास कार्य कर लिए थे , लेकिन सरकार स्कूल पाठ्यक्रम में यह सब सामिल नहीं कर रही है ।

सरदार पटेल मूर्ति [ स्टैचू ऑफ यूनिटी ] - स्टैचू ऑफ यूनिटी बनाने के लिए हजारों भील और अन्य आदिवासियों की जमीन हड़पी गई , उन्हें अपने घर छोड़कर जाना पड़ा , सरकार ने नहीं आदिवासियों के लिए घर बनाए और नहीं उन्हें मुवावजे दिए ।

आदिवासी जब भी कोई मुद्दा उठाते है , उन मुद्दों को दबा दिया जाता है

आदिवासी क्षेत्र : जनहा आदिवासियों की आबादी अधिक है , उस क्षेत्र को संविधान के अनुसार , आदिवासी क्षेत्र घोषित किया जाए , ताकी मूलनिवासी लोगो का सही मायने में विकास हो सके , उनके अधिकारों की रक्षा हो सके ।
भील आन्दोलन

1632 का भील विद्रोह = 1632 के समय भारत में मुगल सत्ता स्थापित थी , उस दौरान प्रमुख रूप से भीलों ने मुघलों का विद्रोह किया ।

1643 = 1632 के बाद भील और गोंड जनजाति ने मिलकर मुगलों के खिलाफ 1643 में विद्रोह किया ।

1857 के पूर्व भीलों के दो अलग-अलग विद्रोह हुए। महाराष्ट्र के खानदेश में भील काफी संख्या में निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर में विंध्य से लेकर दक्षिण पश्चिम में सहाद्रि एवं पश्चिमी घाट क्षेत्र में भीलों की बस्तियाँ देखी जाती हैं। 1816 में पिंडारियों के दबाव से ये लोग पहाड़ियों पर विस्थापित होने को बाध्य हुए। पिंडारियों ने उनके साथ मुसलमान भीलों के सहयोग से क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। इसके अतिरिक्त सामन्ती अत्याचारों ने भी भीलों को विद्रोही बना दिया। 1818 में खानदेश पर अंग्रेजी आधिपत्य की स्थापना के साथ ही भीलों का अंग्रेजों से संघर्ष शुरू हो गया। कैप्टेन बिग्स ने उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और भीलों के पहाड़ी गाँवों की ओर जाने वाले मार्गों को अंग्रेजी सेना ने सील कर दिया, जिससे उन्हें रसद मिलना कठिन हो गया। दूसरी ओर एलफिंस्टन ने भील नेताओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया और उन्हें अनेक प्रकार की रियायतों का आश्वासन दिया। पुलिस में भर्ती होने पर अच्छे वेतन दिये जाने की घोषणा की। किंतु अधिकांश लोग अंग्रेजों के विरुद्ध बने रहे।

1819 में पुनः विद्रोह कर भीलों ने पहाड़ी चौकियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। अंग्रेजों ने भील विद्रोह को कुचलने के लिए सतमाला पहाड़ी क्षेत्र के कुछ नेताओं को पकड़ कर फाँसी दे दी। किंतु जन सामान्य की भीलों के प्रति सहानुभूति थी। इस तरह उनका दमन नहीं किया जा सका। 1820 में भील सरदार दशरथ ने कम्पनी के विरुद्ध उपद्रव शुरू कर दिया। पिण्डारी सरदार शेख दुल्ला ने इस विद्रोह में भीलों का साथ दिया। मेजर मोटिन को इस उपद्रव को दबाने के लिए नियुक्त किया गया, उसकी कठोर कार्रवाई से कुछ भील सरदारों ने आत्मसमर्पण कर दिया।

1822 में भील नेता हिरिया भील ने लूट-पाट द्वारा आतंक मचाना शुरू किया, अत: 1823 में कर्नल राबिन्सन को विद्रोह का दमन करने के लिए नियुक्त किया। उसने बस्तियों में आग लगवा दी और लोगों को पकड़-पकड़ कर क्रूरता से मारा। 1824 में मराठा सरदार त्रियंबक के भतीजे गोड़ा जी दंगलिया ने सतारा के राजा को बगलाना के भीलों के सहयोग से मराठा राज्य की पुनर्स्थापना के लिए आह्वान किया। भीलों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया एवं अंग्रेज सेना से भिड़ गये तथा कम्पनी सेना को हराकर मुरलीहर के पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया। परंतु कम्पनी की बड़ी बटालियन आने पर भीलों को पहाड़ी इलाकों में जाकर शरण लेनी पड़ी। तथापि भीलों ने हार नहीं मानी और पेडिया, बून्दी, सुतवा आदि भील सरदार अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते रहे। कहा गया है कि लेफ्टिनेंट आउट्रम, कैप्टेन रिगबी एवं ओवान्स ने समझा बुझा कर तथा भेद नीति द्वारा विद्रोह को दबाने का प्रयास किया। आउट्रम के प्रयासों से अनेक भील अंग्रेज सेना में भर्ती हो गये और कुछ शांतिपूर्वक ढंग से खेती करने लगे। उन्हें तकाबी ऋण दिलवाने का आश्वासन दिया।
निवास क्षेत्र

भील शब्द की उत्पत्ति "वील" से हुई है जिसका द्रविड़ भाषा में अर्थ होता हैं "धनुष"। भील जाति दो प्रकार से विभाजित है-

1. उजलिया/क्षत्रिय भील- उजलिया भील मूल रूप से वे क्षत्रिय है जो सामाजिक/मुगल आक्रमण के समय जंगलो में चले गए एवं मूल भीलों से वैवाहिक संबंध स्थापित कर लेने से स्वयं को उजलिया भील कहने लगे मालवा में रहने वाले भील वही है। इनके रिति रिवाज क्षत्रियों की तरह ही है। इनमें वधूमूल्य नहीं पाया जाता और ना ही ये भीली भाषा बोलते है। इनके चेहरे और शरीर की बनाबट, कद काठी प्राचीन क्षत्रियों से मिलती है।

2. लंगोट भील-ये वनों में रहने वाले मूल भील है इनके रीति रिवाज आज भी पुराने है। इनमें वधूमूल्य का प्रचलन पाया जाता है। म.प्र. के निमाड में रहने वाले अधिकांश जनजाति यही है स्वभाव से भोले होते हैं, बदले की भावना में आक्रामक भी होते हैं यह मध्यप्रदेश के झाबुआ,अलिराजपुर, धार, पेटलावाद, क्षेत्रो में निवास करतें है भील अपने पूर्वजों को पूजते है और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के राणापुर के पास बाबा देव को पूजते है।
उप-विभाग

भील कई प्रकार के कुख्यात क्षेत्रीय विभाजनों में विभाजित हैं, जिनमें कई कुलों और वंशों की संख्या है। इतिहास में भील जनजाति को कई नाम से संबोधित किया है जैसे किरात कोल शबर और पुलिंद आदि ।

भील जनजाति की उपजातियां व भील प्रजाति से संबंधित जातियां

बॉरी - यह भील जनजाति पश्चिम बंगाल , बंगाल में निवास करती है , इस जाति की उपजातियां है
बरदा -
गरासिया - गरासिया मुख्यत राजस्थान में बसते है , यह भीलों की एक शाखा है ।
ढोली भील - भील उपशाखा
डुंगरी भील -
डुंगरी गरासिया
भील ​​पटेलिया -
रावल भील -
तड़वी भील - औरंगजेब के समय लोगो को मुस्लिम बनाया गया , तडवी दरसअल भील मुखिया को कहते है , तडवी भील मुख्यता महाराष्ट्र में निवास करते है ।
भागलिया
भिलाला - भिलाला , भील आदिवासियों की उपशाखा है ।
पावरा - यह भील जनजाति की उपशाखा गुजरात में निवास करती है ।
वासरी या वासेव
वसावा - गुजरात के भीलमहाराष्ट्र

भील मावची
कोतवाल उनके मुख्य उप-समूह हैं ।
खादिम जाति - यह भील जाती राजस्थान के अजमेर में निवास करती हैं ।
उल्लेखनीय लोग
पौराणिक और धार्मिक
एकलव्य - एकलव्य एक महान धनुर्धर थे , उनके पिता श्रृंगवेरपुर के राजा थे , और वे अपने पिता के बाद राजा बने । वर्तमान में एकलव्य नाम से कई संस्थान चल रहे है , वे आधुनिक तीरंदाजी शेली के निर्माता रहे ।
संत सुरमाल दास भील - संत सुरमल जी खराड़ी , आदिवासी भील धर्म के प्रमुख गुरु थे , उनसे संबंधित एक पुस्तक प्रकाशित हुई है ।
महर्षि वाल्मीकि - महर्षि वाल्मीकि जी रामायण के रचायता है ।
गुहराजा - निषाद राज जिन्होंने राम भगवान की सहायता करी ।
माता शबरी - माता शबरी एक राजकुमारी थी , उनके पिता राजा थे , माता शबरी रामभक्त थी , राजकुमारी शबरी की शादी भील राजकुमार से हुई थी ।

क्रांतिकारी
सरदार हेमसिंह भील - बाड़मेर के सरदार पाकिस्तानी सेना से युद्ध किया ।
टंट्या भील - मराठो के हार के बाद अंग्रेजी सत्ता से संघर्ष।
नानक भील - अंग्रेजो का विरोध , शिक्षा का प्रचार किया ।
सरदार हिरीया भील - अंग्रज़ों का विरोध
मराठो ने सहयोग मांगा ।
कृशण भिल - पाकिस्तान में प्रमुख राजनेता ।
गुलाब महाराज - संत थे , अंगेजो के खिलाफ असहकर आंदोलन शुरू किया , सामाजिक कार्य किया ।
काली बाई - आधुनिक एकलव्य कहीं जाती है , शिक्षा और गुरु के लिए बलिदान दिया , अंग्रेज और महारावल का विरोध ।
भीमा नायक - 1857 के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी ।
गोविन्द गुरु - प्रमुख समाजसुधारक ।
ठक्कर बापा - आदिवासियों के मसीहा ।
मोतीलाल तेजावत - राजस्थान के प्रमुख ब्रिटिश विद्रोही ।

शिक्षा का क्षेत्र
राजेन्द्र भारूड - भील आदिवासी समाज के महाराष्ट्र में पहले आईएएस अफसर ।

कला प्रेमी
कृष्ना भील - पाकिस्तान के प्रमुख गीतकार , वे मारवाड़ी , पंजाबी और उर्दू समेत अन्य भाषओं में गीत गाते थे ।
दिवालीबेन भील - गाईका , गुजरात
लाडो भील - पिथोरा पेंटिंग ,

मध्यप्रदेश
भूरी बाई भील - पिथोरा पेंटिंग
तगाराम भील - अलघोजा वादक , राजस्थान

खेल क्षेत्र

भील राज
राजा पुरुरवा भील - राजा पुरुरवा भील पुष्कलावती देश के राजा थे , यह वर्तमान में पाकिस्तान में है । यही आगे चलकर महावीर स्वामी कहलाए ।
राजा विश्वासु भील - नीलगिरी के पहाड़ी क्षेत्र पूरी के राजा, इन्हे ही भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति प्राप्त हुई थी ।
राजा हिरण्य धनु : एक भील राजा
राजा सुबाहु - इनका शासन हिमालय क्षेत्र में था , इनकी राजधानी श्रीनगर गढ़वाल थी , इन्होंने पांडवो की सहायता करी ।
यलम्बर - यह नेपाल के भील प्रजाति के किरात राजा थे , उन्होंने नेपाल में किरात वंश की नींव रखी ।
राजा धन्ना भील 850 ईसा पूर्व मालवा के शासक थे। वे बहादुर , कुशल और शक्तिशाली राजा थे । उनके वंशजों ने 387 वर्ष मालवा पर राज किया इस दौरान मालवा का विकास हुआ ।

उन्हीं के वंश में जन्मे एक भील राजा ने 730 ईसा पूर्व के दौरान दिल्ली के शासक को चुनौती दी , इस प्रकार मालवा उस समय एक शक्ति के रूप में विद्यमान था। ।

राजकुमार विजय - यह भील प्रजाति के पूलिंद राजा थे , इनका शासन वर्तमान के बंगाल में था , उस समय भारत बंगाल एक थे , राजकुमार विजय का उल्लेख महावंश आदि इतिहास ग्रन्थों में हुआ है। परम्परा के अनुसार उनका राज्यकाल 543–505 ईसापूर्व में था , वे श्रीलंका आए , श्रीलंका में उन्होंने सिंहल और क्षत्रिय स्त्री से विवाह किया जनके फलस्वरूप वेदा जनजाति की उत्पत्ति हुए , यह जनजाति भारत से ही चलकर श्रीलंका तक पहुंची यह इतिहासकारों का मानना है ।

राजा खादिरसार भील - जैन ग्रंथों के अनुसार राजा खादिरसार मगध के राजा थे , राजा खादिरसार की पत्नी का नाम चेलमा था , प्रारंभ में राजा खादिरसार बौद्घ धर्म के अनुयाई थे , परन्तु रानी चेलामा के उपदेश से प्रभावित होकर उन्होंने जैन धर्म अपना लिया और महावीर स्वामी जी के प्रथम भक्त बन गए ।

राजा गर्दभिल्ल - उज्जैन के शासक , इनके उतराधिकारी सम्राट विक्रमादित्य हुए जिन्होंने शक शकों को पराजित किया , उनके नाम से ही कुल 14 राजाओं को विक्रमादित्य की उपाधि दी गई ।

राजा देवो भील - यह ओगाना - पनारवा के शासक थे इनका समयकाल बापा रावल के समय से मिलता है , बप्पा रावल के बुरे दिनों में इन्होंने बेहद सहायता करी , अरबों को युद्ध में खदेड़ा ।

राजा बालिय भील - यह ऊंदेरी के शासक थे और बप्पा रावल के मित्र थे , अरबों के खिलाफ इन्होंने बप्पा रावल का साथ दिया ।

राजा बांसिया भील - बांसवाड़ा के संस्थापक ।
राजा डूंगरिया भील - डूंगरपुर के संस्थापक ।
राजा कोटिया भील - कोटा के संस्थापक , अकेलगढ़ किले का निर्माण , नीलकंठ महादेव मंदिर स्थापित किया ।
राणा पूंजा - भोमट और पानारवा के शासक , महाराणा प्रताप के प्रमुख सहयोगी , हल्दीघाटी युद्ध के वीर योद्धा , जिनके पास महाराणा और अकबर के संरक्षक बेरम खा सहयोग लेने आए ।
राजा विंध्यकेतु - मां कालिका के भक्त , विंध्य के राजा।
राजा जैतसी परमार भील - आबू के शासक
राजा चक्रसेन भील - मनोहर थाना के शासक , किले का निर्माण कराया , 1675 तक शासन किया ।
राजा सोनारा भील - राजस्थान में सलूंबर के शासक ।
राजा मंडिया भील - मांडलगढ़ के शासक , मांडलगढ़ किले का निर्माण कराया ।
राजा चम्पा भील - राजा चम्पा भील ने चांपानेर की स्थापना की थी , वे 14वी शताब्दी में चांपानेर के शासक बने , उन्होंने चांपानेर किला बनवाया था ।
राजा राम भील - राजा राम भील रामपुरा के शासक थे , व एक शक्तिशाली शासक थे , उन्होंने मार्चिंग आक्रमणकारियों से युद्ध किया और इसमें उनकी गर्दन काट गई लेकिन उनका धड दुश्मन से लड़ता रहा ।
राजा आशा भील - राजा आशा भील अहमदाबाद के शासक थे , उन्होंने अहमदाबाद में उद्योगों की नींव रखी , इनके समय अहमदाबाद में नए सड़क , पेयजल स्रोतों आदि का निर्माण हुआ ।
राजा मनोहर भील - उन्होंने मनोहर थाना शहर की स्थापना करी और मनोहर थाना किला बनवाया ।
राजा पेमला भील - भोराई के शासक
सरदार उम्मेद भील - सगबारा प्रमुख
राजा मांडलिक - इडर के शासक
राजा भानु भील - भानपुरा के संस्थापक
राजा गलियाकोट - डूंगरपुर में स्थित गलियाकोट के संस्थापक ।
राजा भाभरदेव - प्रतापगढ़ के शासक 1531 ।
राजा देव भील - राजस्थान के देवलिया के शासक थे , 1561 में इन्हे धोखे से मार दिया गया ।
सरदार चार्ल नाईक - औरंगाबाद स्थित ब्रिटिश सेना पर 1819 में आक्रमण कर दिया , लेकिन ब्रिटिशों के साथ हुए युद्ध में वे शहीद हो गए ।
श्री दोशरा भील - यह एक भील शासिका थी , इनका शासन मालवा से लेकर गुजरात के विराटनगर तक था ।
देव मीणी - भील शासिका ।
राजा चौरासी मल - बागर / वागड़ प्रमुख 1175 ।
सरदार मंडालिया भील - भिनाय ठिकाना प्रमुख 1500 से 1600 के आस पास ।
राजा सांवलिया भील - ईडर के शासक , इन्होंने ईडर की सीमा पर सांवलिया शहर बसाया ।
फाफामाऊ के राजा - फाफामाऊ , दिल्ली के समीप जगह है जहां पर भील ताजा का आधिपत्य था ।
वेगड़ाजी भील - वेगड़ा भील , गिरनार के पहाड़ी क्षेत्र के शासक थे , ये भगवान शिव के भक्त थे ।

बिलग्राम - उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले के बिलग्राम क्षेत्र को भीलों ने है बसाया था , यह क्षेत्र भीलग्राम के नाम से विख्यात था और राजा हिरण्य के समय अस्तित्व में था , करीब 9 वी से 12 शताब्दी के बीच भील राजाओं पर बाहरी आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया और क्षेत्र उनसे पा लिया ।
मंदिर
नील माधव - राजा विश्ववासु भील को नील भगवान की मूर्ति प्राप्त हुए , उन्होंने नीलगिरी की पहाड़िया में मूर्ति स्थापित करी , वर्तमान में इस जगह को जगन्नाथ धाम कहा जाता है यह ओडिशा में है ।
भादवा माता मंदिर - भादवा माता मंदिर नीमच जिले मै है , भादवा माता भीलों की कुलदेवी है , रुपा भील के स्वप्न में साक्षात् मां ने दर्शन दिए ।
जालपा माता मंदिर - राजगढ़ में पहाड़ी पर जालपा माता मंदिर है। , यह मंदिर भील शासकों ने बनवाया था ।
शबरी धाम - गुजरात में स्थित है
एकलव्य मंदिर - गुड़गांव में स्थित है ।
आमजा माता - उदयपुर में स्थित है , भीलों की कुलदेवी है ।
जटाऊँ शिव मंदिर - इस मंदिर का निर्माण 11 वी सदी में भीलवाड़ा में भील शासकों ने करवाया था ।
सप्तश्रृंगी - महाराष्ट्र में भील और मराठा की कुल देवी ।
तुंडेश्वर महादेव - यह महादेव मंदिर देवप्रयाग में स्थित है , तुंडा भील ने यह तपस्या की थी ।
भिलट देव - भीलों के प्रमुख देवता ।
भगवान गेपरनाथ मंदिर - यह मंदिर कोटा जिले में स्थित है , यह एक शिव मंदिर है , इस मंदिर का निर्माण भील राजाओं ने और उनके शेव गुरु द्वारा किया गया था ।

संस्कृत

एक भील कन्या

भीलों के पास समृद्ध और अनोखी संस्कृति है। भील अपनी पिथौरा पेंटिंग के लिए जाना जाता है। घूमर भील जनजाति का पारंपरिक लोक नृत्य है। घूमर नारीत्व का प्रतीक है। युवा लड़कियां इस नृत्य में भाग लेती हैं और घोषणा करती हैं कि वे महिलाओं के जूते में कदम रख रही हैं।
कला

भील पेंटिंग को भरने के रूप में बहु-रंगीन डॉट्स के उपयोग की विशेषता है। भूरी बाई पहली भील कलाकार थीं, जिन्होंने रेडीमेड रंगों और कागजों का उपयोग किया था।

अन्य ज्ञात भील कलाकारों में लाडो बाई , शेर सिंह, राम सिंह और डब्बू बारिया शामिल हैं।
भोजन

भीलों के मुख्य खाद्य पदार्थ मक्का , प्याज , लहसुन और मिर्च हैं जो वे अपने छोटे खेतों में खेती करते हैं। वे स्थानीय जंगलों से फल और सब्जियां एकत्र करते हैं। त्योहारों और अन्य विशेष अवसरों पर ही गेहूं और चावल का उपयोग किया जाता है। वे स्व-निर्मित धनुष और तीर, तलवार, चाकू, गोफन, भाला, कुल्हाड़ी इत्यादि अपने साथ आत्मरक्षा के लिए हथियार के रूप में रखते हैं और जंगली जीवों का शिकार करते हैं। वे महुआ ( मधुका लोंगिफोलिया ) के फूल से उनके द्वारा आसुत शराब का उपयोग करते हैं। त्यौहारों के अवसर पर पकवानों से भरपूर विभिन्न प्रकार की चीजें तैयार की जाती हैं, यानी मक्का, गेहूं, जौ, माल्ट और चावल। भील पारंपरिक रूप से सर्वाहारी होते हैं।
आस्था और उपासना

प्रत्येक गाँव का अपना स्थानीय देवता ( ग्रामदेव ) होता है और परिवारों के पास भी उनके जतीदेव, कुलदेव और कुलदेवी (घर में रहने वाले देवता) होते हैं जो कि पत्थरों के प्रतीक हैं। 'भाटी देव' और 'भीलट देव' उनके नाग-देवता हैं। 'बाबा देव' उनके ग्राम देवता हैं। बाबा देव का प्रमुख स्थान झाबुआ जिले के ग्राम समोई में एक पहाड़ी पर है। करकुलिया देव उनके फसल देवता हैं, गोपाल देव उनके देहाती देवता हैं, बाग देव उनके शेर भगवान हैं, भैरव देव उनके कुत्ते भगवान हैं। उनके कुछ अन्य देवता हैं इंद्र देव, बड़ा देव, महादेव, तेजाजी, लोथा माई, टेकमा, ओर्का चिचमा और काजल देव।

उन्हें अपने शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक उपचारों के लिए अंधविश्वासों और भोपों पर अत्यधिक विश्वास है।

त्यौहार

कई त्यौहार हैं, अर्थात। भीलों द्वारा मनाई जाने वाली राखी,दिवाली,होली । वे कुछ पारंपरिक त्योहार भी मनाते हैं। अखातीज, दीवा( हरियाली अमावस)नवमी, हवन माता की चालवानी, सावन माता का जतरा, दीवासा, नवाई, भगोरिया, गल, गर, धोबी, संजा, इंदल, दोहा आदि जोशीले उत्साह और नैतिकता के साथ।

कुछ त्योहारों के दौरान जिलों के विभिन्न स्थानों पर कई आदिवासी मेले लगते हैं। नवरात्रि मेला, भगोरिया मेला (होली के त्योहार के दौरान) आदि।

नृत्य और उत्सव

उनके मनोरंजन का मुख्य साधन लोक गीत और नृत्य हैं। महिलाएं जन्म उत्सव पर नृत्य करती हैं, पारंपरिक भोली शैली में कुछ उत्सवों पर ढोल की थाप के साथ विवाह समारोह करती हैं। उनके नृत्यों में लाठी (कर्मचारी) नृत्य, गवरी/राई, गैर, द्विचकी, हाथीमना, घुमरा, ढोल नृत्य, विवाह नृत्य, होली नृत्य, युद्ध नृत्य, भगोरिया नृत्य, दीपावली नृत्य और शिकार नृत्य शामिल हैं। वाद्ययंत्रों में हारमोनियम , सारंगी , कुंडी, बाँसुरी , अपांग, खजरिया, तबला , जे हंझ , मंडल और थाली शामिल हैं। वे आम तौर पर स्थानीय उत्पादों से बने होते हैं।
भील लोकगीत

1.सुवंटिया - (भील स्त्री द्वारा)

2.हमसीढ़ो- भील स्त्री व पुरूष द्वारा युगल रूप में

किले
अकेलगढ का किला - कोटिया भील द्वारा इस किले का निर्माण कराया गया।
मनोहरथाना किला - राजा मनोहर भील द्वारा , मनोहर थाना में। इस्किले का निर्माण कराया गया।
भोराइगढ़ - भौराई पाल में स्थित है
मांडलगढ़ का किला - राजा मंडियां भील द्वारा इस किले का निर्माण कराया गया।
रामपुर किला - इस किले का निर्माण राजा राम भील ने कराया था , यह किला मध्यप्रदेश में स्थित है ।
फिल्म और धारावाहिक
इज्जत फिल्म - 1938
एकलव्य फिल्म
एकलव्य धारावाहिक
तात्या भील - शॉर्ट फिल्म
भीमा नायक - शॉर्ट फिल्म
कन्नप तमिल फिल्म

राजा बांसिया भील
कौन थे राजा बांसिया भील, जंगल के बीच कैसे बसाया गया बांसवाड़ा ? 

भील राजा बिया (बापड़ा) चरपोटा ने चित्तौड़गढ़ और मल्हारगढ़, धारगढ़ राजधानियों पर राज किया. उनके 2 पुत्र अमरा, वागा जड़ चरपोटा थे. भील राजा बिया चरपोटा के बाद राज्य का शासक भील राजा अमरा के नाम से अमरथुन नगर का नामकरण किया गया. वागा के नाम से वाड़गुन नगर और जड़ ने संन्यास लेकर साधुओं के साथ पहाड़ पर चले गए और साधु बन गए. जिनके नाम से उस पहाड़ का नामकरण जगमेरु (जोगिमाल) रखा गया, जो कि घाटोल उपखण्ड में है.

राजा अमरा ने अमरथुन को अपनी राजधानी बनाया. यहां से पूरे क्षेत्र में राज किया करते थे. भील राजा बिया चरपोटा चित्तौड़गढ़ से चरपोटा वंश की कुलदेवी मां अंबे और शिव पार्वती की मूर्तियां भील राजा अमरा चरपोटा अमरथुन में सन 1445 ईसवी में लेकर आए थे, जो आज भी स्थापित है. राजा अमरा चरपोटा के 2 पुत्र 3 पुत्रियां थी. एक पुत्र बासिया, दूसरा बदीया और पुत्री 1 बाई, डाई, 3 राजा था. राजा अमरा चरपोटा के बाद राज्य के शासक भील राजा बासिया चरपोटा बने.

राजा बासिया व उसके भाई बहन ने अमरचंद नगर से निकलकर एक घने जंगल को काटकर नगर बसाया. जिसका नाम भील राजा बासिया के नाम से बांसवाड़ा किया गया. बांसवाड़ा नगर की स्थापना सन 14 जनवरी 1515 ईसवी को मकर संक्रांति के दिन भील राजा बासिया चरपोटा ने की थी. इस दिन खुशी से तिल-पपड़ी का प्रसाद बनाकर पूरे नगर में बांटी गई, जो परंपरा आज भी चल रही है.

आज भी बांसवाड़ा जिले में मकर संक्रांति पर तिल पपड़ी का प्रसाद बनाकर लोग एक दूसरे को बांटते हैं. भील राजा बादशाह चरपोटा की दो पत्नियां थी. जिसमें एक का नाम संवाई और हंगवाई था. जिनके नाम से राजा ने संवाईपूरा नगर व हंगवाई के नाम से अमरथुन में हंनगर पहाड़ व उनकी तीन बहनों के नाम से बांसवाड़ा में बाइक के नाम से बाइतालाब, डाई के नाम से डायलाब, राजा के राजातालाब का नामकरण किया, जो आज भी इसी नाम से जाने जाते हैं. राजा बांसिया ने बांसवाड़ा में समाई पूरा और अमरथुन में हुरनगर पहाड़ पर किले का निर्माण कराया था. जिसके अवशेष आज भी मौजूद है. श्री राजा बादशाह का पैतृक गांव अमरथुन था. जिनके वंशज बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ (राज.), रतलाम (म.प्र.) गुजरात क्षेत्रों मे निवास करते हैं

History:Banswara was settled in these forests of captivity, here is the Parmarkal palace of King Bansiya

World Tribal Day special see for the first time... picture of tribal history of Banswara

The area which is now known as Samaimata, was known as Banswara in the 15th century when it was settled in forests. On the highest hill of Banswara, even today there are remains of Basia Bhil's palace built during the Parmar rule.

This mountain is at an altitude of 1400 meters. There is a dense forest in the valley, which is full of teak trees. It also has panther movement. Samai was his wife's name. Before the year 1530, Bansiya Bhil had a lot of dominance in Banswara.

In 1515, on the day of Makar Sankranti, he left Amarthun and settled Banswara with his brothers and sisters by cutting trees in the forest. Since then he came to be called Raja Bansiya Bhil. Bansiya Bhil had two wives Samai and Hangwai and named Samaipura mountain after Samai. Hunagar mountain in Amarthun city was named after Hungwai.

Bronze statue weighing 4300 kg, 15 feet high
A statue of Bhil King Bansia has been installed outside the city council. Its release is pending. This monument, built by the city council, will emerge not only because of a grand statue but also as a beautiful and a selfie point from the fountain, colorful lightning and garden.

The statue of Bansiya Bhil made of bronze metal is a 15 feet high statue. In which Bansiya Bhil is riding on a horse with arrows and bow. Its weight is 4300 kg. The cost of which is 39.40 lakhs. Its height is 24 feet above the road level. For this statue, a monument has been built by the council at a cost of 35 lakhs, which is made of red stones of Dholpur and Jaipur. It is proposed to get this statue unveiled by the Chief Minister.

There are three ponds in the name of three sisters. There are three ponds in the name of three sisters of Bansiya Bhil. There is Bai Talab in the name of Bai, Dai Talab in the name of Dai and Raja Talab in the name of Raja. The statue of Bansiya Bhil in Bhimkund was unveiled by the then Vice President Bhairon Singh Shekhawat who had come to Banswara at that time on the request of Lalshankar Pargi. Bansiya Bhil's father Amra Bhil made Armathoon city the capital. The idol of mother Ambe, the Kuldevi of Charpeta dynasty, is established here.

Bansiya Bhil on January 14
राजा चम्पा भील

राजा चम्पा भील - राजा चम्पा भील ने चांपानेर की स्थापना की थी , वे 14वी शताब्दी में चांपानेर के शासक बने , उन्होंने चांपानेर किला बनवाया था ।

प्राचीन चांपानेर नगरी 12 वर्ग मील में बसी हुई थी। चांपानेर पर राजा चंपा भील का शासन रहा था , यह एक शक्तिशाली राजा थे , इन्होंने 1300 भगोड़े राजाओं से युद्ध किया था । पावागढ़ की पहाड़ी पर एक दुर्ग भी था, जिसे पवनगढ़ या पावागढ़ कहते थे। यह दुर्ग अब नष्ट हो गया है, पर वहां प्राचीन महाकाली का मंदिर आज भी विद्यमान है। चांपानेर की पहाड़ी समुद्र तल से 2800 फुट ऊँची है। इसका संबंध ऋषि विक्रमादित्य से बताया जाता है। चांपानेर का संस्थापक गुजरात नरेश वनराज का चंपा नामक मंत्री था। चांद बरौत नामक गुजराती लेखक के अनुसार 11वीं शती में गुजरात के शासक भीमदेव के समय में चांपानेर का राजा मामगौर तुअर था। 1300 ई. में चौहानों ने चांपानेर पर अधिकार कर लिया। 1484 ई. में महमूद बेगड़ा ने इस नगरी पर आक्रमण किया और वीर राजपूतों ने विवश होकर अपने प्राण शत्रु से लड़ते-लड़ते गवां दिए। रावल पतई जयसिंह और उसका मंत्री डूंगरसी पकड़े गए और इस्लाम स्वीकार न करने पर मुस्लिम आक्रांताओं ने 17 नवम्बर 1484 ई. में उनका वध कर दिया। इस प्रकार चांपानेर के 184 वर्ष के प्राचीन राजपूत राज्य की समाप्ति हुई।

मुग़लों का अधिकार

1535 ई. में मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने चांपानेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया, पर यह आधिपत्य धीरे-धीरे शिथिल होने लगा और 1573 ई. में अकबर को नगर का घेरा डालना पड़ा और उसने फिर से इसे हस्तगत कर लिया। इस प्रकार संघर्षमय अस्तित्व के साथ चांपानेर मुग़लों के कब्जे में प्राय: 150 वर्षों तक रहा। 1729 ई. में सिंधिया का यहाँ अधिकार हो गया और 1853 ई. में अंग्रेज़ों ने सिंधिया से इसे लेकर बंबई (वर्तमान मुम्बई) प्रांत में मिला दिया। वर्तमान चांपानेर मुस्लिमों द्वारा बसाई गई बस्ती है। राजपूतों के समय का चांपानेर यहाँ से कुछ दूर है।
स्थापत्य

गुजरात के सुलतानों ने चांपानेर में अनेक सुंदर प्रासाद बनवाए थे। ये सब अब खंडहर हो गए हैं। 'हलोल' नामक नगर, जो बहुत दिनों तक संपन्न और समृद्ध नगर रहा, चांपानेर का ही उपनगर था। इसका महत्व गुजरात के सुलतान बहादुरशाह की मृत्यु के पश्चात (16वीं शती) समाप्त हो गया।

https://www.wikiwand.com/hi/%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B0
राजा डूंगरिया भील
He was the king of Dungarpur Teritory befor  defeat

डूंगरपुर राजस्थान के दक्षिण में बसा एक नगर है। इसकी स्थापना 1282 में रावल वीर सिंह ने की थी। उन्होंने यह क्षेत्र भील प्रमुख डुंगरिया को हरा कर किया था जिनके नाम पर इस जगह का नाम डूंगरपुर पड़ा था 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। यह जगह डूंगरपुर प्रिंसली स्टेट की राजधानी थी यहां से होकर बहने वाली सोम और माही नदियां इसे उदयपुर और बंसवाड़ा से अलग करती हैं पहाड़ों का नगर कहलाने वाला डूंगरपुर में जीव-जन्तुओं और पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं डूंगरपुर वास्तुकला की विशेष शैली के लिए जाना जाता है जो यहां के महलों और अन्य ऐतिहासिक इमारतों में देखी जा सकती है।

‘सिटी ऑफ हिल्स’ के नाम से मशहूर डूंगरपुर राजस्थान का एक खूबसूरत ऐतिहासिक स्थल है, जो 13वीं शताब्दी के दौरान अस्तित्व में आया इस स्थल को सबसे ज्यादा प्रसिद्धि गुहिलोत अहारा सूर्यवंशी राजपूतों के अधीन प्राप्त हुई अतीत की कई घटनाओं का साक्षी रह चुका यह महल आज भी अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है अरावली पहाड़ियों के परिदृश्य के साथ स्थित यह महल ऐतिहासिक पर्यटन के लिहाज से एक खास स्थल है डूंगरपुर में पर्यटकों के लिए आकर्षण की विस्तृत विविधता मौजूद है यहां पर्यटक ऐतिहासिक, धार्मिक और सुंदर प्राचीन संरचनाएं देख सकते हैं डूंगरपुर विशेष रूप से विदेशी पर्यटकों के बीच अपने शांतिपूर्ण माहौल और सुंदरता के कारण लोकप्रिय बनते जा रहा है इस लेख के माध्यम से जानिए उन खास स्थलों के विषय में जिनके बारे में जानने के बाद आप यहां जरूर आना चाहेंगे।

बादल महल :
गैब सागर झील के नजदीक स्थित बादल महल अपने अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए जाना जाता है। इस महल का निर्माण दो चरणों में किया गया था बरामदा और जमीन तल का निर्माण महारावल गोपीनाथ ने करवाया था दूसरे चरण में मराहावल पुंजराज ने कुछ नवीनीकरण के साथ पहली मंजिल और गुंबद के सामने बरामदा बनवाया था इस महल के निर्माण में दावरा पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है यह महल कुछ इस प्रकार बनाया गया है कि कहीं से भी खड़े होकर आप महल की पूरी संरचना को आसानी से देख सकते हैं इस महल का निर्माण अवकाश भवन के रूप में किया गया था राजा-महाराजाओं के अलावा बाद में इस महल का निर्माण क्रांतिकारी नेताओं की गुप्त चर्चाओं के लिए भि किया जाता था।

भगोरिया पर्व पर जीवनसाथी का चुनाव :
भील आदिवासी नृत्य-गीतों के खूब शौकीन होते हैं और अपने सामाजिक उत्सवों में तरह- तरह के नृत्य करते हैं। इनके नृत्यों में ‘गवरी नृत्य’ प्रमुख है, जो वर्षा ऋतु में किया जाता हैं अप्रैल महीने में भगोरिया नामक त्योहार मनाया है इस अवसर पर भी मेला लगता है आदिवासी कुंभ मेले यानी बेणेश्वर मेले के अलावा भगोरिया त्योहार के मौके पर भी स्थानीय युवक-युवतियां अपने पसंदीदा जीवनसाथी का चुनाव कर सकते हैं।

साधारणतया जिसे हम मिट्टी कहते हैं, वह चट्टानों का चूरा होता है ये चट्टानें मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं – स्तरीकृत, आग्नेय और परिवर्तित। क्षरण या नमीकरण के अभिकर्त्ता तापमान,वर्षा,हवा,हिमानी,बर्फ व नदियों द्वाया ये चट्टाने टुकड़ों में विभाजित होती हैं जो अंत में हमें के रूप में दिखाई देती हैं। .

बांगड़ का जीवन-आधार सोम और माही नदियां :
अरावली पर्वत श्रेणियों के बीच बसा है डूंगरपुर शहर। पहाड़ी ढलानों पर हरियाली और घास के मैदान दूर से ही लुभा लेते हैं यहां की टेकरियों यानी छोटी पहाड़ियों पर बसी भीलों की बस्तियां इसकी सुंदरता को और बढ़ा देती हैं टेढ़े-मेढ़े रास्ते, पगडंडियां, बरसाती झरने, नदी-नाले और सागवान, महुआ, आम व खजूर के पेड़ इसका गहना हैं इन सबके साथ इसकी सुंदरता में चार चांद लगाने का काम करती हैं यहां की सोम और माही नदियां इन्हें बांगड़ अंचल के जीवन का आधार कहा जाता है।

आसपास के आकर्षण :
12वीं सदी का देवसोमनाथ मंदिर डूंगरपुर शहर से 24 किमी. दूर देव गांव में सोम नदी के तट पर स्थित ‘देवसोमनाथ’ नामक शिव मंदिर पर्यटन की दृष्टि से भी दर्शनीय है श्वेत पत्थरों से बने इस भव्य शिवालय की शोभा देखते ही बनती है स्थापत्य शैली के आधार पर इसे 12वीं शताब्दी का माना जाता है मंदिर के पूर्व, उत्तर तथा दक्षिण में एक-एक द्वार तथा प्रत्येक द्वार पर दोमंजिले झरोखे निर्मित हैं मंदिर के गर्भगृह के ऊपर एक ऊंचा शिखर तथा गर्भगृह के सामने आठ विशाल स्तंभों से निर्मित एक आकर्षक सभा-मंडप बना हुआ है सभा-मंडप से मुख्य मंदिर में प्रवेश करने के लिए आठ सीढ़ियां नीचे जाती हैं मुख्य मंदिर में स्फटिक से निर्मित शिवलिंग स्थापित है मंदिर के कलात्मक सभा- मंडप में बने तोरण अपने समय की स्थापत्य कला के सुंदर नमूने हैं मंदिर में अनेक शिलालेख हैं जिनसे इसके प्राचीन वैभव की जानकारी मिलती है।

https://tripfunda.in/dungarpur-ka-itihas/
राजा धन्ना भील
 

राजा धन्ना भील 850 ईसा पूर्व मालवा के शासक थे। वे बहादुर , कुशल और शक्तिशाली राजा थे । उनके वंशजों ने 387 वर्ष मालवा पर राज किया इस दौरान मालवा का विकास हुआ ।

उन्हीं के वंश में जन्मे एक भील राजा ने 730 ईसा पूर्व के दौरान दिल्ली के शासक को चुनौती दी , इस प्रकार मालवा उस समय एक शक्ति के रूप में विद्यमान था। ।

Eklavya

 Ekalavya - Fidelitus Gallery

♦ जन्म – महाभारत काल
♦ मृत्यु – यदुवंशी श्रीकृष्ण द्वारा छल से
♦ पिता – महाराज हिरण्यधनु
♦ माता – रानी सुलेखा
♦ बचपन का नाम – अभिद्युम्न ( अभय )
♦ जीवन से शिक्षा –

अपने लक्ष्य के प्रति लगन होना
समस्याओँ से डट कर सामना करना
माता पिता और गुरू का आदर करना
मन लगाकर परिश्रम करना
आदि आदि

एकलव्य निषाद वंश के राजा थे l

निषाद वंश या जाति के संबंध मेँ सर्वप्रथम उल्लेख “तैत्तरीय संहिता” मेँ मिलता है जिसमेँ अनार्योँ के अंतर्गत निषाद आता है l
“एतरेय ब्राह्मण” ग्रन्थ उन्हेँ क्रूर कर्मा कहता है और सामाजिक दृष्टि से निषाद को शूद्र मानता है l
महाभारत काल मेँ प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश मेँ सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था l गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी l
उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्योँ के समकक्ष थी l निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी l
निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के स्नेहांचल से जनता सुखी व सम्पन्न थी l राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था l
निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम “अभिद्युम्न” रखा गया l प्राय: लोग उसे “अभय” नाम से बुलाते थे l
पाँच वर्ष की आयु मेँ एकलव्य की शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरूकुल मेँ की गई l
बालपन से ही अस्त्र शस्त्र विद्या मेँ बालक की लगन और एकनिष्ठता को देखते हुए गुरू ने बालक का नाम “एकलव्य” संबोधित किया l
एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दियाl
एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था l उस समय धनुर्विद्या मेँ गुरू द्रोण की ख्याति थी l पर वे केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते थे और शूद्रोँ को शिक्षा देने के कट्टर विरोधी थे l
महाराज हिरण्यधनु ने एकलव्य को काफी समझाया कि द्रोण तुम्हे शिक्षा नहीँ देँगेl
पर एकलव्य ने पिता को मनाया कि उनकी शस्त्र विद्या से प्रभावित होकर आचार्य द्रोण स्वयं उसे अपना शिष्य बना लेँगेl
पर एकलव्य का सोचना सही न था – द्रोण ने दुत्तकार कर उसे आश्रम से भगा दियाl
एकलव्य हार मानने वालोँ मेँ से न था और बिना शस्त्र शिक्षा प्राप्त तिए वह घर वापस लौटना नहीँ चाहता थाl
एकलव्य ने वन मेँ आचार्य द्रोण की एक प्रतिमा बनायी और धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगाl शीघ्र ही उसने धनुर्विद्या मेँ निपुणता प्राप्त कर ली l
एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्योँ और एक कुत्ते के साथ उसी वन मेँ आएl उस समय एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थेl
कुत्ता एकलव्य को देख भौकने लगाl एकलव्य ने कुत्ते के मुख को अपने बाणोँ से बंद कर दियाl कुत्ता द्रोण के पास भागाl द्रोण और शिष्य ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देख आश्चर्य मेँ पड़ गएl
वे उस महान धुनर्धर की खोज मेँ लग गए
अचानक उन्हे एकलव्य दिखाई दिया
जिस धनुर्विद्या को वे केवल क्षत्रिय और ब्राह्मणोँ तक सीमित रखना चाहते थे उसे शूद्रोँ के हाथोँ मेँ जाता देख उन्हेँ चिँता होने लगीl तभी उन्हे अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के वचन की याद आयीl
द्रोण ने एकलव्य से पूछा- तुमने यह धनुर्विद्या किससे सीखी?
एकलव्य- आपसे आचार्य
एकलव्य ने द्रोण की मिट्टी की बनी प्रतिमा की ओर इशारा कियाl
द्रोण ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा मेँ एकलव्य के दाएँ हाथ का अगूंठा मांगाl
एकलव्य ने अपना अगूंठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पित कर दिया l
कुमार एकलव्य अंगुष्ठ बलिदान के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला आता है l
एकलव्य अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या मेँ पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता हैl
आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: एकलव्य को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगाl
पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बनता हैl अमात्य परिषद की मंत्रणा से वह न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद भीलोँ की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित करता है और अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार करता हैl
इस बीच मथुरा नरेश कंस के वध के बाद, कंस के संबंधी मगध नरेश जरासन्ध शिशुपाल आदि के संयुक्त हमलोँ से भयभीत श्रीकृष्ण मथुरा से अपने भाई बलराम व बंधु बांधवोँ सहित पश्चिम की ओर भाग रहे थेl
तब निषादराज एकलव्य ने श्रीकृष्ण की याचना पर तरस खाकर उन्हेँ सहारा व शरण दियाl
( अधिक जानकारी के लिए पेरियार ललई सिँह यादव द्वारा लिखित एकलव्य नामक पुस्तक पढ़ेँ )
एकलव्य की मदद से यादव सागर तट पर सुरक्षित भूभाग द्वारिका मेँ बस गएl
यदुकुल ने धीरे धीरे अपनी शक्तियोँ का विस्तार किया और यादवोँ ने सुरापायी बलराम के नेतृत्व मेँ निषादराज की सीमाओँ पर कब्जा करना प्रारम्भ कर दियाl
इसी बीच श्रीकृष्ण ने अपनी नारायणी सेना (प्रच्छन्न युद्ध की गुरिल्ला सेना) भी गठित कर ली थीl
अब यादवी सेना और निषादोँ के बीच युद्ध होना निश्चित थाl
यादवी सेना के निरंतर हो रहे हमलोँ को दबाने के लिए एकलव्य ने सेनापति गिरिबीर के नेतृत्व मेँ कई बार सेनाएँ भेजीँl पर यादवी सेनाओँ का दबाव बढ़ता जाता हैl
तब एकलव्य स्वयं सेना सहित यादवी सेना से युद्ध करने के लिए प्रस्थान करते हैँl
बलराम और एकलव्य की सेना मेँ भयंकर युद्ध होता है और बलराम की पराजय होती हैl
बलराम और यादवी सेना को पराजित कर एकलव्य विजय दुंदुभी बजाते हैँ, तभी पीछे से अचानक कृष्ण की नारायणी सेना जो कहीँ बाहर से युद्ध कर लौटी थी, एकलव्य पर टूट पड़ती है l
एकलव्य इस अप्रत्याशित हमले से घिरकर रक्तरंजित हो जाते हैँ l ऐसी ही विकट स्थिति मेँ कृष्ण के हाथोँ महाबली एकलव्य का वध होता है l
अपने महानायक एकलव्य की कृष्ण के हाथोँ मृत्यु से निषाद क्षुब्ध होते हैँ l यदुकुल पतन के बाद उन्हीँ मेँ से एक निषादवीर के द्वारा कृष्ण की हत्या कर दी गई l
Ekalavya

400BCE-4CE: Eklavaya. The story of Ekalavaya is known to most Dalits. This is the story of an Adivasi warrior-archer whose aim is so sure that the famous Savarna hero of the epic Mahabharata, Arjuna feels that he is unable to duplicate such a feat. Arjuna is so threatened by Ekalavaya that he involves his archery teacher Drona into a treacherous plot.This is the story of Ekalavaya detailed below exactly as it appears in Wendy Doniger's book: The Hindus :
"Drona was the Pandava’s archery tutor, and Arjuna was his star pupil. One day a boy named Eklavaya, the son of a tribal Nishada chieftain, came to them. When Drona who knew dharma, refused to accept the son of a Nishada as a pupil, Ekalavaya touched his head to Drona’s feet, went out into the jungle and made a clay image of Drona, to which he paid the respect due to a teacher. He practiced intensely and became a great archer. One day the Pandavas went out hunting with their dog. The dog wandered off, came upon Ekalavaya, and stood their barking at him until the Nishada shot seven arrows almost simultaneously into the dog’s mouth. The dog went whimpering back to the Pandavas, who were amazed and went to find the man who had accomplished this feat. They found him and asked him who he was, and he told them that he was Nishada Ekalavaya, a pupil of Drona’s.They went home, but Arjuna kept thinking about Ekalavaya, and one day he asked Drona why he had a pupil, the son of a Nishada, who was even better archer than he, Arjuna.

Drona then resolved to do something about this. He took Arjuna with him to see Ekalavaya, and when he found him, he said to Ekalavaya, “If you are my pupil, pay me my fee right now”. Ekalavaya, delighted said, “Command me, my Guru. There is nothing I will not give my Guru”. Drona replied “Give me your right thumb”. When Ekalavaya heard this terrible speech from Drona he kept his promise. He cut off his thumb and gave it to Drona and after that when the Nishada shot an arrow his fingers were not as quick as before. Arjuna was greatly relieved."

Dalit literature however, frequently uses the motif of Ekalavaya as someone who betrayed himself and others. Shashikant Hingonekar has written: " If you had kept your thumb History would have happened somewhat differently But you gave your thumb and history also became theirs. Ekalavaya, since that day they have not even given you a glance. Forgive me, Ekalavaya, I won't be fooled now by their sweet words. My thumb will never be broken"

Ekalavya
From Wikipedia,
Ekalavya
Mahabharata character
Information
Affiliation Nishadas
Family Hiranyadhanus (father)
Children Madhu padiami

Ekalavya (English: ékalavya) means self learned person, and is a character from the epic The Mahābhārata. (He was a young prince of the Nishadha Kingdom. He was offered as the son to Vyatraj Hiranyadhanus by Sulekha and possessed powers given by Bhumi devi. As he was her son in previous life.) Ekalavya aspired to study archery in the gurukul of Guru Drona.

Ekalavya is called as one of the foremost of kings in the Starbharata Yajna . Though he didn't have his right thumb, he was noted as a very powerful archer and warrior. He is said to be a great friend of Duryodhan. He brought Krishna's son to the court of Hastinapur when he kidnapped Duryodhan's daughter.

Early life
In the Mahabharata, Ekalavya was son of Hiranyadhanus, who was King Jarasandha's army commander and leader of the Nishadhas. Ekalavya was hurt when he was rejected by Acharya Drona, Ekalavya still didn't give up on his resolute will to master archery. Drona sent him back from the Ashram after being called not able to learn archery. Ekalavya made a symbolic statue of Drona from the mud he walked upon and worshiped it as his guru. He began a disciplined program of self-study over many years.

Self-training
One day when students were going out into the forest, Arjuna saw a dog that was unable to bark due to an amazing construction of arrows in and all around his mouth.the construction was in such a way that the dog could not bark and yet it was harmless to the animal. Drona was amazed, but also distressed,because he became aware that ekalavya has become a greater archer than Arjuna and his promise to make Arjuna the best cannot be fulfilled now. Drona asked, "Boy, who is your guru?" Eklavya replied, "You are my guru." and explained what he had done.

Acharya Drona said to Eklavya, "Child, you have called me Guru, so now you have to give Guru Dakshina too." Drona asked for the right thumb of Ekalavya. Ekalavya was aware that if he offers his right thumb as Dakshina, he will not become a great archer. Still, Ekalavya severed his thumb and offered it as Dakshina.

Later life and death
Later, Eklavya worked as an archer for King Jarasandha. When Jarasandha planned to besiege Mathura, he was aided by Eklavya who was a skillful archer. Eklavya also helped Jarasandha and Shishupala by chasing Rukmini when she eloped with Krishna. After the death of Jarasandha and Shishupala, Eklavya sought to avenge him by campaigning to destroy Kuntibhoja and every Yadava in Dwarka. During the attack, he was killed by Krishna and eventually his army was knocked out by Balarama and his army was forced to flee the battle(who were later defeated by Karna) as all his major allies were killed off.
Indonesian legend

Legacy
In Indonesian legend, in a former life Ekalavaya was king Phalgunadi, killed by Drona and reborn as Dhrishtadyumna to avenge the killing. In this version, Arjuna gets his name Phalguna from Phalgunadi. Ekalavya's famous and chaste wife Dewi Anggraini was always faithful to Phalgunadi, even after his death and despite Arjuna's proposals of marriage.
There is an Eklavya temple (Hindi: एकलव्य मंदिर) temple in honor of Mahabharata fame Eklavya in Khandsa village in Sector 37 of Gurgaon city in Haryana state of India. As per folklore, this is the only temple of Eklavya and it is the place where Eklavya cut his thumb and offered to guru Drona.
In honor of Eklavya, Government of India runs a Ekalavya Model Residential School (EMRS) model residential school scheme for Indian tribals. Ekalavya Award is awarded by Government of Karnataka for the outstanding performance in sports.
In popular culture
The 2007 movie Eklavya: The Royal Guard featuring Saif Ali Khan and Amitabh Bacchanwas named after Eklavya.
 



राजा गर्दभिल्ल
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राजा गर्दभिल्ल उज्जैन के एक शक्तिशाली और पराक्रमी राजा थे। उज्जैन में उनके वंश का शासन लंबे समय तक रहा वह गर्दभिल्ल जनजाति के शासक थे । राजा गर्दभिल्ल ही गंधर्वसेन अथवा गंधर्व भिल्ल परमार है । 

इस जनजाति से संबंधित ओडिशा के पूर्वी भाग के क्षेत्र को गर्दभिल्ल और भील प्रदेश कहा जाता है ।

इतिहास

 राजा गर्दभिल्ल को कलकाचर्या नामक साधु की बहन सरस्वती से प्रेम था , साधु के खिलाफ जाकर उन्होंने सरस्वती का अपहरण कर लिया , इस पर उस साधु ने स्किथी/ स्किथियन राजा से सहयोग मांगा , लेकिन राजा गर्दभिल्ल से युद्ध करने की हिम्मत उस राजा में नहीं थी  , तब साधु ने शकों से सहायता मांगी , शक और गर्दभिल्ल की सेना में भयानक युद्ध हुआ , और गर्दभिल्ल युद्ध हार गए , लेकिन उनके वंशज सम्राट विक्रमादित्य ने पुनः शकों को पराजित कर उज्जैन पर पुनः अधिकार कर लिया ,राजा गर्दभिल्ल भील जनजाति से संबंधित थे । राजा गर्धभिल्ल की कुल 7 रानिया थी जिनमें भील रानी की कोख से धन्वन्तरि , ब्राह्मणी रानी की कोख से वररुचि, बनयानी की कोख से शंकु, शूद्रा रानी की कोख से बेतालभट्ट, सतधारी नाम की रानी से वराहमिहिर पैदा हुए थे। उनकी क्षत्रिय रानी मृगनयनी थी शिवकी परमाराध्या थी नित्य भण्डारा करती थी। क्षिप्रा के जल से सूर्य को अर्घ्य देने वाली चम्पावर्णी स्त्री होने के कारण चम्पावती कहलायी थी ऐसा लिखा मिलता है  । राजा विक्रमादित्य की विजय से प्रभावित होकर आगे आने वाले समय में कुल 14 उपाधियों विक्रमादित्य नाम से अन्य राजाओं को दी गई ।
राजा गलियाकोट

यह राजस्थान शहर उदयपुर से लगभग 168 कि॰मी॰ दक्षिण-पूर्व स्थित है । इस शहर का नामकरण स्थानीय भील राजा गलियाकोट के नाम के आधार पर हुआ है। यहाँ दाऊदी बोहरा तीर्थ स्थल है।

Galiakot (गलियाकोट)
Town in Rajasthan

Galiyakot is a census town in Dungarpur District of Rajasthan, India. It is situated about 168 km southeast of the Rajasthan city of Udaipur and is a Dawoodi Bohra pilgrimage site. The town is famous for the tomb of Babjee Moula Syedi Fakhruddin who lived there in the 11th century. Wikipedia

Elevation: 145 m
Weather: 25 °C, Wind N at 6 km/h, 39% Humidity weather.com
Population: 6,636 (2001)
Hotels: 3-star averaging ₹6,734. View hotels
Getting there: 1 h 15 min flight, from ₹5,484. View flights
Local time: Friday, 7:15 pm

ISO 3166 code: RJ-IN फखरुद्दीन की कब्र के लिए प्रसिद्ध है जो 10 वीं शताब्दी में वहाँ रहता था।

गलियाकोट एक गाँव है जो डुंगरपुर से 58 किमी. की दूरी पर माही नदी के किनारे स्थित है। मान्यताओं के अनुसार इस गाँव का नाम एक भील मुखिया के नाम पर पड़ा जिसने इस क्षेत्र पर राज्य किया था। यह गाँव परमार और डुंगरपुर राज्य की राजधानी था। गलियाकोट सैयद फखरुद्दीन के पुण्य स्थल के रूप में भी प्रसिद्द है। संत फखरुद्दीन एक जाने माने संत थे जिनकी मृत्यु के बाद उन्हें गलियाकोट गाँव में दफना दिया गया। यह धार्मिक केंद्र सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है और इस क्षेत्र की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। पर्यटक इस धार्मिक केंद्र के गुंबद पर जटिल डिज़ाइन देख सकते हैं। प्रतिवर्ष मुहर्रम के 27 वें दिन मनाये जाने वाले उर्स में दावूदी बोहरा के भक्त इस स्थान पर आते हैं। पर्यटक गलियाकोट में विजिया माता का मंदिर, वसुंधरा देवी मंदिर और शीतला माता मंदिर भी देख सकते हैं।

गलियाकोट राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले में भारत का एक जनगणना शहर है । यह राजस्थान शहर उदयपुर से लगभग 168 किमी दक्षिण-पूर्व स्थित है और दाऊदी बोहरा तीर्थ स्थल है। यह शहर बाबाजी मुल्ला सय्यदी फखरुद्दीन की कब्र के लिए प्रसिद्ध है जो 10 वीं शताब्दी में वहां रहता था। कई दाऊदी बोहरा मुस्लिम श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल कब्पर जाते हैं। गलियाकोट का नामकरण यहां के स्थानीय भील राजा के नाम पर किया गया है ।

 जनसांख्यिकी
2001 की जनगणना के अनुसार, गलियाकोट की आबादी 6.636 थी। पुरुषों की आबादी 51% और महिलाओं की आबादी 49% है। गालीकोट में औसत साक्षरता दर 56% है, जो राष्ट्रीय औसत 59.5% से कम है। पुरुष साक्षरता 67% है और महिला साक्षरता 44% है। गलियाकोट में, आबादी का 17% आबादी 6 वर्ष से कम है। यह स्थान रामकादा उद्योग के लिए भी जाना जाता था या प्रसिद्ध था।2001 के अनुसार
गोरां धाय
बलिदानों की भूमि राजस्थान:गोरां धाय, बलिदानी मां; जिसने मारवाड़ का राजवंश बचाने के लिए दूध पीते बेटे को औरंगजेब की तलवारों के पहरे में सुला दिया

लेखक: डूंगरसिंह राजपुरोहित

गोरां धाय की प्रतिमा और चित्र।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 24 फरवरी के बजट में अनाथ, उपेक्षित बच्चों के पुनर्वास के लिए एक ऐसी महिला के नाम से योजना की घोषणा की, जो 342 से खुद उपेक्षा के इतिहास में खुर्दबुर्द थी। उनका नाम है- गोरां धाय। मेवाड़ में पन्नाधाय ने अपने बच्चे चंदन को सुलाकर महाराणा उदयसिंह को बचाया था। उसी तरह गोरां धाय ने अपने चार माह के मासूम को सुलाकर तत्कालीन जोधपुर राज्य के राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब द्वारा दिल्ली में रचे मौत घेरे से बाहर निकाला था।

गोरां धाय नहीं होती तो मारवाड़ का राजवंश एक बार 1679 में समाप्त हो जाता। ऐसी बलिदानी गोरां धाय के नाम पर पहली बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बजट में 33 ही जिलों में अनाथ बच्चों के पुनर्वास करने के लिए गोरा धाय ग्रुप फोस्टर केयर संचालन की योजना रखी। गोरां धाय भी पन्ना धाय के चार पीढ़ी बाद हुुई। पन्नाधाय मुगल शासक हुमायूं के काल में हुई और गोरां धाय औरंगजेब के काल में।

गोरां भी पन्नाधाय की तरह स्वामीभक्त थी, जोधपुर के राजाओं ने उनके नाम बावड़ी व छतरी बनवाई
जोधपुर के मेहरानगढ़ से जुड़े इतिहासकार डाॅक्टर प्रह्रलादसिंह राजपुरोहित का कहना है कि गोरां धाय भी पन्ना धाय की तरह स्वामीभक्त थी। दिल्ली में किशनगढ़ के रूपसिंह की हवेली में कैद जसवंतसिंह की रानियों के साथ अजीतसिंह कैद था। उसको मारकर मारवाड़ को खालसा घोषित करने का प्लान था।

गोरां धाय सफाईकर्मी का भेषधारण कर अंदर गई और अपने बच्चे को सुलाकर औरंगजेब के शाही घेरे से अजीतसिंह को टोकरी में रख बाहर ले आई। राजवंश को बचाने वाली गोरां के नाम पर 1704 में अजीतसिंह ने छतरी बनाई थी जो हाईकोर्ट रोड पर आज भी है।

गोरां धाय का नाम मारवाड़ के राष्ट्रगीत धूंसा में शामिल है- प्रो. जहूर खां मेहर
गोरां धाय माली समाज से थी। मंडोर के मनोहर गोपी गहलोत की पत्नी थी गोरां टांक। पन्ना की तरह अपने पुत्र का बलिदान कर दिया। मारवाड़ उस समय एक राष्ट्र था। बाकायदा मारवाड़ का राष्ट्र गीत था। जोधपुर राष्ट्र के राष्ट्रगीत का नाम धूंसा रखा गया था। धूंसा यानी बड़ा नगाड़ा जो दसों दिशाओं में गूंजे। हर राजा के राज संभालने पर धूंसा गाया जाता था।


जैतसी परमार भील
आबू पर कई शासकों ने राज किया , जिनमें जैतसी परमार एक प्रमुख शासक रहे ।

परमार वंश
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परमार या पँवार मध्यकालीन भारत का एक अग्निवंशी क्षत्रिय राजवंश था। इस राजवंश का अधिकार धार-मालवा-उज्जयिनी-आबू पर्वत और सिन्धु के निकट अमरकोट आदि राज्यों तक था। लगभग सम्पूर्ण पश्चमी भारत क्षेत्र में परमार वंश का साम्राज्य था। ये ८वीं शताब्दी से १४वीं शताब्दी तक शासन करते रहे। मूल शब्द प्रमार के क्षेत्र के अनुसार अलग अलग अपभ्रंश है जैसे पोवार, पंवार, पँवार , पवार और परमार।  परमार राजपूत वंश की एक शाखा बाला/वाल्हा/वाला हैं,जो कि पश्चिमी राजस्थान(मारवाड़) से सम्बंधित हैं। इस शाखा के सम्बंधित लोग आज भी यहां विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते हैं। रावल मालदेव राठौड़ की पत्नी रानी रूपादे इसी बाला परमार वंश में जन्मी थी। जो कि पश्चिमी राजस्थान में पूजनीय हैं।

परिचय

परमार एक राजवंश का नाम है, जो मध्ययुग के प्रारम्भिक काल में महत्वपूर्ण हुआ। चारण कथाओं में इसका उल्लेख राजपूत जाति के एक गोत्र रूप में मिलता है।

कथा

परमार सिन्धुराज के दरबारी कवि पद्मगुप्त परिमल ने अपनी पुस्तक 'नवसाहसांकचरित' में एक कथा का वर्णन किया है। ऋषि वशिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र के विरुद्ध युद्ध में सहायता प्राप्त करने के लिये आबु पर्वत पर यज्ञ किया। उस यज्ञ के अग्निकुंड से एक पुरुष प्रकट हुआ । दरअसल ये पुरुष वे थे जिन्होंने ऋषि वशिष्ठ को साथ देने का प्रण लिया जिनके पूर्वज अग्निवंश के क्षत्रिय थे। इस पुरुष का नाम प्रमार रखा गया, जो इस वंश का संस्थापक हुआ और उसी के नाम पर वंश का नाम पड़ा। परमार के अभिलेखों में बाद को भी इस कहानी का पुनरुल्लेख हुआ है। इससे कुछ लोग यों समझने लगे कि परमारों का मूल निवासस्थान आबू पर्वत पर था, जहाँ से वे पड़ोस के देशों में जा जाकर बस गए। किंतु इस वंश के एक प्राचीन अभिलेख से यह पता चलता है कि परमार दक्षिण के राष्ट्रकूटों के उत्तराधिकारी थे।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

परमार परिवार की मुख्य शाखा आठवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल से मालवा में धारा को राजधानी बनाकर राज्य करती थी और इसका प्राचीनतम ज्ञात सदस्य उपेन्द्र कृष्णराज था। इस वंश के प्रारंभिक शासक दक्षिण के राष्ट्रकूटों के सामन्त थे। राष्ट्रकूटों के पतन के बाद सिंपाक द्वितीय के नेतृत्व में यह परिवार स्वतंत्र हो गया। सिपाक द्वितीय का पुत्र वाक्पति मुंज, जो १०वीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में हुआ, अपने परिवार की महानता का संस्थापक था। उसने केवल अपनी स्थिति ही सुदृढ़ नहीं की वरन्‌ दक्षिण राजपूताना का भी एक भाग जीत लिया और वहाँ महत्वपूर्ण पदों पर अपने वंश के राजकुमारों को नियुक्त कर दिया। उसका भतीजा भोज, जिसने सन्‌ 1000 से 1055 तक राज्य किया और जो सर्वतोमुखी प्रतिभा का शासक था, मध्युगीन सर्वश्रेष्ठ शासकों में गिना जाता था। भोज ने अपने समय के चौलुभ्य, चंदेल, कालचूरी और चालुक्य इत्यादि सभी शक्तिशाली राज्यों से युद्ध किया। बहुत बड़ी संख्या में विद्वान्‌ इसके दरबार में दयापूर्ण आश्रय पाकर रहते थे। वह स्वयं भी महान्‌ लेखक था और इसने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखी थीं, ऐसा माना जाता है। उसने अपने राज्य के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए।

राजा भोज की मृत्यु के पश्चात्‌ चोलुक्य कर्ण और कर्णाटों ने मालव को जीत लिया, किंतु भोज के एक संबंधी उदयादित्य ने शत्रुओं को बुरी तरह पराजित करके अपना प्रभुत्व पुन: स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उदयादित्य ने मध्यप्रदेश के उदयपुर नामक स्थान में नीलकंठ शिव के विशाल मंदिर का निर्माण कराया था। उदयादित्य का पुत्र जगद्देव बहुत प्रतिष्ठित सम्राट् था। वह मृत्यु के बहुत काल बाद तक पश्चिमी भारत के लोगों में अपनी गौरवपूर्ण उपलब्धियों के लिय प्रसिद्ध रहा। मालव में परमार वंश के अंत अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1305 ई. में कर दिया गया।

परमार वंश की एक शाखा आबू पर्वत पर चंद्रावती को राजधानी बनाकर, 10वीं शताब्दी के अंत में 13वीं शताब्दी के अंत तक राज्य करती रही। इस वंश की दूसरी शाखा वगद (वर्तमान बाँसवाड़ा) और डूंगरपुर रियासतों में उट्ठतुक बाँसवाड़ा राज्य में वर्त्तमान अर्थुना की राजधानी पर 10वीं शताब्दी के मध्यकाल से 12वीं शताब्दी के मध्यकाल तक शासन करती रही। वंश की दो शाखाएँ और ज्ञात हैं। एक ने जालोर में, दूसरी ने बिनमाल में 10वीं शताब्दी के अंतिम भाग से 12वीं शताब्दी के अंतिम भाग तक राज्य किया।

वर्तमान

वर्तमान में परमार वंश की एक शाखा उज्जैन के गांव नंदवासला,खाताखेडी तथा नरसिंहगढ एवं इन्दौर के गांव बेंगन्दा में निवास करते हैं।धारविया परमार तलावली में भी निवास करते हैंकालिका माता के भक्त होने के कारण ये परमार कलौता के नाम से भी जाने जाते हैं।धारविया भोजवंश परमार की एक शाखा धार जिल्हे के सरदारपुर तहसील में रहती है। इनके ईष्टदेव श्री हनुमान जी तथा कुलदेवी माँ कालिका(धार)है|ये अपने यहाँ पैदा होने वाले हर लड़के का मुंडन राजस्थान के पाली जिला के बूसी में स्थित श्री हनुमान जी के मंदिर में करते हैं। इनकी तीन शाखा और है;एक बूसी गाँव में,एक मालपुरिया राजस्थान में तथा एक निमच में निवासरत् है।11वी से 17 वी शताब्दी तक पंवारो का प्रदेशान्तर सतपुड़ा और विदर्भ में हुआ । सतपुड़ा क्षेत्र में उन्हें भोयर पंवार कहा जाता है धारा नगर से 15 वी से 17 वी सदी स्थलांतरित हुए पंवारो की करीब 72 (कुल) शाखाए बैतूल छिंदवाडा वर्धा व् अन्य जिलों में निवास करती हैं। पूर्व विदर्भ, मध्यप्रदेश के बालाघाट सिवनी क्षेत्र में धारा नगर से सन 1700 में स्थलांतरित हुए पंवारो/पोवारो की करीब 36 (कुल) शाखाए निवास करती हैं जो कि राजा भोज को अपना पूर्वज मानते हैं । संस्कृत शब्द प्रमार से अपभ्रंषित होकर परमार/पंवार/पोवार/पँवार शब्द प्रचलित हुए ।

राजा

महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य परमार (ईसा. पूर्व. 700 से 800 साल पहले हुए होगे । यह सत्य हे कि विक्रम संवत के प्रवर्तक उज्जैनी के सम्राट विक्रमादित्य ही हे । किंतु राजा विक्रमादित्य के बाद कहि सारे राजाओने विक्रमादित्य कि उपाधी धारण की थी ,जैसे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, हेमचंद्र विक्रमादित्य एसे कइ राजाओने विक्रमादित्य कि उपाधि धारण कि थी इसिलिये इतिहास मे मतभेद हुआ होगा कि विक्रम संवत कब शुरु हुआ होगा। कइ इतिहासकारों का मानना हे कि चंद्रगुप्त मौर्य, और सम्राट अशोक ईसा. पूर्व. 350 साल पहले हुए यानी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य चंद्रगुप्त मौर्य के बाद हुए । पर राजा विक्रम के समय चमत्कार था जब कि चंद्रगुप्त मौर्य के समय कोइ चमत्कार नही था। इसिलिये हय बात सिद्ध होती हे कि राजा विक्रम बहुत साल ‌पहले हो चुके हे। उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य माँ हरसिध्धि भवानी को गुजरात से उज्जैनी लाये थे और कुलदेवी माँ हरसिद्धि भवानीको ११ बार शीश काटकर अर्पण किया था। सिंहासन बत्तीसी पर बिराजमान होते थे।जो ३२ गुणो के दाता थे।जिन्होंने महान भुतनाथ बेत‍ाल को अपने वश में किया था।जो महापराक्रमी थे त्याग,न्याय और उदारशिलता के लिये जाने जाते थे।और उस समय केवल महाराजा विक्रमादित्य ही सह शरीर स्वर्ग में जा सकते थे| राजा गंधर्वसेन का पुत्र विक्रमादित्य हुए।

विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भर्तृहरि थे।
राजा शालिनीवाहन जो विक्रमादित्य का प्रपौत्र था। जो भविष्यपुराण मे वर्णित हे।
वाकपति (893 – 918)
सिंधुराज (995 – 1010)

उदयादित्य (1060 – 1087) जयसिंह के बाद राजधानी से मालवा पर राज किया। चालुक्यों से संघर्ष पहले से ही चल रहा था और उसके आधिपत्य से मालवा अभी हाल ही अलग हुआ था जब उदयादित्य लगभग १०५९ ई. में गद्दी पर बैठा। मालवा की शक्ति को पुन: स्थापित करने का संकल्प कर उसने चालुक्यराज कर्ण पर सफल चढ़ाई की। कुछ लोग इस कर्ण को चालुक्य न मानकर कलचुरि लक्ष्मीकर्ण मानते हैं। इस संबंध में कुछ निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। इसमें संदेह है कि उदयादित्य ने कर्ण को परास्त कर दिया। उदयादित्य का यह प्रयास परमारों का अंतिम प्रयास था और ल. १०८८ ई. में उसकी मृत्यु के बाद परमार वंश की शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती गई। उदयादित्य भी शक्तिशाली था।

नरवर्मन (1097 – 1134)
यशोवर्मन (1134 – 1142)
देवपाल (1218 – 1239)

१३०० ई. की साल में गुजरात के भरुचा रक्षक वीर मेहुरजी परमार हुए। जिन्होंने अपनी माँ,बहेन और बेटियों कि लाज बचाने के लिये युद्ध किया और उनका शर कट गया फिर भी 35 कि.मि. तक धड़ लडता रहा।
गुजरात के रापर(वागड) कच्छ में विर वरणेश्र्वर दादा परमार हुए जिन्होंने ने गौ रक्षा के लिये युद्ध किया। उनका भी शर कटा फिर भी धड़ लडता रहा। उनका भी मंदिर है।
गुजरात में सुरेन्द्रनगरमे मुली तालुका हे वहाँ के राजवी थे लखधिर जि परमार. उन्होंने एक तेतर नामक पक्षी के प्राण बचाने ने के लिये युद्ध छिड दिया था। जिसमे उन्होंने जित प्राप्त की।
लखधिर के वंशज साचोसिंह परमार हुए जिन्होंने एक चारण, (बारोट,गढवी )के जिंदा शेर मांगने पर जिंदा शेरका दान दया था।
एक वीर हुए पीर पिथोराजी परमार जिनका मंदिर हे थरपारकर मे हाल पाकिस्तान मे आया हे।जो हिंदवा पिर के नाम से जाने जाते हे।
(https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6)

कोटिया भील 
सिर धड़ से अलग होने पर भी लड़ता रहा कोटिया भील 


कोटा का इतिहास : चंबल नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित को कोटा का किला हाड़ा राजपूतों की वीरता कोटिया भील के पराक्रम की अनेक गौरव गाथाओ, साहसिक घटनाओं और रोमांचक प्रसंगो का साक्षी रहा है।
kota fort कोटा का किला

कोटा के किले की सर्वोपरि विशेषता यह है की किले की प्राचीर पर्वत श्रृंखला के साथ इस तरह एकाकार हो गई है कि दूर से यह किला शत्रु सेना को नजर नहीं आता और इसके पास जाने पर ही अचानक प्रकट होता था। किला तीन ओर से लगभग 60 से 70 फीट ऊंची प्राचीर से रक्षित है और चौथी तरह अथाह जल राशि से परिपूर्ण वर्ष पर्यंत बहने वाली चंबल नदी इसे सुरक्षा प्रदान करती है।

राजा कोटिया भील की गौरव गाथा।

कोटा के किले की नीव बूंदी के हाडा राजवंश के पराक्रमी शासक राव देवा के पुत्र राजकुमार जैत सिंह ने कोटा के भील सरदार कोटिया भील (Kotiya Bheel) धोखे से विजय प्राप्त करके रखी थी। कोटिया भील इकेलगढ़ नामक प्राचीन किले का शासक था तथा वही निवास करता था उसी के नाम से कोटा का नाम पड़ा।

कोटिया भील (Kotiya Bheel ) अत्यंत पराक्रमी था उसे युद्ध में हरा पाना असंभव सा था तब जैत सिंह ने उसे अपने यहां दावत पर बुलाकर खूब शराब का सेवन करवाया। जब कोटिया भील पूरी तरह से शराब के नशे में धुत हो गए तब सालार गाजी और हाडा राजपूतों ने मिलकर उन पर हमला बोल दिया। कोटिया भील ने वीरता से उनका सामना किया और सालार गाजी को मार गिराया तब जैत सिंह ने धोखे से कोटिया भील की गर्दन धड़ से अलग कर दी गर्दन धड़ से अलग हो जाने के बाद भी कोटिया भील युद्ध करते रहे तब उनकी कमर काट दी गई इस तरह उनके शरीर के तीन हिस्से हो गए और उन्होंने अंतिम सांस ली ,इस तरह कोटिया भील की हत्या कर दी गई।

बूंदी राजवंश से ही कोटा राजवंश का निकास हुआ है। मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल में बूंदी से अलग कोटा के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई। शाहजहां ने बूंदी के प्रतापी शासक राव रतन सिंह हाडा के दूसरे पुत्र माधव सिंह को दक्षिण में बुरहानपुर के युद्ध में वीरता और पराक्रम दिखाते हुए विजय प्राप्त करने पर प्रसन्न होकर राव को खिताब और कोटा की स्वतंत्र जागीर प्रदान की।

वीर जालिम सिंह झाला

जब कोटा और जयपुर के बीच भटवाड़ा का युद्ध हुआ तब कोटा ने जयपुर को हरा दिया था। इस युद्ध में कोटा के दीवान जालिम सिंह झाला ने वीरता और रण कौशल से कोटा की विजय में निर्णायक भूमिका निभाई। जालिम सिंह झाला ने अपने विश्वासपात्र सहायक दलेल खान पठान की सहायता से कोटा दुर्ग में सामरिक दृष्टि से सुदृढ़ प्राचीरो का निर्माण करवाया। 1804 में ब्रिटिश फौज कर्नल मैसन के नेतृत्व में कोटा की ओर आई तथा होल्कर की सेना से हार कर अंग्रेज सेनापति ने शरण देने की मांग करते हुए कोटा के किले में जबरन घुसने का प्रयास किया इस विपत्ति का जालिम सिंह ने दृढ़ता से सामना किया और अंग्रेजी सेना को शरण देने से मना कर दिया। दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था को भेजने में अंग्रेज सेना असफल रही और विवश होकर दिल्ली की ओर चली गई।

कोटा के स्वतंत्र राज्य के संस्थापक माधव सिंह ने कोटा दुर्ग का निर्माण करवाया और अपने पराक्रम के बल पर नए कोटा को बूंदी की बराबरी पर लाकर खड़ा किया। इसके बाद बूंदी और कोटा के पारस्परिक संबंध बिगड़ गए।

6 प्रवेश द्वार

कोटा के किले की मोटी प्राचीर में 6 विशाल प्रवेश द्वार हैं जिनमें पाटन पोल, कैथूनीपोल ,सूरजपोल, हाथी पोल और किशोरपुरा दरवाजा प्रमुख है।

अन्य दर्शनीय स्थल (कोटा का इतिहास)

कोटा का राजप्रासाद बहुत भव्य और कलात्मक है विशेष रुप से बृज नाथ मंदिर, जैत सिंह महल, माधव सिंह महल, बड़ा महल ,कंवरपदा महल, केसर महल ,अर्जुन महल ,हवा महल, चंद्र महल, बादल महल जनाना महल, छत्तर महल ,भीम महल ,दीवान ए आम, दरबार हॉल जालिम सिंह झाला की हवेली प्रमुख और उल्लेखनीय हैं।

कोटा का इतिहास राज महलों को भित्ति चित्रों का खजाना कहां जा सकता है शिकार के चित्र कोटा चित्र शैली की अनूठी विशेषता है ।कोटा के दरबार हॉल में कांच का सुंदर काम हुआ है।कोटा में स्थापित महाराजा माधव सिंह म्यूजियम रियासत कालीन कला और संस्कृति का बहुमूल्य खजाना है।

देश की स्वतंत्रता के बाद जब चंबल नदी के प्रवाह को नियंत्रित कर कोटा बैराज बांध बनाया गया तब किले और नदी के बीच आवागमन के लिए सड़क मार्ग का निर्माण हुआ।

कोटा का राजघरने का इतिहास

किशना भील
किशना भील (अंग्रेज़ी: Krishna Bhil) भारत के क्रांतिकारी थे। माणिक्य लाल वर्मा की प्रेरणा से किशना भील युवावस्था में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। बिजौलिया के किसान आंदोलन में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। किशना भील ने लोगों को सियासती शासन के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए जागृत किया। डाबी किसान सम्मेलन के दौरान हुए गोलीकांड में किशना भील के पैर में गोली लगी थी। किशना एक देशभक्त आंदोलनकारी नेता थे।

कालीबाई

NAEEM AHMAD

आज के अफने इस लेख मे हम एक ऐसी गुरू भक्ता के बारे मे जाने। जिसने अपने प्राणो की आहुति देकर अपने गुरु के प्राणो की रक्षा की थी। जिसे आधुनिक युग का एकलव्य के नाम से भी संबोधित किया जाता है। उस वीरबाला का नाम है “कालीबाई” । इस लेख मे हम कालीबाई हिस्ट्री इन हिन्दी, कालीबाई राजस्थान हिस्ट्री, वीर बालिका कालीबाई की कहानी, कालीबाई की जीवनी के बारे मे जानेंगे.

यह परतंत्र भारत के उस समय की घटना है, जब राजस्थान में छोटी बडी अनेक रियासते थी। इन रियासतों मे एक रियासत डूंगरपुर थी। जिसके शासक महारावल लक्ष्मण सिह थे। इस समय भारत पर पूर्ण रूप से अंग्रेजों की हूकूमत थी।

महारावल शिक्षा के खिलाफ थे। इसी बीच वहा एक ,सेवा संघ, का गठन हूअआ। सेवा संघ के कार्यकर्ता शिक्षा का प्रचार और प्रसार करने लगे। वे गांव गांव जाते और बच्चों को पढाई के लिए प्रेरित करते । उन्हें शिक्षा का महत्त्व बताते। सेवा संघ ने पाठशालाएं खुलवा दी। डूंगरपुर मे भी एक पाठशाला का निर्माण कराया गया। उसका उद्धघाटन हुआ। यह पाठशाला बच्चों और बडों दोनों के लिए थी।

महारावल शिक्षा के प्रचार प्रसार से भयभीत हो गए। उन्होंने सोचा कि– किसान और जनता शिक्षित हो जाएगी। तो फिर वह अपने अधिकार मांगेंगे। जनता हमारे राजकाज मे भी दखल देने लगेगी। स्थिति विकट हो जाएगी।

महारावल ने पाठशाला बंद करने के आदेश दे दिए। इसके लिए आवश्यक कानून भी बनाए गए। मजिस्ट्रेट ने पाठशालाएं बंद करने का अभियान शुरू कर दिया। अभियान को सफल बनाने के लिए पुलिस और सेना की भी मदद ली गई।

पाठशाला बंद अभियान के कार्यकर्ता पाल नामक गांव पहुंचे। यह घटना 19 जून 1947 की थी। पाल गांव में एक पाठशाला थी। पाठशाला के मालिक नानाभाई खाट थे। पाठशाला के अध्यापक सेंगाभाई थे। उस समय दोनों ही वहां मौजूद थे। पाठशाला में विद्यार्थी अभी आए नही थे।

मजिस्ट्रेट ने नानाभाई को स्कूल में ताला लगाने के लिए कहा। नानाभाई ने ताला लगाने से मना कर दिया। मजिस्ट्रेट के साथ पुलिस भी थी। मजिस्ट्रेट ने पुलिस को उनके साथ सख्ती बरतने का आदेश दिया।उसने पुलिस से जबरजस्ती स्कूल पर ताला लगाने को भी कहा।

नानाभाई और सेंगाभाई ने उनका पुरजोर विरोध किया। बदले मे पुलिस ने उन दोनो पर लाठियां बरसाई। सैनिकों ने लात, घूंसे और थप्पड़ से उनकी खूब पिटाई की। लेकिन दोनो ही कर्तव्यपराण थे, इसलिए अपनी बात पर अडे रहे।

पुलिस ने जबरन स्कूल में ताला लगा दिया। और पुलिस उन्हें मारते मारते अपने साथ ले जाने लगी। नानाभाई पर बंदूक की बट बरसाई जा रही थी। वह दर्द से छटपटा रहे थे। परंतु पुलिस उन्हे बडी बेरहमी पीटती रही। रास्ते में असहनीय पीड़ा से नानाभाई ने अपने प्राण त्याग दिए।

सेंगाभाई भी बेहोश हो गए। परंतु जालिम इतने पर भी न रूके। पुलिस ने रस्सी का एक सिरा उनकी कमर मे बांध दिया और दूसरा सिरा अपने ट्रक मे बांध लिया।

देखते ही देखते वहां काफी भीड इकट्ठा हो गई। लेकिन किसी की हिम्मत न हुई जो पुलिस के खिलाफ आवाज़ उठा सके।

पुलिस की गाड़ी सेंगाभाई को घसीटते हुए चली। तभी एक बारह वर्षीय बालिका ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। उस बालिका का नाम कालीबाई था। वह भील गांव की बालिका थी। कालीबाई अपने खेतों में घास काट रही थी। उसके हाथ मे दरांती थी।

उसने सेंगाभाई की दुर्दशा देखी। सेंगाभाई उसके गुरू थे। उसे पढाते थे। अपने मास्टर की दुर्दशा देख वह पुलिस की गाडी के पिछे दौडी। उसने जोर – जोर से चिल्लाना शुरू किया– “मेरे मास्टर जी को छोड दो” इन्हे क्यो घसीट रहे हो, कहाँ ले जा रहे हो इन्हें?” ।

दौडते दौडते वह गाडी के पास पहुंच गई। उसने आगे बढकर दरांती से रस्सी काटनी चाही। इतने मे पुलिस ने गाडी रोक दी। पुलिस ने कालीबाई को डराया धमकाया और वापस लौट जाने को कहा।

कालीबाई ने पुलिस की एक न सुनी । वह मास्टर जी को बचाना चाहती थी। उसने निडर होकर रस्सी को काट दिया। सैनिक कालीबाई पर बंदूक ताने हुए थे। परंतु कालीबाई को अपनी जान की परवाह नही थी।

;P98IIछोटी सी बालिका के हौसले को कई महिलाओं ने देखा। वे सब भी उसके पास आ गई। सेंगाभाई बेहोश थे। बालिका ने एक महिला से पानी लाने को कहा।

बालिका की हठ से पुलिस रोष मे आ गई। सैनिकों ने उस पर गोलियां चला दी। कालीबाई गोलियां खाकर गिर पडी। उसके साथ अन्य महिलाएं भी घायल हो गई। परंतु कालीबाई ने सेंगाभाई को बचा लिया। उसने अपने गुरू को बचाकर ,गुरू-शिष्य, की दुनिया में एक नया इतिहास बनाया।

गुरु शिष्य के अनूठे उदाहरण इतिहास में बहुत कम है। महाभारत के युग मे एक गुरूभक्त थे, जो एकलव्य के नाम से आज तक अमर है। उनके गुरु द्रोणाचार्य थे। गुरू के मांगने पर एकलव्य ने अपने हाथ का अंगूठा काटकर उन्हें गुरू दक्षिणा मे भेंट कर दिया था। परंतु आधुनिक युग की कालीबाई ने जो किया वह एक अनूठी मिसाल है।

कालीबाई के साहस से भील वासियों की आंखें खुल गई। उन्होंने मारू ढोल बजा दिया। भीलवासी पुलिस पर आक्रमण करने को तैयार हो गए। पुलिस को मालूम था कि मारू ढोल की आवाज मारने मरने का संकेत है। इसलिए वे सब जल्दी से अपनी गाडी मे सवार हुए और वहां से भाग गए।

मारू ढोल की आवाज पुरे भील गांव मे फैल गई। पूरे भील वासी हथियारों से लैस वहा पहुंच गए। पुलिस और सैनिक तब तक वहां से भाग चुके थे। नानाभाई का शव और कालीबाई सहित सभी घायलों को चारपाई पर रखकर डूंगरपुर लाया गया। वहा उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया।

कालीबाई वहां चालीस घंटे तक बेहोश रही। मूक बना कालचक्र सब कुछ देखता रहा। डॉक्टरों के वश मे कुछ नही था। कालीबाई ने 12 वर्ष की उम्र में इतनी बडी कुर्बानी दे दी। कालीबाई अपने शरीर को छोड चली। उनकी आत्मा परमात्मा मे समा गई।

कालीबाई को आधुनिक युग का एकलव्य कहा जाने लगा। उसने अपने गुरू की जान बचाई और शाही सामंतों की बलिदेवी पर चढ गई। वह बलिदान के इतिहास में अपना नाम दर्ज कर गई। उसके बलिदान से आदिवासियों मे नई चेतना जागी।

डुंगरपुर राज्य में एक पार्क बनवाया गया। वह पार्क प्रजा ने बनवाया। यह पार्क नानाभाई खाट और कालीबाई की याद मे था। पार्क में दोनो की प्रतिमाएं स्थापित की गई। 19 जून को रास्तापाल गांव में मेले का आयोजन होता है। इस दिन हजारों की संख्या में लोग एकत्र होते है। ये सब लोग रास्तापाल गांव के आसपास से आते है। इस दिन बच्चे, बडें, बुढे सभी शहीदों की प्रतिमा के सम्मुख मौन खडे होते है। इस तरह वह सभी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है, सभी की आंखें उनकी याद मे नम हो उठती है।

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काली बाई जिन्हें साक्षरता की देवी और आधुनिक एकलव्य के रूप मे जानी जाती है । काली बाई का जन्म डुंगरपूर के एक गाँव मे हुआ। डुंगरपूर रियासत के महारावल लक्ष्मण सिंह थे और वहाँ अंग्रेजो का शासन था।

महारावल शिक्षा के विरोध मे थे , लेकिन एक सेवा संघ ने शिक्षा का प्रचार प्रसार करते हुए डुंगरपूर मे पाठशाला खोली

महारावल एसा नही चाहते थे इसलिए मजिस्ट्रेट पुलिस और सेना को साथ लेकर पाठशाला बंद कराना चाहते थे ।

19 जून को वे सब हथियार लेकर पाल गाँव स्थिति पाठशाला को बंद कराने गये । पाठशाला के मालिक नाना भाई खाट थे और

अध्यापक सेंगाभाई थे , दोनों ने पाठशाला बंद करने से मना कर दिया इसपर झगड़ा बड़ गया और नाना भाई खाट को बंदूक की गोली लगने से मारे गये , सेंगाभाई को रस्सी से गाड़ी के पीछे बांध दिया , वहाँ खड़े किसी व्यक्ति की विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई । लेकिन गाड़ी जब कुछ दूरी पर पहुँची तब भील गाँव की बालिका पास के ही खेत मे काम कर रही 11 वर्ष की बालिका ने साहसिक कार्य किया , उस भील बालिका ने अपने गुरु को बचाने के लिए दंतारी से रस्सी काट दी ।लोग हैरान थे क्योंकि महारावल और अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत एक नन्ही बालिका ने करी , सैनिको ने उस नन्ही बालिका पर गोलीया बरसादी और वह नन्ही बालिका इस प्रकार यह दुनिया छोड़ गई । लेकिन उस नन्ही बालिका ने दुनिया को शिक्षा के प्रति समर्पण , लगन और गुरूभक्ती सिखा गई

कालीबाई की शहिद होने की खबर भीलो को चली तब भीलो ने मारू ठोल बजा दिया जिसका अर्थ था कि अब सिधे भीलो और पुलिस के बीच लड़ाई होनी थी । इस कारण वे। सभी गाड़ी मे सवार होकर चले गए ।

और यह पूरी घटना 19 जून 1947 के दिन घटित हुुुई ।
राजा मनोहर भील
मनोहरथाना किला 

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यह किला मनोहर थाना में स्थित एक भव्य किला है जिसे राजा मनोहर भील ने करीब 500 वर्ष पूर्व में बनवाया था , किले के अंदर भीलों की आराध्य देवी - देवता , कालिका देवी , दुर्गा देवी और राधा कृष्ण मंदिर है । किले में महल , रेस्ट हाउस और संघिन अपराधियों को रखने के लिए कारागार है  । मनोहर थाना में राजा चक्रसेन भील एक प्रमुख शासक थे जिनके वंशज आज भी ओंकारनाथ में रहते हैं ।

संदर्भ
 साँचा:Https://www.google.com/amp/s/www.bhaskar.com/amp/rajasthan/jhalawar/news/rajasthan-news-500-years-old-ancient-fort-at-the-confluence-of-parwan-and-kalikhar-river-094048-5989607.html
राजा मंडिया भील

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Mandalgarh
नगर

यह स्थान भीलवाड़ा के दक्षिण-पूर्व के 54 किमी की दूरी पर स्थित है। यह उपविभाग, तहसील और पंचायत समिति समान नाम का है। यह स्थान ऐतिहासिक महत्व का है क्योंकि मुस्लिम इतिहासकारों के मुताबिक, मध्यकालीन समय के दौरान कई भयंकर लड़ाई का दृश्य था। वीरविनोद के अनुसार मंडिया भील ने मांडलगढ किले का निर्माण कराया। मंडिया भील द्वारा निर्मित यह भव्य गढ़ है जिसमें मंदिर है। पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में मालवा के महमूद खिलजी द्वारा इसे दो बार लिया गया था, और बाद में यह मयवर के रानास और मुगल सम्राटों के लिए वैकल्पिक रूप से होता था। 1650 में या शाहजहां ने जगीर में किशनगढ़ के राजारूप सिंह को इसे आंशिक रूप से एक महल का निर्माण किया था, लेकिन राणा राज सिंह ने इसे 1660 में अपना लिया था। बीस साल बाद, औरंगज़ेब ने महल को कब्जा कर लिया और 1700 में इसे जुझार सिंह पिंसंगन के चीफ (अब अजमेर जिले में) जिसे वह 1706 में राणा अमर सिंह द्वारा बरामद किया गया था, और उसके बाद से उनके उत्तराधिकारियों के निर्बाध कब्जे में बने रहे।

1761 के बाद से महाराणा अरी सिंह द्वितीय के सलाहकार मेहता पृथ्वीराज के बेटे, शाहिल मेहता अग्र चन्द (बालवाट) भी 1765 में मांडलगढ़ किले के पहले कैलासेर के रूप में नियुक्त हुए थे। महाराज अरी सिंघ II (1761-73) द्वारा पट्टा ने हस्ताक्षर और दिए। मेवाड़ का कहना है - "मेरा आदेश भाई मेहता अगर चांद के पास है। मांडलगढ़ जिले में विद्रोही हो गए हैं, आप हमारे स्वयं के व्यक्ति होने के कारण, हम आपको वहां भेज रहे हैं। महाराणा के अच्छे के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें और अच्छे के लिए प्रयास करते समय, कुछ गलत भी अनदेखी की जा सकती है, जब तक कि श्री एकलिंगजी का वर्चस्व प्रबल होता है, तब तक आपके परिवार के साथ विवश हो जाते हैं, ज़िले तुम्हारा होगा.अपने आवास के लिए घर बनाएं और उन्हें रियायतें देकर लोगों और किसानों में रहने का प्रयास करें। हाथ "। मेहता अग्र चंद ने मरम्मत, पुनर्निर्माण और रक्षा के बाहरी दीवारों के पुनर्निर्माण और मौजूदा फाटकों की मरम्मत के माध्यम से किलेबंदी को मजबूत किया। मेहता अग्र चंद ने बाद में मेवाड़ को प्रधान (1767-69 और 1796- 99) के रूप में सेवा प्रदान की। 1 9 47 में भारत की आजादी तक लगातार बचववत मेहता के कंगाड़ी के तहत मांडलगढ़ किला बने रहे।

उत्तर-पश्चिम में एक किला है, जो कम पर्वत की दीवार और पहाड़ी के शिखर पर बैठे गढ़ के किनारे पर आधा मील की दूरी पर है, जिस पर वह खड़ा है। माना जाता है कि किला राजपूतों के बालनोट कबीले (सोलंकी की एक शाखा) के एक प्रमुख द्वारा निर्मित किया गया था। नाम से एक पुराने मंदिर जलेश्वर है (1619 v।) किले में मांडलगढ़ के निकट शिव को समर्पित एक मंदिर भी है, जहां एक छोटा गांव विठ्ठलपुरा है।
जनसांख्यिकी[संपादित करें]

2011 की जनगणना के अनुसार, मांडलगढ़ की आबादी 13,844 थी। पुरुष आबादी का 51% थे और महिलाएँ 49% थीं। मांडलगढ़ में औसत साक्षरता दर 73.3% था, जो राज्य औसत 66.1% से अधिक था: पुरुष साक्षरता 85.1% और महिला साक्षरता 61.3% थी। जनसंख्या का 13.7% 6 साल से कम उम्र का था।
राजा मांडलिक
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राजा मांडलिक इडर के शासक थे। राजा मांडलिक ने मेवाड़ अथवा गुहिल वंश के संस्थापक राजा गुहादित्य को अपने संरक्षण में रखा।

जब शिलादित्य के वल्लभी पर मलेच्छो ने हमला कर दिया तब शिलादित्य वीरगति को प्राप्त हुए एवं उनकी रानी ने एक गुफा के भीतर गोहिल को जन्म दिया। कमलावती नामक ब्राह्मणी ने उस बालक को राजा मांडलिक भील को सौंप दिया। गुहादित्य , राजा मांडलिक के राजमहल में रहता और भील बालकों के साथ घुड़सवारी करता इस तरह गोहिल राजा मांडलिक के संरक्षण में पला बढ़ा। कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार गुहादित्य ने भील शासक राजा मांडलिक की हत्या कर दी और 566 ईसा पूर्व के दौरान गुहिल वंश की नींव रखी।
नानक भील
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अमर शहीद नानक भील का जन्म 1890 में बराड़ के धनेश्वर गांव में हुआ । इनके पिता का नाम भेरू भील था । यह बचपन से ही बहादुर निडर साहसी और एक जागरुक व्यक्ति रहे । नानक भील गोविंद गुरु और मोतीलाल तेजावत द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन से काफी प्रभावित रहे । इन्होंने अपने क्षेत्र में आम किसानों जनता को अपने अधिकारों और अंग्रेजों से स्वतंत्रता के लिए जागरूकता बड़ाई। नानक भील ने अपने क्षेत्र में झंडा गीतों के माध्यम से अंग्रेजों का विरोध किया और अपने क्षेत्र के आम लोगों को अंग्रेजो के खिलाफ विरोध करने के लिए प्रेरित किया । यह अपने झंडा गीतों के माध्यम से लोगों में एक नया उत्साह भर देते थे ।

13 जून 1922 में डाबी गांव में किसानों की बैठक रखी गई थी वहीं पर अचानक से अंग्रेज पुलिस ने आकर फायरिंग कर दी और इस गोलाबारी से महा आम किसानों में भगदड़ मच गई लेकिन नानक भील ने झंडा लहराते हुए अंग्रेजों का विरोध किया और झंडा गीत गाते हुए अंग्रेजों का विरोध किया और इसी दौरान वहां पुलिस ने नानक भील को सीने पर गोली मारी और इस प्रकार भारत देश का एक वीर सपूत शहीद हो गया लेकिन नानक भील की शहादत व्यर्थ नहीं गई , नानक भील के इस महत्वपूर्ण कदम से अंग्रेजों की शासन व्यवस्था में कुछ परिवर्तन आया और किसानों और आम जनता में को राहत मिली और उनमें एक नव जागृति पनपी और आम लोगों ने खुद के लिए लड़ना शुरू किया। अमर शहीद नानक भील जी की स्मृति में मूर्तियां स्थापित की गई और मेले का आयोजन होता है।
पुरुरवा भील

सिद्धांतकोष से

( महापुराण/62/87-88 एक भील था। एक समय मुनिराज के दर्शनकर मद्य, मांस व मधु का त्याग किया। इस व्रत के प्रभाव से सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ। यह महावीर भगवान का दूरवर्ती पूर्व भव है। उनके मरीचि के भव की अपेक्षा यह दूसरा पूर्व भव है। - देखें महावीर 

पुराणकोष से

पुंडरीकिणी नगरी के समीपवर्ती मधुक वन का निवासी भील । यह स्वयं भद्र प्रकृति का था और इसकी प्रिया कालिका भी वैसे ही स्वभाव की थी । एक दिन सागरसेन मुनि उस वन में आये । वे अपने संघ से बिछुड़ गये थे । दूर से पुरुरवा ने उन्हें मृग समझकर अपने बाण से मारना चाहा । कालिका ने उसे बाण चढ़ाते देखा । उसने कहा कि ये मृग नहीं है ये तो वन देवता है, वंदनीय हैं । यह उनके पास गया उनकी इसने वंदना की । व्रत अंगीकार किये और मांस का त्याग किया । सत्तों का निर्वाह करते हुए इसने अंत में समाधिमरण किया जिससे यह सौधर्म स्वर्ग में उत्पन्न हुआ । वहां से च्युत होकर चक्री भरत और उनकी रानी धारिणी का मरीचि नाम का पुत्र हुआ । 

यही मरीचि अनेक जन्मों के पश्चात् राजा सिद्धार्थ और उसकी रानी प्रियकारिणी के पुत्र के रूप में चौबीसवाँ तीर्थंकर महावीर हुआ । महापुराण 62.86-89, वीरवर्द्धमान चरित्र 2. 18-40, 64-69, 9.88-89 देखें महावीर
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पुरुरवा से लेकर भगवान महावीर के ३४ भव
१. पुरुरवा भील १६. स्थावर—ब्राह्मण
२. प्रथम स्वर्ग में देव १७. चतुर्थ स्वर्ग में देव
३. भरत पुत्र—मरीचि १८. विश्वनंदि
४. ब्रह्म स्वर्ग में देव १९. महाशुक्र नामक दशवें स्वर्ग में देव
५. जटिल ब्राह्मण २०. त्रिपृष्ठ अर्धचक्री
६ .सौधर्म स्वर्ग में देव २१. सप्तम नरक में
७. पुष्यमित्र—ब्राह्मण २३. सिंह
८. सौधर्म स्वर्ग में देव २४. सिंह (यहाँ से उत्थान प्रारम्भ)
९. अग्नि सम—ब्राह्मण २५. सौधर्मस्वर्ग में सिहकेतु नामक देव
१०. सनत्कुमार स्वर्ग में देव २६. कनकोज्जवल विद्याधर
११. अग्निमित्र ब्राह्मण २७. सातवें स्वर्ग में देव
१२. भारद्वाज २८. हरिषेण राजा
१३. माहेन्द्र स्वर्ग में देव २९. महाशुक्र स्वर्ग में देव
१५. मनुष्य ३०. प्रियमित्र नामक चक्रवर्ती (इसके बाद एवेंद्रिय आदि ३१. सहास्रार स्वर्म में सूर्यप्रभदेव असंख्यात भव) ३२. नंदन नामक राजा ३३. अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में इन्द्र ३४. तीर्थंकर—वर्धमान—महावीर इस प्रकार पुरुरवा भील से लेकर महावीर पर्यंत ३४ भवों को दिखाया है। इनके मध्य असंख्यातों वर्षों तक नरको में, त्रस—स्थावर योनियों में तथा इतर निगोद में जो भव ग्रहण किये हैं उनकी गिनती नहीं हो सकती है।

राजा सोनारा भील
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राजा सोनरा भील या राजा सोनार भील सलूंबर के अंतिम भील राजा थे । इनकी पत्नी का मंदिर सलूंबर कि सबसे ऊंची पहाड़ी पर देखने को मिलता है ।

सलूंबर पर सदियों से भील राजाओं का शासन रहा था । यह क्षेत्र भीलों की वीरता के लिए जाना जाता था। करीब 12 वी सदी तक यह क्षेत्र भील राजाओं के शासन का क्षेत्र रहा [1] , यहां के अंतिम भील राजा राजा सोनारा भील रहे , उनकी मृत्यु के पश्चात इनकी पत्नी सती हो गई , आज भी सोनार पहाड़ी पर राजा सोनारा भील कि पत्नी का मंदिर मौजूद है ।
सरदार हेमसिंह भील
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सरदार हेम सिंह भील एक देशप्रेमी सरदार थे। वे बाड़मेर के एक मजबूत सरदार थे। भील ने अपने लोगो के बीच मजबूत पकड़ बना रखी थी। बाड़मेर के पहाड़ी इलाके के नजदीक ही पाकिस्तानी घुसपैठ कर रहे थे, पूरे देश में भय का माहौल था, भारतीय सेना भी पहाड़ी इलाके तक पहुंच नहीं पा रही थी। ऐसे समय में भारत के वीर सरदार हेम सिंह ने वो कर दिखाया जो कोई सोच नहीं सकता ।

सरदार हेम सिंह ने पहाड़ी इलाके के लोगों को इकट्ठा किया, लोगो में युद्ध करने का जोश भर दिया। पाकिस्तानियों के पास ऑटोमैटिक बंदूके और तोपे थी। वही भीलों ने इस देश के रक्षा के लिए सभी लोगो को एकजुट कर पाकिस्तानियों की तोपो का जवाब अपने जुगाड से दिया, भील लोगो ने धनुष- बाण और पुरानी बंदूके थी। भील सरदार हेम सिंह और उनके साथ कई लोग पाकिस्तानियों से युद्ध करते रहे। पहाड़ों पर घमासान युद्ध छिड़ा था, इस बात की जानकारी वहां के अध्यापक सुरेश ने 15 मिल चलकर आर्मी को दी तब आर्मी । तब तक भील बहादुरी से युद्ध करते रहे , कई जाबाज भील योद्धा इस देश के लिए शहीद हो गए । भील सरदार हेम सिंह ने अपने लोगो को बचाया भी और पाकिस्तानियों को इस देश में घुसने भी नहीं दिया।
राजा सांवलिया भील

 इन्होंने ईडर की सीमा पर सांवलिया शहर बसाया ।

इडर (Idar) भारत के गुजरात राज्य के साबरकांठा ज़िले में स्थित एक नगर है।

साबरकांठा ज़िला

इतिहास

ईडर राज्य का इतिहास राजा मांडलिक भील से प्रारंभ होता है। राजा मांडलिक दयावान राजा थे । राजा मांडलिक ने ही गुहिलवंश के राजा गुहादित्य को अपने राज्य में रखकर संरक्षण दिया।

ईडर राज्य पर लंबे समय तक भील राजाओं का शासन रहा और यहां भील संस्कृति का विकास हुआ । मेवाड़ का प्रारंभ भील राजा मांडलिक के भीलप्रदेश ईडर से ही हुवा। भील आदिवासी लोगों का स्वभाव सरल होने "अतिथि देवो भव:" रहा है ।।लेकिन कुछ शरणागत गैर लोगों ने षड्यंत्र रच कर उनके राजा, सरदारों की हत्या कर राजपूत राज्यों की स्थापना की ।
Saiyyad Bilgrami - Muslim King

परंपरा के अनुसार, बिलग्राम की स्थापना 9वीं या 10वीं शताब्दी में रायकवार राजा राजा श्री राम ने की थी।  उसने ठठेरस से उस स्थान पर विजय प्राप्त की , उसका नाम अपने नाम पर "श्रीनगर" रखा, और किले, मंदिर और सागर तालाब का निर्माण किया।  मुस्लिम विजय तक रायकवारों ने इस क्षेत्र पर शासन किया, लेकिन यह कब या कैसे हुआ यह स्पष्ट नहीं है।  श्रीनगर का नाम मुस्लिम विजेता बिलग्राम द्वारा एक महान राक्षस बिल के नाम पर रखा गया था। यहां से दिल्ली सल्तनत ने 1217 में इल्तुतमिश शम्स एड-दीन इब्न अल-कुटबी यलम खान (1210/1211-1236) के तहत अवध पर नियंत्रण और प्रभुत्व स्थापित किया।

इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त करने वाले दो अधिकारी और श्रीनगर तालुकदार बिलग्राम के पूर्वज थे, कम से कम 19 वीं शताब्दी के अंत तक मौजूद थे। इसके बाद इसे अकबर महान के समय में एक परगना की राजधानी बनाया गया था , जिस पर 1000 में सैय्यद का शासन था, लेकिन सैनिकों के साथ सेवा की और पड़ोसी परगना बंग भी शामिल था। एक स्थानीय संत ने बेल नामक राक्षस को मार डाला और बेलग्राम से व्युत्पन्न नाम बिलग्राम रख लिया।

1881 में 11,067 निवासी थे। बिलग्राम का प्राचीन नाम श्रीनगर है, इसका वर्तमान नाम बिलग्राम महमूद गजनवी के कुछ सहयोगियों द्वारा दिया गया था। 1540 में बिलग्राम की लड़ाई हुमायूँ और शेर शाह सूरी के बीच हुई थी। बिलग्राम के युद्ध में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को पराजित किया। 

सादात बिलग्राम सैय्यद परिवारों का एक समूह है जो हरदोई जिले के ऐतिहासिक शहर बिलग्राम में निवास करते हैं । सआदत-ए-बिलग्राम का शाब्दिक अर्थ है बिलग्राम शहर का सैय्यद । ये हुसैनी सैय्यद पहली बार 13वीं शताब्दी में वासित, इराक से आए थे।  उनके पूर्वज, सैयद मोहम्मद सुघरा, इराक के एक जैदी सैय्यद , सुल्तान इल्तुतमिश के शासन के दौरान भारत पहुंचे ।

1217-18 में परिवार ने विजय प्राप्त की और बिलग्राम में बस गए।  सैयद एक आज्ञा मुस्लिम सेना कि विजय Bhars , जो की पारंपरिक शासक थे हरदोई क्षेत्र, और एक संपत्ति बिलग्राम के शहर है, जहां सैयद नीचे बसे पर केंद्रित प्रदान की गई थी। 1247 में मृत्यु हो गई, उनकी कब्र का निर्माण सैयद मोहम्मद सईद के पुत्र सैयद मोहम्मद मुहसिन ने 1738-39 में करवाया था। 

सैयद मोहम्मद सुघरा के वंश में छठे थे वसीत के सैयद अब्दुल फराह (उनसे उत्तरी भारत के सबसे प्रसिद्ध सैय्यद परिवारों, बरहा और बिलग्राम सैय्यद के वंशज हैं; और खैराबाद, फतेहपुर हसवा और कई अन्य स्थानों पर एक ही तने की शाखाएँ हैं) मिल गया।  ), जो की पूर्वज था सआदत-ए-बारा , का एक और समुदाय Sayyids । 

बिलग्रामी सैय्यद अवध के दक्षिणी भाग में महत्वपूर्ण शक्ति दलाल थे , और पूरे मध्य युग में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कबीले बने रहे। उन्होंने कई तालुकदार परिवारों को प्रदान किया , और पर्याप्त जमींदार थे। 

बिलग्राम के सबसे उल्लेखनीय व्यक्तियों में अल्लामा आज़ाद बिलग्रामी (1704-1786), सैयद अली बिलग्रामी (1851-1911), इमाद-उल-मुल्क बहादुर सैयद हुसैन बिलग्रामी (1842-1926), मालवा के सुरसुबा और ईसागढ़ एस्टेट खान बहादुर हैं। सैयद अली बहादुर बिलग्रामी।

मौलाना आबिद बिलग्रामी वर्तमान समय में इस्लामी अध्ययन के क्षेत्र में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाने वाला नाम है। बिलग्राम के कई नौकरशाह हैं जिनमें से सैट रिज़वी, कामरान रिज़वी और डॉ मोहम्मद इलियास रिज़वी कुछ महत्वपूर्ण नाम हैं। दुर्भाग्य से, बिलग्राम ने वह चमक खो दी है जो कभी छात्रवृत्ति के क्षेत्र में थी। इस संबंध में बिलग्राम के प्रसिद्ध उर्दू कवि हुजूर बिलग्रामी कहते हैं:

अब तो तलछत ज़ीनत-ए-जाम-ओ-सुराही है 'हुज़ूर'

रश्क-ए-मैखाना कभी था बिलग्राम अपनी जगाह।

शिथिल रूप से अनुवादित (अब केवल तलछट घड़े के लिए रह गई है, एक बार बिलग्राम स्वाद के लोगों की ईर्ष्या थी)

बिलग्राम बिलाहौर-कटरा स्टेट हाईवे पर स्थित है
कन्नौज से दूरी-29 किमी
हरदोई से दूरी-27 किमी
कानपुर से दूरी - 110 किमी
लखनऊ से दूरी - 110 किमी
फर्रुखाबाद से दूरी - 70 किमी

20 वीं शताब्दी के मोड़ के आसपास, बिलग्राम को संपन्न वाणिज्य और कई ऐतिहासिक स्मारकों के साथ एक बड़े शहर के रूप में वर्णित किया गया था। [२] उस समय, बिलग्राम ने एक तहसील और परगना मुख्यालय के रूप में कार्य किया, और इसमें एक मुंसिफी , पुलिस स्टेशन, औषधालय , डाकघर, निरीक्षण बंगला, और मवेशी पाउंड, साथ ही एक उच्च प्राथमिक विद्यालय था जो पहले एक साइट पर था। शहर के किले पर कब्जा कर लिया।  नगर के उत्तर की ओर एक सैनिक छावनी भी थी। 

उस समय, बिलग्राम एक मामूली महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, जिसमें हरदोई और माधोगंज इसके मुख्य व्यापारिक भागीदार थे।  शहर में कई बाजार थे, जिनमें दो पुराने बाजार भी शामिल थे जिन्हें बारी और छोटी बाजार कहा जाता था, जिन्हें नाजिम हकीम मेहंदी अली खान ने बनवाया था।  शहर के दक्षिण में रफैयतगंज बाजार भी था, जिसे उनके द्वारा बनाया गया था, लेकिन उस समय तक इसमें काफी गिरावट आई थी।  इसके पतन का मुख्य कारण शहर में दो नए बाजारों का निर्माण था: एक सरजू प्रसाद द्वारा, जो रविवार और बुधवार को बाजारों की मेजबानी करता था, और दूसरा भोगतापुर के तालुकदार वासी हैदर द्वारा , जो उन्हें सोमवार और गुरुवार को आयोजित करता था। . 

हालांकि उस समय बिलग्राम एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र नहीं था, लेकिन यह "मनभावन डिजाइन के लाख-चमकता हुआ मिट्टी के बर्तनों, विशेष रूप से अमृतबन और घर के आकार में" के उत्पादन के लिए जाना जाता था , जिन्हें विभिन्न प्रकार से हरे या पीले रंग में रंगा जाता था, या चांदी के पत्ते से सजाया जाता था ।  बिलग्राम में उत्पादित अन्य निर्मित वस्तुओं में नक्काशीदार दरवाजे और लिंटल्स , विभिन्न लकड़ी के सामान (विशेषकर सैंडल), चमड़े के जूते, पीतल की स्याही के स्टैंड और पान के बक्से शामिल थे ।

https://www.hmoob.in/wiki/Bilgram
Tadvi Bhil
From Wikipedia, the free encyclopedia
Tadvi Bhil

This is typical homes belongs to the Tadvi Bhils in Maharashtras Satpuda region.This community is resident of Gujarat, Madhya Pradesh and Maharashtras Satpuda Hills spread.
Residence of Tadvi Peoples

The Tadvi Bhil is a tribal community found in the states of MaharashtraGujaratMadhya Pradesh and Rajasthan in India. They are from the larger Bhil ethnic group, and are a clan of it. They use the surname Tadvi or sometimes the name of their Kul or Gan; the Dhankas of Gujarat and Maharashtra use Tadvi or Tetariya.

History and origin

The Tadvi Bhil inhabit an area which roughly covers the border areas of the states of Gujarat, Madhya Pradesh and Maharashtra. This territory forms the core of the Faruqi kingdom, a medieval state in central India. In the Western part of this area, Tadvis and Vasavas are mainly Hindu but some Christian missionary activities are seen in this region. A close association between the Bhil of this region, and the Faruqi state led to the conversion of some of them to Islam. As they was converted from indigenous faiths and Hinduism, the RSS has initiated steps for their reversion right back to their original faith, which is still seen in their day-to-day activities. The dance that they perform on various occasions is known as Timli or Sajoni, or commonly known as tribal dance.

Present circumstance

The Tadvi speak a dialect of their own, also known as Tadvi, but many are switching to Hindi and Marathi. Their language is also Dhanka and Bhilori, which belongs to the Bhil group of the Indo-Aryan language family. They inhabit villages which are largely Tadvi. The community consist mainly of small cultivators. Like the wider Bhil community, they currently practise gotra exogamy, and are endogamous.

As of 2001, the Tadvi Bhil of Rajasthan were classified as a Scheduled Tribe under the Indian government's reservation program of positive discrimination.
द ट्राइब्स ऐन्ड कास्ट्स ऑफ सेन्ट्रल प्रोविन्सेस ऑफ इंडिया (1916) से एक चित्र
जन्म 1840/1842

भीलों का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है। कुछ इतिहासकारो ने भीलों को द्रविड़ों से पहले का भारतीय निवासी माना तो कुछ ने भीलों को द्रविड़ ही माना है। मध्यकाल में भील राजाओं की स्वतंत्र सत्ता थी। करीब 11 वी सदी तक भील राजाओं का शासन विस्तृत क्षेत्र में फैला था। इतिहास में अन्य जनजातियों जैसे कि मीना आदि से इनके अच्छे संबंध रहे है। 6 ठी शताब्दी में एक शक्तिशाली भील राजा का पराक्रम देखने को मिलता है जहां मालवा के भील राजा हाथी पर सवार होकर विंध्य क्षेत्र से होकर युद्ध करने जाते हैं। जब सिकंदर ने मिनांडर के जरिए भारत पर हमला किया इस दौरान शिवी जनपद का शासन भील राजाओं के हाथो में था। भील पूजा और हिन्दू पूजा में काफी समानतऐ मिलती ।

इडर में एक शक्तिशाली भील राजा हुए जिनका नाम राजा मांडलिक रहा । राजा मांडलिक ने ही गुहिल वंश अथवा मेवाड़ के प्रथम संस्थापक राजा गुहादित्य को अपने इडर राज्य मे रखकर संरक्षण किया । गुहादित्य राजा मांडलिक के राजमहल मे रहता और भील बालको के साथ घुड़सवारी करता , राजा मांडलिक ने गुहादित्य को कुछ जमीन और जंगल दिए , आगे चलकर वही बालक गुहादित्य इडर साम्राज्य का राजा बना । गुहिलवंश की चौथी पीढ़ी के शासक नागादित्य का व्यवहार भील समुदाय के साथ अच्छा नहीं था इसी कारण भीलों और नागादित्य के बीच युद्ध हुआ और भीलों ने इडर पर पुनः अपना अधिकार कर लिया । बप्पा रावल का लालन - पालन भील समुदाय ने किया और बप्पा को रावल की उपाधि भील समुदाय ने ही दी थी । बप्पारावल ने भीलों से सहयोग पाकर अरबों से युद्ध किया । खानवा के युद्ध में भील अपनी आखरी सांस तक युद्ध करते रहे ।

बाबर और अकबर के खिलाफ मेवाड़ राजपूतो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध करने वाले भील ही थे । मेवाड़ और मुगल समय में भील समुदाय को उच्च ओहदे प्राप्त थे,तत्कालीन समय में भील समुदाय को रावत,भोमिया और जागीरदार कहा जाता था। राणा पूंजा भील और महाराणा प्रताप की आपसी युद्ध नीती से ही मेवाड़, मुगलो से सुरक्षित रहा। हल्दीघाटी का युद्ध मे राणापूंजा जी और उनकी भील सेना का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी कारण मेवाड चिन्ह मे एक तरफ महाराणा प्रताप जी और एक तरफ राणापूंजा भील जी अर्थात राजपूत और भील का प्रतिकचिन्ह अस्तित्व मे आया। मुगलों के बाद जब मराठो ने मेवाड़ पर आक्रमण किया तब भी भील मेवाड़ के साथ खड़े रहे। भील , मराठा शासक वीर शिवाजी के साथ खड़े रहें। भील और राजपूतो मे खान-पान होता रहा ।

गुजरात के डांग जिले के पांच भील राजाओं ने मिलकर अंग्रेज़ो को युद्ध में हरा दिया,लश्करिया अंबा में सबसे बड़ा युद्ध हुए, इस युद्ध को डांग का सबसे बड़ा युद्ध कहा जाता है । डांग के यह पांच भील राजा भारत के एकमात्र वंशानुगत राजा है और इन्हें भारत सरकार की तरफ से पेंशन मिलती हैं , आजादी के पहले ब्रिटिश सरकार इन राजाओं को धन देती थी ।

गुजरात में 1400 ईसा पूर्व के दौरान भील राजा का शासन । गुजरात केइडर ,डांग, अहमदाबाद और चांपानेर पावागढ़ में लंबे समय तक भील राजाओं का शासन रहा था।

राजस्थान में कोटा,बांसवाड़ा,डूंगरपुर,मनोहरथाना, कुशलगढ़,भीनमाल, प्रतापगढ़,भोमटक्षेत्र और जगरगढ़ में भील राजाओं का शासन लंबे समय तक रहा था। राजस्थान में मेवाड़ भील कॉर्प है।

भील लोग आम जनता की सुरक्षा करते थे और यह भोलाई नामक कर वसूलते थे । शिसोदा के भील राजा रोहितास्व भील रहे थे । अध्याय प्रथम वागड़ के आदिवासी: ऩररचय एवंअवधारणा - Shodhganga

मध्यप्रदेश में मालवा पर भील राजाओं ने लंबे समय तक शासन किया , आगर ,झाबुआ,ओम्कारेश्वर,अलीराजपुर पर भील राजाओं ने शासन किया । इंदौर स्थित भील पल्टन का नाम बदलकर पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय रखा , मध्यप्रदेश राज्य गठन के पूर्व यहां भील सैना प्रशिक्षण केंद्र था। मालवा की मालवा भील कॉर्प थी।

छत्तीसगढ़ का प्रमुख शहर भिलाई का नामकरण भील समुदाय के आधार पर ही हुआ है।

महाराष्टर में कई भील विद्रोह हुए जिनमें खानदेश का भील विद्रोह प्रमुख रहा ।

1661 में राजपूतों ने भीलों के साथ मिलकर औरंगज़ेब को हरा दिया ।

राजकुमार विजय
राजकुमार विजय - यह भील प्रजाति के पूलिंद राजा थे , इनका शासन वर्तमान के बंगाल में था , उस समय भारत बंगाल एक थे , राजकुमार विजय का उल्लेख महावंश आदि इतिहास ग्रन्थों में हुआ है। परम्परा के अनुसार उनका राज्यकाल 543–505 ईसापूर्व में था , वे श्रीलंका आए , श्रीलंका में उन्होंने सिंहल और क्षत्रिय स्त्री से विवाह किया जनके फलस्वरूप वेदा जनजाति की उत्पत्ति हुए , यह जनजाति भारत से ही चलकर श्रीलंका तक पहुंची यह इतिहासकारों का मानना है ।
तेलंगा खड़िया
तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फ़रवरी सन् 1806 ई० को झारखंड के गुमला जिले के मुरगू गाँव में हुआ था। वह एक साधारण किसान का बेटा था। उनके पिता का नाम ठुईया खड़िया तथा माँ का नाम पेती खड़िया था तथा इनकी पत्नी का नाम रत्नी खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया तथा दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। वे मुरगू ग्राम के जमींदार तथा पाहन परिवार के थे। उनके दादा सिरू खड़िया धार्मिक, सरल तथा साहित्यिक विचार के व्यक्ति थे। वीर साहसी और अधिक बोलने वाले को खड़िया भाषा में तेब्बलंगा कहते हैं। इन्हें सरना धर्म पर अटूट विश्वास था। एक किसान होने के साथ-साथ ये अस्त्र-शस्त्र चलाना भी जानते थे तथा अपने लोगों को इसकी शिक्षा भी देते थे। .

खड़िया विद्रोह

तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में खड़िया विद्रोह 1880 में हुआ। यह आंदोलन अपनी माटी की रक्षा के लिए शुरू हुआ। जंगल की जमीन से अंग्रेजों को हटाने के लिए युवा वर्ग को गदका, तीर और तलवार चलाने की शिक्षा दी गई। तेलंगा की पत्नी रत्नी खड़िया ने हर मोर्चे पर पति का साथ दिया। रत्नी ने कई जगह अकेले ही नेतृत्व संभालते हुए अंग्रेजों से लोहा लिया। 23 अप्रैल 1880 को अंग्रेजों के दलाल बोधन सिंह ने गोली मारकर तेलंगा खड़िया की हत्या कर दी। उनकी हत्या के बाद रत्नी खड़िया ने पति के अधूरे कार्यां को पूरा किया। वह अपनी सादगी, ईमानदारी और सत्यवादिता से लोगों में जीवन का संचार करती रहीं। .

खड़िया आदिवासी

खड़िया महिला खड़िया, मध्य भारत की एक जनजाति है। यह जनजाति आस्ट्रालॉयड मानव-समूह का अंग है और इनकी भाषा आस्ट्रिक भाषा परिवार की आस्ट्रोएशियाटिक शाखा के मुंडा समूह में आती है। जनसंख्या की दृष्टि से मुंडा समूह में संताली, मुंडारी और हो के बाद खड़िया का स्थान है। खड़िया आदिवासियों का निवास मध्य भारत के पठारी भाग में है, जहाँ ऊँची पहाड़ियाँ, घने जंगल और पहाड़ी नदियाँ तथा झरने हैं। इन पहाड़ों की तराइयों में, जंगलों के बीच समतल भागों और ढलानों में इनकी घनी आबादी है। इनके साथ आदिवासियों के अतिरिक्त कुछ दूसरी सदान जातियाँ तुरी, चीक बड़ाईक, लोहरा, कुम्हार, घाँसी, गोंड, भोगता आदि भी बसी हुई हैं। खड़िया समुदाय मुख्यतः एक ग्रामीण खेतिहर समुदाय है। इसका एक हिस्सा आहार-संग्रह अवस्था में है। शिकार, मधु, रेशम के कोये, रस्सी और फल तथा जंगली कन्दों पर इनकी जीविका आधारित है। जंगल साफ करके खेती द्वारा गांदेली, मडुवा, उरद, धन आदि पैदा कर लेते हैं। .
राजा विंध्यकेतु (विंध्य के राजा)
विंध्य क्षेत्र
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विंध्य प्रदेश


 
1948 – 1956  

1951 map of India. Vindhya Pradesh is shown in the centre.
इतिहास
- Creation of Vindhya Pradesh State 1948
क्षेत्रफल 61,131.5 किमी² (23,603 वर्ग मील)
जनसंख्या
- 36,00,000
घनत्व 58.9 /किमी² (152.5 /वर्ग मील)
Pranab Kumar Bhattacharyya (1977). Historical Geography of Madhya Pradesh from Early Records. Delhi: Motilal Banarsidass. पपृ॰ 54–5.

विन्ध्य प्रदेश, भारत का एक भूतपूर्व प्रदेश था जिसका क्षेत्रफल 23,603 वर्ग मील था।  भारत की स्वतन्त्रता के बाद सेन्ट्रल इण्डिया एजेन्सी के पूर्वी भाग के रियासतों को मिलाकर १९४८ में इस राज्य का निर्माण किया गया था। इस राज्य की राजधानी रीवा थी। इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश एवं दक्षिण में मध्य प्रदेश था।

विंध्य क्षेत्र पारंपरिक रूप से विंध्याचल पर्वत के आसपास का पठारी भाग को कहा जाता है।

इतिहास

१९४८ में भारत की स्वतंत्रता के बाद मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में स्थित कुछ रियासतों को मिलाकर विंध्यप्रदेश की रचना की गई थी। इसमें भूतपूर्व रीवां रियासत का एक बड़ा हिस्सा, बघेलखंड, बुंदेलखंड आदि थे। इसकी राजधानी रीवां थी। इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में मध्य प्रदेश तथा दतिया राज था। १ नवम्बर १९५६ को ये सब मिलाकर मध्यप्रदेश बना दिए गए थे। यह क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण समझा जाता है। विंध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री श्री पं॰ शम्भूनाथ शुक्ल जी थे, जो शहडोल के रहने वाले थे। उनके नाम पर शहडोल में बड़ा शासकीय महाविद्यालय है और रीवा विश्वविद्यालय का सांस्कृतिक हाल भी उन्हीं के नाम पर है। राजधानी स्थित मंत्रालय में भी श्री शुक्ल जी के नाम पर कई कक्ष स्थापित है।

वर्तमान मध्यप्रदेश के रीवा, सतना, सीधी, शहडोल,अनूपपुर, सिंगरौली, पन्ना, छ्ततरपुर, टीकमगढ, दतिया और उमरिया जिले पूर्व विंध्य प्रदेश का भाग थे. विंध्य प्रदेश सफेद शेरों के लिए विश्व में प्रसिद्ध है. सतना जिले के बेला-गोविंदगढ मार्ग एवं रीवा-मुकुंदपुर मार्ग(निपानिया-तमरा रोड) पर मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी की स्थापना की गयी है. जो रीवा से 12 किलोमीटर है

प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर इस प्रदेश में चूना, कोयला, हीरा, प्राकृतिक गैस जैसी अनमोल सम्पदा विद्ययमान है.
राजा विश्वासु भील

जगन्नाथ पूरी मंदिर भारत के विख्यात चार धाम में से एक हैं। हिंदू शास्त्रों में ग्रंथों में भगवान कृष्ण का बेहद ही सुंदर वर्णन मिलता है। जगन्नाथ पुरी को पहले नील माधव कहा जाता था , हजारों वर्ष पूर्व जगन्नाथ पुरी अथवा नील माधव कहा जाता था की पूजा वहां के भील सरदार विश्वासु किया करते थे ।

सरदार विश्वासु जी नीलमाधव जी को अपना आराध्य देवता मानते थे नीलमाधव जी एक गुफा में विराजमान थे भील जनजाति के लोग बड़े ही हर्षोल्लास से भगवान नीलमाधव जी की आराधना किया करते थे।

यलम्बर
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श्रृंखला का भाग
यलम्बर
नेपाल के इतिहास का कालक्रम

यलम्बर नेपाल के प्रथम किरात राजा थे। उनको महाभारत में बर्बरीक नाम से जाना जाता है। वे प्रथम किराँती राजा थे जिन्होने गोपाल वंश को पराजित करके 800बी .सी मे काठमाण्डू उपत्यका में किरात वंश की स्थापना की थी। और उनका किरात साम्राज्य पश्चिम मे त्रिशूली नदी से पुर्व मे भारत के तिस्ता नदी तक फैला हुवा था

सभी ३२ किरात राजाओं की सूची नीचे दी गयी है-
राजा श्री यलम्बर - ९० वर्ष,
राजा श्री पेलं - ८१ वर्ष,
राजा श्री मेलं - ८९ वर्ष,
राजा श्री चंमिं - ४२ वर्ष,
राजा श्री धस्कं - ३७ वर्ष,
राजा श्री वलंच - ३१ वर्ष ६ महीना,
राजा श्री हुतिं - ४० वर्ष ८ महीना,
राजा श्री हुरमा - ५० वर्ष,
राजा श्री तुस्के - ४१ वर्ष ८ महीना,
राजा श्री प्रसफुं - ३८ वर्ष ६ महीना,
राजा श्री पवः - ४६ वर्ष,
राजा श्री दास्ती - ४० वर्ष,
राजा श्री चम्ब - ७१ वर्ष,
राजा श्री कंकं - ५४ वर्ष,
राजा श्री स्वनन्द - ४० वर्ष ६ महीना,
राजा श्री फुकों - ५८ वर्ष,
राजा श्री शिंघु - ४९ वर्ष ६ महीना,
राजा श्री जुलम् - ७३ वर्ष ३ महीना,
राजा श्री लुकं - ४० वर्ष,
राजा श्री थोरम् - ७१ वर्ष,
राजा श्री थुको - ८३ वर्ष,
राजा श्री वर्म्म - ७३ वर्ष ६ महीना,
राजा श्री गुंजं ७२ वर्ष ७ महीना,
राजा श्री पुस्क - ८१ वर्ष,
राजा श्री त्यपमि - ५४ वर्ष,
राजा श्री मुगमम् - ५८ वर्ष,
राजा श्री शसरू - ६३ वर्ष,
राजा श्री गंणं - ७४ वर्ष,
राजा श्री खिम्बुं - ७६ वर्ष,
राजा श्री गिरीजं - ८१ वर्ष,
राजा श्री खुरांज - ७८ वर्ष,
राजा श्री गस्ती - ८५ वर्ष