April 18, 2019

Dalit History



Chronologically 'Jai Bhim' is older than 
Jai Hind

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What is the Origin of the Word Dalit?
Broadly, the history of this contentious word can be traced back to the 1930s. Dr. Anand Teltumbde told The Quint that it was Maharashtrian reformer Jyotirao Phule who first used the word Dalit. At the time, it was used as a Hindi/Marathi translation for ‘depressed classes’, as academic scholar Gail Omvedt points out in her blog.

The colonial government used to use the term ‘Scheduled Caste’, which was just a reflection of the legal category they belonged to, but this was not a term which lent itself to political speech.

By the time Ambedkar entered politics, he used Dalit to refer to a large class of people at the bottom of the caste hierarchy.

“Ambedkar used ‘Dalit’ as a quasi-class term, included within its ambit was the downtrodden and poor. This gave character to the germinating anti-caste movement at the time.”Dr. Anand Teltumbde

It was around this time that the Poona Pact was signed. Mahatma Gandhi had insisted that Dalits be given representation, but within the Hindu fold, while Ambedkar demanded a separate electorate. Gandhi chose to call Dalits Harijans –– or children of god –– but this was a term that did not find favour within the community.

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Dalit thinkers and revolutionaries, Ambedkar included, have rejected the term Harijan to describe themselves on accounts of it being condescending. Historian Ramachandra Guha says:

“In truth, Gandhi’s own earlier coinage, ‘suppressed classes’, explicitly targeted social discrimination, whereas ‘Harijan’ euphemized it.”

By the 1970s, under the backdrop of caste atrocity and lack of political representation, Dalit as a term began to acquire a political meaning. ‘Dalit’ literature began to use the term for people of all castes and communities and academics began to use it to highlight the history of those who had been historically oppressed.

At the forefront of the new assertive movement were the Dalit Panthers, a prominent activist group who played a key role in making the term a self-chosen one. Dr. Eleanor Zelliot, a pioneer of Western studies of Dr BR Ambedkar, describes the phenomenon in her paper Understanding Dr BR Ambedkar :

“Dalit became a self-chosen term in 1972 when a group of Bombay youths organised the ‘Dalit Panthers’, in an effort to encourage the militancy of the American‘black panthers’ . Like the word ‘black’ in the USA, it was used proudly.”

With an increasing awareness of a separate Dalit political identity in 1980s, groups and political parties such as the Bahujan Samaj Party emerged, anchoring their politics on the Dalit vote-base.
दलितों का इतिहास



भारत के दलितों/पिछड़ों को अपना इतिहास जानना आवश्यक है। जब तक ये लोग अपना इतिहास नहीं जानेगें तब तक इनमें आपसी प्रेम -भाव पैदा नहीं होगा।

जो अपने को कृष्ण का वंशज मानते हैं , उन्हें जानना चाहिए कि ऋग्वेद में कृष्ण को असुर लिखा गया है।आर्यों के राजा इन्द्र से अनार्य कृष्ण का युद्ध हुआ था। युद्ध में हारने पर इन्द्र ने यमुना नदी का बाॅध कटवा दिया था जिससे वृन्दावन-मथुरा क्षेत्र में पानी भर गया था तब कृष्ण के बस्ती के लोग गोवर्धन पर्वत पर चले गये थे। कृष्ण के आठ विवाह हुए थे जिसमें यदुवंश के अतिरिक्त आदिवासी समाज से भी उनकी पत्नियाॅ थीं,जिससे प्रमाणित होता है कि उस समय जातियाॅ या तो थीं नहीं,अगर थीं तो विवाह का कोई जातीय प्रतिबन्ध नहीं था।

कृष्ण की एक पत्नी रूकमणी से प्रद्युम्न पैदा हुए।प्रद्युम्न के पुत्र अनिरूद्ध थे,जिनका विवाह वाणासुर की पुत्री ऊषा के साथ हुआ था।वाणासुर ने ही वाराणसी नगर बसाया था,जो उसकी राजधानी थी। पाठकगण विचार करें कि वाणासुर तो असुर परिवार से थे,फिर कृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध का विवाह कैसे हुआ? क्यो कि कृष्ण भी असुर थे।

इसलिए बराबरी के कारण ही अनिरूद्ध का विवाह ऊषा से हुआ था। वाणासुर के पिता राजा बली थे, जिन्हें आर्य इन्द्र के भाई विष्णु ने छल से (वामन रूप में)मारा था। पुरोहित /ब्राह्मण जब यजमान के हाथ में लाल- पीला धागा(कलावा) तथाकथित रक्षासूत्र के रूप में बाॅधता है तो मंत्र पढ़ता है-

"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्र महाबलः।
तेन त्वाम् प्रतिवद्धनामि रक्ष,माचल-माचल।"

अर्थात् जिससे (रक्षासूत्र से)

दानवराज , महाबली राजा बली को बाॅधा गया था, उसी से तुमको बाॅधता हूॅ , (मेरी)रक्षा करना, चलायमान न होना। चलायमान न होना। (अडिग रहना)

धागा बाॅधकर पुरोहित अपनी रक्षा का वचन यजमान से लेता है। जानकारी न होने के कारण आज पिछड़े/दलित समाज के लोग यह धागा बाॅधकर गौरान्वित होते हैं। उन्हें यह नहीं मालूम कि यह धागा मानसिक गुलामी का प्रतीक है।

राजा बली के पिता का नाम विरोचन था। विरोचन के पिता का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद के पिता का नाम हिरण्यकश्यप था। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी, जिसका नाम होलिका था। होलिका युवा और बहादुर लड़की थी। वह आर्यों से युद्ध में हिरण्यकश्यप के समान ही लड़ती थी।हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद निकम्मा और अवज्ञाकारी था। आर्यों ने उसे सुरा पिलापिलाकर नशेड़ी बना दिया था। जिससे वह आर्यों का दास(भक्त) बन गया था। नशेड़ी हो जाने के कारण वह अपने नशेड़ी साथियों के साथ बस्ती से बाहर ही रहता था। पुत्र मोह के कारण प्रह्लाद की माॅ अपनी ननद होलिका से उसके लिए खाना (भोजन)भेजवा दिया करती थी। एक दिन होलिका शाम के समय जब उसे भोजन देने गयी तो नशेड़ी आर्यों ने उसके साथ बदसलूकी की और फिर उसे जलाकर मारडाला।

प्रातः तक जब होलिका घर न पहॅची , तब राजा को बताया गया। राजा ने पता लगवाया तो मालूम हुआ कि शाम को होलिका इधर गयी थी लेकिन वापस नहीं आई। तब राजा ने उस क्षेत्र के आर्यों को पकड़वाकर और उनके मुॅह पर कालिख पोतवाकर ,माथे पर कटार या तलवार से चिन्ह बनवा दिया और घोषित कर दिया कि ये कायर लोग हैं।

साहित्य में वीर शब्द का अर्थ है बहादुर या बलवान।

वीर के आगे 'अ' लगाने पर अवीर हो जाता है।

अवीर का मतलब कायर या बुजदिल।

होली के दिन लोग माथे पर जो लाल -हरा- पीला रंग लगाते हैं उसे अवीर कहते हैं।

यह कायरता की निशानी है। दलित/पिछड़ों को यह नहीं लगाना चाहिए। न ही होली में खुशियाॅ मनानी चाहिए।

बल्कि दलितों/पिछड़ों को होली को होलिका शहादत- दिवस के रूप में मनाना चाहिए। जिस समय यह घटना घटी थी, उस समय जातियाॅ नहीं थीं।जातियां बाद में बनी।

इस कारण होलिका, 
DNA रिपोर्ट के अनुसार सभी दलित/पिछड़ों की बहन/बुआ थी।

जो अपने को हिन्दू समझते हैं, वे आज भी रात्रि में अपना मुर्दा नहीं जलाते हैं। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में स्वयं नहीं बैठी थी। यदि गोद में लेकर बैठी होती तो दोनों जलकर राख हो जाते। ऐसा असम्भव है कि साथ -साथ बैठे व्यक्ति में से एक न जले। कृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध का विवाह वाणासुर कीपुत्री ऊषा से हुआ था तो अनिरूद्ध के पिता प्रद्युम्न और ऊषा के पिता वाणासुर आपस में रिस्तेदार थे। अनिरूद्ध के बाबा कृष्ण और ऊषा के बाबा राजा बली आपस में रिस्तेदार थे। इस प्रकार राजाबली के पिता विरोचन,विरोचन के पिता प्रह्लाद,प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप भी अनिरूद्ध से लेकर वसुदेव और नन्दबाबा तक आपसमें रिस्तेदार रहें होंगे।

आज यादव समाज अपने को कृष्ण का वंशज मानता है , तो वाणासुर से लेकर हिरण्यकश्यप तक सभी यादवों के रिस्तेदार प्रमाणित होते हैं।तब होलिका भी यादवों की रिस्तेदार थी।जिस समाज के रिस्तेदारों का जिस दिन कत्ल किया गया हो, उस दिन उस समाज के लोगों द्वारा शहादत दिवस मनाया जाना चाहिए।दलित/पिछड़ा /यादव समाज कुछ पढ़ना नहीं चाहता , जिससे उसे अपने इतिहास की जानकारी नहीं हो पा रही है।जानकारी के अभाव में अपने पूर्वजों के हत्यारों राम ,दुर्गा आदि की जय जय करता है।

दलित

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

"दलित" शब्द की व्याखा, अर्थ तुलनात्मक दृष्टी से देखे तो इसका विरुद्ध विषलेशण इस प्रकार है।

दलित
कुल जनसंख्या

ख़ास आवास क्षेत्र

भारत 20.14 करोड़ (2011)

बांग्लादेश 65 लाख (2010)

नेपाल 50 लाख (2011)

श्रीलंका 50 लाख (2011)

पाकिस्तान 30 लाख (2011)


संयुक्त राज्य अज्ञात (2013)

कनाडा 2.5 लाख (2013)

मलेशिया अज्ञात (2013)

सिंगापुर अज्ञात (2013)


भाषाएँ

दक्षिण एशियाई भाषा
धर्म
अन्य सम्बंधित समूह
इंडो आर्यन, द्रविड़, मुंडा

दलित का शाब्दिक अर्थ पिडीत, शोषित, दबा हुआ, खिन्न, उदास, टुकडा, खंडित, तोडना, कुचलना, दला हुआ, पिसा हुआ, मसला हुआ, रौंदा हुआ, विनष्ट हुआ होता है। परन्तु अब अनुसूचित जाति को दलित कहा जाता है, अब दलित शब्द पूर्ण रूप से जाति विशेष के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हजारों वर्षों तक अस्‍पृश्‍य या अछूत समझी जाने वाली उन सभी शोषित जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्‍त होता है जो हिंदू धर्मशास्त्रों द्वारा हिंदू समाज व्‍यवस्‍था में सबसे निचले (चौथे) पायदान पर स्थित है। और बौद्ध ग्रन्थ में पाँचवे पायदान पर (चांडाल) है संवैधानिक भाषा में इन्‍हें ही अनुसूचित जाति कहा गया है। भारत की जनगणना २०११ के अनुसार भारत की जनसंख्‍या में लगभग 16.6 प्रतिशत या 20.14 करोड़ आबादी दलितों की है। आज अधिकांश हिंदू दलित बौद्ध धर्म के तरफ आकर्षित हुए हैं और हो रहे हैं, क्योंकी बौद्ध बनने से हिंदू दलितों का विकास हुआ हैं।

"दलित" - : पिडीत, शोषित, दबा हुआ, खिन्न, उदास, टुकडा, खंडित, तोडना, कुचलना, दला हुआ, पिसा हुआ, मसला हुआ, रौंदा हुआ, विनष्ट

"फलित" - : पिडामुक्त, उच्च, प्रसन्न, खुशहाल, अखंड, अखंडित, जोडना, समानता, एकरुप, पूर्णरूप, संपूर्ण

अर्थ व अवधारणा

दलित शब्‍द का शाब्दिक अर्थ है- दलन किया हुआ। इसके तहत वह हर व्‍यक्ति आ जाता है जिसका शोषण-उत्‍पीडन हुआ है। रामचंद्र वर्मा ने अपने शब्‍दकोश में दलित का अर्थ लिखा है, मसला हुआ, मर्दित, दबाया, रौंदा या कुचला हुआ, विनष्‍ट किया हुआ। पिछले छह-सात दशकों में 'दलित' पद का अर्थ काफी बदल गया है। डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर के आंदोलन के बाद यह शब्‍द हिंदू समाज व्‍यवस्‍था में सबसे निचले पायदान पर स्थित हजारों वर्षों से अस्‍पृश्‍य समझी जाने वाली तमाम जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयोग होता है। अब दलित पद अस्‍पृश्‍य समझी जाने वाली जातियों की आंदोलनधर्मिता का परिचायक बन गया है। भारतीय संविधान में इन जातियों को अनुसूचित जाति नाम से जाना जाता है। भारतीय समाज में वाल्‍मीकि या भंगी को सबसे नीची जाति समझा जाता रहा है और उसका पारंपरिक पेशा मानव मल की सफाई करना रहा है। परन्तु आज के समय में इस स्थिति में बहुत बदलाव आया है। दलित का अर्थ शंकराचार्य ने मधुराष्टकम् में द्वैत से लिया है।उन्होंने "दलितं मधुरं" कहकर श्रीकृष्ण को संम्बोधित किया है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य

भारत में दलित आंदोलन की शुरूआत ज्योतिराव गोविंदराव फुले के नेतृत्व में हुई। ज्योतिबा जाति से माली थे और समाज के ऐसे तबके से संबध रखते थे जिन्हे उच्च जाति के समान अधिकार नहीं प्राप्त थे। इसके बावजूद ज्योतिबा फूले ने हमेशा ही तथाकथित 'नीची' जाति के लोगों के अधिकारों की पैरवी की। भारतीय समाज में ज्योतिबा का सबसे दलितों की शिक्षा का प्रयास था। ज्योतिबा ही वो पहले शख्स थे जिन्होंन दलितों के अधिकारों के साथ-साथ दलितों की शिक्षा की भी पैरवी की। इसके साथ ही ज्योति ने महिलाओं के शिक्षा के लिए सहारनीय कदम उठाए। भारतीय इतिहास में ज्योतिबा ही वो पहले शख्स थे जिन्होंने दलितों की शिक्षा के लिए न केवल विद्यालय की वकालत की बल्कि सबसे पहले दलित विद्यालय की भी स्थापना की। ज्योति में भारतीय समाज में दलितों को एक ऐसा पथ दिखाया था जिसपर आगे चलकर दलित समाज और अन्य समाज के लोगों ने चलकर दलितों के अधिकारों की कई लड़ाई लडी। यूं तो ज्योतिबा ने भारत में दलित आंदोलनों का सूत्रपात किया था लेकिन इसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने किया। एक बात और जिसका जिक्र किए बिना दलित आंदोलन की बात बेमानी होगी वो है बौद्ध धर्म। ईसा पूर्व 600 ईसवी में ही बौद्ध धर्म ने हिंदू समाज के निचले तबकों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। भगवान गौतम बुद्ध ने इसके साथ ही बौद्ध धर्म के जरिए एक सामाजिक और राजनीतिक क्रांति लाने की भी पहल की। इसे राजनीतिक क्रांति कहना इसलिए जरूरी है क्योंकि उस समय सत्ता पर धर्म का आधिपत्य था और समाज की दिशा धर्म के द्वारा ही तय की जाती थी। ऐसे में समाज के निचले तलबे को क्रांति की जो दिशा भगवान बुद्ध ने दिखाई वो आज भी प्रासांगिक है। भारत में चार्वाक के बाद भगवान बुद्ध ही पहले ऐसे शख्स थे जिन्होंने ब्राह्मणवाद, जातीवाद और अंधविश्वास के खिलाफ न केवल आवाज उठाई बल्कि एक दर्शन भी दिया। जिससे कि समाज के लोग बौद्धिक दास्यता की जंजीरों से मुक्त हो सकें।

यदि समाज के निचले तबकों के आदोलनों का आदिकाल से इतिहास देखा जाए तो चार्वाक को नकारना भी संभव नहीं होगा। यद्यपि चार्वाक पर कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं इसके बावजूद चार्वाक वो पहला शख्स था जिसने लोगों को भगवान के भय से मुक्त होने सिखाया। भारतीय दर्शन में चार्वाक ने ही बिना धर्म और ईश्वर के सुख की कल्पना की। इस तर्ज पर देखने पर चार्वाक भी दलितों की आवाज़ उठाता नज़र आता है।....खैर बात को लौटाते हैं उस वक्त जिस वक्त दलितों के अधिकारों को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने लड़ाई शुरू कर दी थी।..वक्त था जब हमारा देश भारत ब्रिटिश उपनिवेश की श्रेणी में आता था। लोगों के ये दासता का समय रहा हो लेकिन दलितों के लिए कई मायनों में स्वर्णकाल था।

आधुनिक भारत व दलित अधिकार

आज दलितों को भारत में जो भी अधिकार मिले हैं उसकी पृष्ठभूमि इसी शासन की देन थी। यूरोप में हुए पुर्नजागरण और ज्ञानोदय आंदोलनों के बाद मानवीय मूल्यों का महिमा मंडन हुआ। यही मानवीय मूल्य यूरोप की क्रांति के आदर्श बने। इन आदर्शों की जरिए ही यूरोप में एक ऐसे समाज की रचना की गई जिसमें मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी गई। ये अलग बाद है कि औद्योगिकीकरण के चलते इन मूल्यों की जगह सबसे पहले पूंजी ने भी यूरोप में ली। ..लेकिन इसके बावजूद यूरोप में ही सबसे पहले मानवीय अधिकारों को कानूनी मान्यता दी गई। इसका सीधा असर भारत पर पड़ना लाजमी था और पड़ा भी। इसका सीधा सा असर हम भारत के संविधान में देख सकते हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना से लेकर सभी अनुच्छेद इन्ही मानवीय अधिकारों की रक्षा करते नज़र आते हैं। भारत में दलितों की कानूनी लड़ाई लड़ने का जिम्मा सबसे सशक्त रूप में डॉ॰ अम्बेडकर ने उठाया। डॉ अम्बेडकर दलित समाज के प्रणेता हैं। बाबा साहब अंबेडकर ने सबसे पहले देश में दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की।

साफ दौर भारतीय समाज के तात्कालिक स्वरूप का विरोध और समाज के सबसे पिछडे़ और तिरस्कृत लोगों के अधिकारों की बात की। राजनीतिक और सामाजिक हर रूप में इसका विरोध स्वाभाविक था। यहां तक की महात्मा गांधी भी इन मांगों के विरोध में कूद पड़े। बाबा साहब ने मांग की दलितों को अलग प्रतिनिधित्व (पृथक निर्वाचिका) मिलना चाहिए यह दलित राजनीति में आज तक की सबसे सशक्त और प्रबल मांग थी। देश की स्वतंत्रता का बीड़ा अपने कंधे पर मानने वाली कांग्रेस की सांसें भी इस मांग पर थम गई थीं। कारण साफ था समाज के ताने बाने में लोगों का सीधा स्वार्थ निहित था और कोई भी इस ताने बाने में जरा सा भी बदलाव नहीं करना चाहता था। महात्मा गांधी जी को इसके विरोध की लाठी बनाया गई और बैठा दिया गया आमरण अनशन पर। आमरण अनशन वैसे ही देश के महात्मा के सबसे प्रबल हथियार था और वो इस हथियार को आये दिन अपनी बातों को मनाने के लिए प्रयोग करते रहते थे। बाबा साहब किसी भी कीमत पर इस मांग से पीछे नहीं हटना चाहते थे वो जानते थे कि इस मांग से पीछे हटने का सीधा सा मतलब था दलितों के लिए उठाई गई सबसे महत्वपूर्ण मांग के खिलाफ में हामी भरना। लेकिन उन पर चारों ओर से दबाव पड़ने लगा। और अंततः पूना पैक्ट के नाम से एक समझौते में दलितों के अधिकारों की मांग को धर्म की दुहाई देकर समाप्त कर दिया गया। इन सबके बावजूद डॉ॰अंबेडकर ने हार नहीं मानी और समाज के निचले तबकों के लोगों की लड़ाई जारी रखी। अंबेडकर की प्रयासों का ही ये परिणाम है कि दलितों के अधिकारों को भारतीय संविधान में जगह दी गई। यहां तक कि संविधान के मौलिक अधिकारों के जरिए भी दलितों के अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश की गई।

दलित समाज के प्रेरणास्रोत व्‍यक्ति

दलित साहित्य

हालांकि साहित्य में दलित वर्ग की उपस्थिति बौद्ध काल से मुखरित रही है किंतु एक लक्षित मानवाधिकार आंदोलन के रूप में दलित साहित्य मुख्यतः बीसवीं सदी की देन है।रवीन्द्र प्रभात ने अपने उपन्यास ताकि बचा रहे लोकतन्त्र में दलितों की सामाजिक स्थिति की वृहद चर्चा की है वहीं डॉ॰एन.सिंह ने अपनीं पुस्तक "दलित साहित्य के प्रतिमान " में हिन्दी दलित साहित्य के इतिहास कों बहुत ही विस्तार से लिखा है।"ठाकुर का कुँआ"प्रेमचन्द्र की एक प्रसिद्ध कहानी है,जिसका कथानक अस्पृश्यता पर केंद्रित है।कहानी की मुख्य पात्र गंगी अपने बीमार पति के लिए कुएँ का साफ पानी नहीं ला पाती है, क्योंकि उच्च जाति के लोग दलितों को अपने कुएँ से पानी नहीं लाने देतें हैं।
बौद्ध बनने से जीवन सुधार

दलितों को लगने लगा है कि हिंदू धर्म से बाहर निकलना उनके लिए बेहतर रास्ता हो सकता है क्योंकि बीते सालों में नवयान बौद्धों की हालत सुधरी है जबकि हिंदू दलितों की जिंदगी वोट बैंक के रूप संगठित होने के बावजूद ज्यादा नहीं बदली है।

बौद्धों का जीवन सुधार

सन 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में बौद्धों की जनसंख्या अस्सी लाख है जिनमें से अधिकांश नवबौद्ध यानि हिंदू दलितों से धर्म बदल कर बने हैं। सबसे अधिक 59 लाख बौद्ध महाराष्ट्र में बने हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ 3 लाख के आसपास नवबौद्ध हैं फिर भी कई इलाकों में उन्होंने हिंदू कर्मकांडों को छोड़ दिया है। पूरे देश में 1991 से 2001 के बीच बौद्धों की आबादी में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 1. लिंग अनुपात

हिन्दू दलितों के 936 की तुलना में बौद्धों के बीच महिला और पुरुष का लिंग अनुपात 953 प्रति हजार है। यह सिद्ध करता है कि बौद्ध परिवारों में महिलाओं की स्थिति में अब तक हिन्दू दलितों की तुलना में बेहतर है। यह काफी बौद्ध समाज में महिलाओं की उच्च स्थिति के अनुसार है। बौद्धों का यह अनुपात हिन्दुओं (931), मुसलमानों (936), सिख (893) और जैन (940) की तुलना में अधिक है। 2. बच्चों का लिंग अनुपात (0-6 वर्ष)

2001 की जनगणना के अनुसार बौद्धों के बीच लड़कियों और लड़कों का लिंग अनुपात 942 है, हिन्दू दलितों के 938 के मुकाबले के अनुसार यह अधिक हैं। यह लिंग अनुपात हिन्दुओं (925), सिख (786) की तुलना में बहुत अधिक है, और जैन (870)। यह हिंदू दलित परिवारों के साथ तुलना में है कि लड़कियों को बौद्धों के बीच बेहतर देखभाल और संरक्षण मिला हैं। 3. साक्षरता दर

बौद्ध अनुयायिओं की साक्षरता दर 72.7 प्रतिशत है जो हिन्दू दलितों (54.70 प्रतिशत) की तुलना में बहुत अधिक है। इस दर में भी हिंदुओं (65.1), मुसलमानों (59.1) और सिखों (69.4) की तुलना में काफी ज्यादा यह पता चलता है कि बौद्ध धर्म हिन्दू दलितों से भी अधिक साक्षर हैं।जबकि यह जैनों की साक्षरता दर से बहुत कम है।जैन ९५% साक्षर हैं। 4. महिलाओं की साक्षरता

बौद्ध महिलाओं की साक्षरता दर के रूप में हिंदू दलित महिलाओं के 41.9 प्रतिशत की तुलना में 61.7 प्रतिशत है। यह दर हिंदुओं (53.2) और मुसलमानों (50.1) की तुलना में भी अधिक है। यह बौद्ध समाज में महिलाओं की स्थिति के अनुसार है। इससे पता चलता है कि बौद्धों के बीच महिलाए हिंदू दलित महिलाओं की तुलना में अधिक शिक्षित हो रही है। जबकि यह जैनों से कम है।जैन महिला साक्षरता दर ९०% है। 5. काम में भागीदारी दर

बौद्धों के लिए यह दर 40.6 प्रतिशत सबसे अधिक है जो हिन्दू दलितों के लिए अधिक से अधिक 40.4 प्रतिशत है। यह दर हिंदुओं (40.4), मुसलमानों (31.3) ईसाई (39.3), सिख (31.7) की तुलना में भी अधिक है, और जैन (32.7)। यह साबित करता है कि बौद्ध धर्म हिन्दू दलितों से भी अधिक कार्यरत हैं।

पूर्ण बहुजन समाज

कोई भी धर्म अपनी विशेष पहचान कैसे बनाता है और कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह किसी धर्म विशेष से स्वयं को कैसे जोड़ता है – यह एक महत्वपूर्ण विषय है। यह न सिर्फ धर्म विशेष को परिभाषित करता है, बल्कि उसके समुदाय के चरित्र विशेष को भी उसके दर्शन इतिहास संस्कृति और मान्यताओं के आईने में एक ख़ास पहचान देता है। इस पहचान का एक स्पष्ट अतीत वर्तमान और भविष्य होता है। विश्व भर में फैले धर्मों और धार्मिक समुदायों में यह बात देखी जा सकती हैं।


प्राचीन हड़प्पा की सील में बैठे संभुशेक जिनके सर पर महिषासुर मुकुट है और ऊपर सिन्धु लिपि में लिखा सन्देश जिसे गोंडी व्याकरण से अब पढ़ा जा चुका है, डॉ. कंगाली के अनुसार गोंडी भाषा में इसका अर्थ है- आंद कोय पारी पहांदी मुठवापोय आंद। हिंदी में इसका अर्थ है – यह कोया पारी पहांदी गुरुमुखिया हैं। (बाएं)

महान गोंडी दार्शनिक पारी कुपार लिंगो जो बाघ के चरम पर बैठे हैं, जिनके सर पर महिषासुर मुकुट है दायें हाथ से प्राचीन योग की बुद्धि मुद्रा बनाए हुए हैं और बाएं हाथ में पवित्र गोंडी धर्मचिन्ह धारण किये हैं (मध्य में) कुपार लिंगो के हाथ में नजर आने वाला पवित्र गोंडी धर्मचिन्ह का वास्तविक वर्त्तमान रूप जो वास्तव में शिवलिंग का आदिरूप है (दाएं)

जहां-जहां धर्म को एक अनिवार्य जोड़ने वाली विचारधारा या जीवन शैली की तरह देखा जाता है वहां-वहां धर्म स्वयं की एक स्पष्ट परिभाषा रखता है और अपने अनुयायियों को भी उतनी ही स्पष्टता से परिभाषित करते हुए आपस में जोड़ता है। क्या यह बात भारतीय धर्म के बारे में और भारत में बसने वाले समुदायों के बारे में सही है? यह मात्र एक प्रश्न ही नहीं है बल्कि स्वयं में कई अन्य प्रश्नों का उत्तर भी है, और हजारों अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने वाला सूत्र उपलब्ध करवाता है। इसके सहारे हम न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के दार्शनिक, धार्मिक, भाषायिक और ऐतिहासिक क्रमविकास को जान सकते हैं बल्कि यह भी जान सकते हैं कि एक ही धर्म में होने के बावजूद इस हिन्दू कहे जाने वाले समुदाय में इतना भेदभाव और अलगाव क्यों है।

इस सन्दर्भ में डॉ. अंबेडकर के अध्ययन को देखते हैं। वे अपनी महत्वपूर्ण रचना ‘रिडल्स इन हिन्दुइज्म’ में विभिन्न धर्मों और उनके मानने वालों की पहचान पर एक तार्किक सवाल उठाते हैं। किताब की शुरुआत में ही वे यह सवाल पूछते हैं कि कोई पारसी खुद को पारसी क्यों कहता है या कोई इसाई खुद को इसाई कहता है। इस सवाल के लिए उसके पास एक स्पष्ट उत्तर होता है। डॉ. अंबेडकर आगे बढ़कर लिखते हैं कि यही सवाल आप किसी हिन्दू से पूछिए कि वो हिन्दू क्यों है? डॉ. अंबेडकर स्वयं इस प्रश्न से उपजने वाली उलझन के बारे में लिखते हैं कि इस सवाल पर सोचते हुए एक हिन्दू चकरा जाएगा। वह यह नहीं बता सकेगा कि हिन्दू होने का क्या अर्थ होता है और किस चीज में विश्वास रखने पर कोई हिन्दू बनता है (अंबेडकर , 2009)। इस तरह से किताब और विमर्श की शुरुआत करते हुए वे यह स्थापित करना चाहते हैं कि धर्म विशेष से संबद्ध होने के लिए किन्ही विशेष विश्वासों मान्यताओं अभ्यासों और कर्मकांडों की आवश्यकता होती है। इसका यह अर्थ भी हुआ कि एक ही धर्म के मानने वालों में इन आधारों पर साम्य होना चाहिए। एक दूसरे से भिन्न या विपरीत विश्वासों और व्यवहारों वाले लोगों को एक धर्म का अनुयायी नहीं माना जा सकता।

इस दृष्टि से देखें तो स्पष्ट होता है कि सेमेटिक मूल के तीन मुख्य धर्मों यहूदी, इसाइयत और इस्लाम में आंतरिक भेद कितने ही हों, लेकिन उनकी दुनिया भर में फ़ैली आबादी स्वयं को यहूदी इसाई या मुस्लिम साबित करने के लिए बहुत ही ठोस और सर्वमान्य आधारों की तरफ संकेत कर पाती है। ये संकेत उनकी एक किताब, एक पैगम्बर या एक इश्वर को लेकर है। इसी तरह भारत में श्रमण परम्परा से उपजे दो महत्वपूर्ण धर्मों बौद्ध और जैन धर्म में भी यह सुविधा है। जैन तो खैर भारत में ही सिमट गए हैं, लेकिन बौद्धों की विश्व भर में फ़ैली आबादी कुछ बहुत महत्वपूर्ण विश्वासों के आधार पर हमेशा से एकता के सूत्र में बंधी रहती आई है। ये विश्वास असल में बुद्ध, धम्मपद, त्रिशरण मन्त्र और त्रिपिटकों में विश्वास है जो उन सबको एकसूत्र में बांधता है। साथ ही इश्वर और अनश्वर आत्मा के निषेध सहित क्षणवाद और शून्य के दर्शन के प्रति निष्ठा भी उनकी एकता को सिद्ध करता है। ठीक उसी तरह जैसे विश्व भर के मुस्लिमों की बिना शर्त निष्ठा एक अल्लाह एक कुरआन और एक मुहम्मद में है।

अब हम इसी क्रम में भारत के सबसे प्रमुख धर्म हिन्दू धर्म को देखते हैं। यहाँ एक किताब एक पैगंबर और एक भगवान् का सिद्धांत काम नही करता। एक ही हिन्दू परिवार में कोई योगी हो सकता है कोई तांत्रिक हो सकता है और कोई नास्तिक भी हो सकता है। यहाँ तक कि परिवार के भीतर ही दो विपरीत विश्वासों वाले लोग भी हो सकते हैं। एक अर्थ में यह बहुत प्रगतिशील घटना नजर आती है। इससे बहुत सरल सा जो संकेत मिलता है वो ये कि भारतीय हिन्दू परिवार धर्म और पंथ सहित विश्वास और कर्मकांड के प्रति बहुत सेक्युलर या लिबरल हैं। और इसी अर्थ में हिन्दू धर्म के प्रशंसक इसे सबसे अधिक सहिष्णु और समावेशी धर्म बतलाते आये हैं। लेकिन यह इतिहास के हज़ारों साल के विस्तार में निर्मित हुई विराट तस्वीर का एक छोटा सा पहलू भर है। इसके अन्य छुपे हुए पहलू भी हैं जो अब इतिहास के इस मोड़ पर आकर अधिक शोध और स्पष्टता की मांग करते हैं। विशेष रूप से भारत में स्वयं को हिन्दू न मानने वाले लोगों की तरफ से उठ रहे तर्कों और तथ्यों के प्रकाश में अब हमें हिन्दू धर्म के पूरे इतिहास और इसके सम्प्रदायों सहित इसके विराट मिथकशास्त्र पर बहुत तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टि से पुनर्विचार करना होगा। यह पुनर्विचार इसलिए भी आवश्यक हो रहा है क्योंकि अब एक संस्कृति समझे जाने वाले समुदायों की धार्मिक सामाजिक और कर्मकांड गत मान्यताएं अपने विशिष्ट अर्थों में स्वयं ही अपनी भिन्नता की घोषणा करने लगी हैं। विशेष रूप से अब तक उपेक्षित और तिरस्कृत समाजों की जीवनधारा में बहता आया धर्म और उनकी अपनी संस्कृति के प्रवाह से बहुत कुछ ऐसा उपलब्ध हो रहा है जो एक नये ही नेरेटिव को उभार रहा है। यह भारत के मूल निवासियों और बहुजनों का मूल नेरेटिव है। नए तथ्यों के प्रकाश में प्राचीन मान्यताओं और मिथकों पर पुनर्विचार ने एक नया ही जगत खोल दिया है।

यह पुनर्विचार महात्मा ज्योतिबा फूले ने बहुत वैज्ञानिक ढंग से आरंभ किया और अपनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक गुलामगिरी में उन्होंने हिन्दू मिथकों की और उनके आधार पर प्रचारित की गयी मान्यताओं की बहुत कठोर निंदा की है साथ ही उन्होंने उन मिथक प्रतीकों में छुपे हुए षड्यंत्रों को भी उजागर किया है (ओ’ हैनलों,1985) । डॉ. अंबेडकर ने भी रिडल्स इन हिन्दुइज्म में बहुत स्पष्ट सन्देश दिया है कि भारतीय शास्त्रकारों ने मिथकीय व्याख्याओं के आधार पर इस धर्म और इसके समाजशास्त्र का ढांचा खडा किया है। डॉ. अंबेडकर और महात्मा ज्योतिबा फूले के अध्ययन को आधार बनाकर देखें और उनके बाद के आधुनिक शोधकर्ताओं और लेखकों को देखें तो स्पष्ट होता जाता है कि इसमें से अधिकाँश मिथकीय चरित्र और उनके द्वारा दिए गए सन्देश किन्ही सच्चाइयों को छुपाकर किन्ही गलत तथ्यों को प्रचारित करने के लिए ही गढ़े गए हैं। विशेष रूप से देबी प्रसाद चटोपाध्याय डी.डी.कोसांबी और गेल ओमवेट का अध्ययन बहुत स्पष्टता से बतलाता है कि भारतीय मिथकों ने कैसे आकार लिया है और उनके आकार और उनकी दिशा विशेष की मौलिक प्रेरणाएं कहाँ है।


वर्त्तमान शिवलिंग जो कि ब्राह्मणी धर्म ने कुपार लिंगो के गोंडी धर्म और दर्शन और गोंडी धर्म से लिया है

अभी तक अनुमान और तर्क पर आधारित मान्यताओं को अब जमीनी आंकड़े मिलने लगे हैं। मिथकों के पुनर्पाठ की परम्परा स्थापित हो रही है। महिषासुर पर अपनी खोजपूर्ण किताब में प्रमोद रंजन कई पहलुओं से महिषासुर मिथक की एक अन्य व्याख्या की तरफ इशारा करते हैं (रंजन, 2014) । इस किताब से ऐसे प्रमाण मिलते हैं जो किसी खोई हुई बहुजन संस्कृति की तरफ इशारा करते हैं, और एक खो गए नेरेटिव को उसकी पूर्णता में देखने परखने का आह्वान करते हैं। विशेष रूप से शुभ-अशुभ, सभ्य-असभ्य आर्य-अनार्य की जो बहस ब्राह्मणी समाज ने हजारों साल से चलाई हुई है, उसके खिलाफ एक नया विमर्श इस किताब से उभरता है। आर्यों के मिथकीय आख्यानों की धुंध में भारत की जिन मूल संस्कृतियों और दर्शनों सहित जीवन पद्धतियों तक को दफ़न कर दिया गया है – उनके बारे में कई सारे संकेत प्रमोद रंजन की इस छोटी सी किताब में मिलते हैं, जैसे कि महिषासुर सिर्फ एक मिथकीय चरित्र नहीं हैं बल्कि आज भी ज़िंदा असुर जनजाति के लिए और अन्य मूलनिवासी जातियों के लिए पूज्य देवता और शूरवीर हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि यह किताब और इसकी सामग्री एक नए ही दार्शनिक और सांस्कृतिक विमर्श के प्रस्थान बिंदु का निर्माण कर रही है। इस क्रम में ज़िंदा दस्तावेज और उन्हें दोहराने वाले कई ओबीसी, आदिवासी, और दलित समाज और कई हजार व्यक्ति आगे आ रहे हैं. और गौर से देखा जाए तो असल में यही तीन श्रेणियां हैं जो भारत के बहुजन समाज के रूप में ब्राह्मणी मिथक शास्त्रों के निशाने पर हमेशा से रही हैं। सदियों से इन्ही के नायकों देवी देवताओं और इन्ही के जीवन दर्शन सहित इनके प्राकृतिक संसाधनों को चुराया गया है। इसलिए इतनी भूमिका के बाद हम इस देश में सदियों से चलते आये साहित्यिक और दार्शनिक चौर्यकर्म को गहराई से देखने का प्रयास करेंगे। आगे हम देखेंगे कि किस प्रकार इस तथाकथित मुख्य धारा का हिन्दू समाज या ब्राह्मणी धर्म व दर्शन असल में हिन्दू समझे जाने वाले अधिकाँश बहुजनों से चुराकर उन्ही के खिलाफ रचा गया है, और किस प्रकार इतिहास के हर मोड़ पर बहुजन समाज के नायकों और उनके शास्त्रों सहित उनके प्रतीकों और कर्मकांडों को भी चुराकर उनका ब्राह्मणीकरण किया गया है। बहुजनों की भौतिकवादी प्रकृतिपूजक और मातृसत्तात्मक संस्कृति और दर्शन को चुराकर उसे अपना बनाया गया है और उसके खिलाफ षड्यंत्र करके बहुजन नायकों को राक्षस, दैत्य और असभ्य साबित किया गया है। इस विषय को हम चरण दर चरण समझने का प्रयास करते हैं।

भारत में इतिहास की बजाय मिथकीय पुराण क्यों लिखा गया ?
किसी भी सभ्य समाज के पास एक लिखित और सुव्यवस्थित इतिहास होता है। यही उसके संगठित वर्तमान और उतने ही संगठित व सुपरिभाषित भविष्य का स्त्रोत भी होता है। यह सुपरिभाषित भविष्य उस समाज या देश की पूरी जनसंख्या को एकसाथ एक लक्ष्य के लिए आंदोलित करता है। विश्व के सभी समाज किसी न किसी अर्थ में तथ्यात्मक रूप से अपना इतिहास लिखते हैं। उस समाज की पहचान और उसका मौलिक दर्शन इस इतिहास में प्रतिबिंबित होता है। अगर वह न होता हो तो इसका एक ही अर्थ है कि यह समाज नहीं है बल्कि ऐसे लोगों की भीड़ है जो समाज के निर्माण की लड़ाई अभी जीत नहीं सके हैं। एक समान जीवन जीने वाले, एक जैसी मान्यताओं और आचार विचार वाले लोगों में एक भावनात्मक और तार्किक संगति होती है जो काल के तीनों खण्डों में उनके एक्य को न सिर्फ संभव बनाती है बल्कि अन्य अनेक तरह के एकीकरणों को संभव करती जाती है।

इस अर्थ में इतिहास बोध असल में संस्कृति बोध से अनिवार्य रूप से जुड़ता है। इसी तर्क में और आगे चलकर देखें तो यह भी पता चलता है कि समय के विस्तार में एकीकरण की एक ही अनिवार्य शर्त है – सामाजिक समता। अर्थात समानता की संभावना और सामान अवसरों की सुनिश्चितता। इस तरह के साम्य पर ही कोई समाज खडा हो सकता है और समय के विस्तार में अपने एक्य को परिभाषित व पोषित कर सकता है। इसीलिये हम यह मानकर चलेंगे कि इतिहास बोध न केवल संस्कृति बोध है बल्कि उससे भी आगे बढ़कर यह किसी संस्कृति या समाज का नैतिकता बोध या स्वयं न्याय बोध भी है। इसीलिये हर संस्कृति ने चाहे वह कितनी भी विकसित रही हो – उसने अपनी विशिष्ट नैतिकता को बहुत स्पष्ट अर्थों में परिभाषित किया है और उसी के आधार पर शुभ अशुभ की परिभाषा की है और उसी के आधार पर इतिहास लिखा है। इसीलिये उनका इतिहास बोध और न्याय बोध बहुत स्पष्ट है। उसमे घालमेल या मिथकीय धुंध नहीं है। लेकिन क्या भारत में ऐसा है? क्या भारत ने इतिहास लिखा है? या क्या भारत के मिथकीय इतिहास में उन्नत नैतिकता बोध और न्याय बोध जैसा कुछ है?

यह देखकर आश्चर्य और दुःख होता है कि इस देश में इतिहास कभी नही लिखा गया है, बल्कि उसकी जगह मिथकों और कल्पनाओं से भरे पुराण लिखे गए हैं। भारत के इतिहास लेखन के संबंध में अक्सर यह कहा जाता है कि भारत के पास अतीत तो है लेकिन इतिहास नहीं है। इसी कारण, चूँकि यहाँ इतिहास नहीं है तो भारत की बहुसंख्य जनसंख्या अपने इस वर्तमान को भी समझ नहीं पाती कि यह किस प्रवाह में यहाँ तक पहुंचा है। और यही कारण है कि इतनी सदियों बाद भी इस विराट और दिशाहीन जनसंख्या में एक साझे भविष्य का स्पष्ट नक्शा या दर्शन भी आकार नहीं ले पा रहा है। यही इसकी ऐतिहासिक रूप से लंबी और शर्मनाक गुलामी का भी कारण है। भारत में हज़ारों धर्म ग्रन्थ और एक बहुत बड़ा दार्शनिक साहित्य है। सैकड़ों ज्ञात राजवंशों और कबीलों सहित अज्ञात परम्पराओं के संकेत व प्रमाण मिलते हैं। साथ ही अन्य देशों के यात्रियों ने यहाँ एक बड़ी ही विस्तृत और प्राचीन सभ्यता की बात कही है। ये सब बातें बतलाती हैं कि इस देश में इतिहास जरुर घटित हुआ है, लेकिन उसका लेखन नहीं हुआ है। अब ये लेखन क्यों नहीं हुआ है इसके पीछे बहुत गहरे कारण रहे हैं जिन्हें बहुत ही चालाकी से छुपाकर रखा गया है। यह नहीं माना जा सकता कि इस देश में लेखन कला या इतिहास बोध ही नहीं जन्म सका था। असल में यहाँ इतिहास बोध को नष्ट करने वाला मिथक बोध बहुत प्रभावी रहा है। ये मिथक क्यों और कैसे जन्मते हैं इसमें गहराई से देखना होगा। इस विषय में आचार्य रजनीश नामक एक विवादास्पद भारतीय धर्मगुरु ने कहा है कि भारतीय कालगणना रेखीय नहीं बल्कि चक्रीय है इसलिए समय भी अनंत है और जीवन सहित समाज मे घटित होने वाली घटनाएँ भी अनंत हैं इसीलिये इनका लेखन व्यर्थ है। उनके अनुसार मिथक असल में इतिहास का नहीं बल्कि समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में महत्वपूर्ण शिक्षाओं और प्रवृत्तियों का संकलन है। उनका यह कहना बहुत सूचक है। भारत का हर परलोक वादी धर्मगुरु इसी भाषा में बात करता है। यह वक्तव्य देते हुए वे बिलकुल परम्परागत धर्मगुरुओं की तरह बात कर रहे हैं और असल में इस एक वक्तव्य से समाज में बदलाव की संभावना का सूत्र बन सकने वाले इतिहास बोध की ह्त्या भी कर रहे हैं। यही काम उनकी श्रेणी के हर धर्मगुरु ने बार बार किया है। इसीलिये रजनीश जैसे इतने बड़े दार्शनिक और रहस्यवादी इस समाज में पैदा होते रहने के बावजूद इस देश के मौलिक विभाजक और भेदभावमूलक चरित्र में कभी बुनियादी बदलाव या क्रान्ति नहीं हुई। बल्कि इसके विपरीत रहस्यवाद और परलोक की प्रशंसा में छुपाकर समाज की जमीनी मांगों को छुपाया गया है। इस प्रकार न सिर्फ इतिहास बोध से वृहत्तर न्यायबोध की ह्त्या होती है बल्कि इसी के सहारे सभी क्रांतियों की संभावना भी नष्ट हो जाती है। सामान्य रहस्यवादी परम्पराओं या हवा हवाई बातें करने वाले धर्मगुरु और धर्म भीरुओं की तरफ से आने वाली ऐसी प्रशंसाओं के प्रभाव में हम अगर मिथक को देखेंगे तो कुछ भी स्पष्ट नहीं होगा। इसीलिये मिथकीय आख्यानों को दिव्य या प्रशंसनीय समझने वाले लोगों ने कभी भी कोई समाज परिवर्तन का आन्दोलन नहीं चलाया न ही इसके पक्ष में कोई विमर्श ही पैदा किया। ब्राह्मणी धर्म से प्रभावित विद्वान् और उनके विमर्श की दिशा को सम्मान देने वाले लोगों की मानकर चलेंगे तो हम मिथक और इतिहास के इस द्वंद्व में से कोई भी सार्थक बात नहीं निकाल सकेंगे।


गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के अनुसार गोंडवाना राज्य का राजचिन्ह

लेकिन अगर हम आर्य आक्रमण थ्योरी और जन्मना वर्ण व्यवस्था सहित जन्मना जाति व्यवस्था को स्वीकार करते हैं, तभी हम इस रहस्य को सुलझा सकते हैं अन्यथा हम इसे नहीं सुलझा सकते। डॉ. अंबेडकर (1970) की रिसर्च भी जिस तरफ इशारा करती है वह यही बतलाती है कि इस देश की मूल परम्परा और मूल शासकों को धीरे धीरे शिक्षा और व्यापार से वंचित करके समाज के सबसे निचले स्तर पर धकेला गया है। सामान्य सा तर्क है कि अगर इतिहास में एक संस्कृति और एक ही दर्शन का सातत्य है तो फिर इतिहास लिखना न केवल आसान होगा बल्कि जरुरी भी होगा। लेकिन अगर ये इतिहास किसी एक संस्कृति का नहीं बल्कि आप में लड़ रही अनेकों संस्कृतियों का बिखरा इतिहास है तो इस इतिहास का लेखन बहुत सेलेक्टिव ढंग से होगा। अगर इमानदारी से और सैनिक बल से विजय प्राप्त करके पराजित संस्कृति को नष्ट किया गया है तो उस विजय को अपनी गाथाओं में ज़िंदा रखा जाएगा। ये गाथाएँ इमानदार होती हैं और भविष्य को प्रेरित करती हैं। लेकिन अगर प्रतियोगी या मूलनिवासी संस्कृति को छल से और कपटपूर्वक मनोवैज्ञानिक उपायों से नष्ट किया गया है तो उसका इमानदार इतिहास लिखना बहुत मुश्किल होगा। ये इतिहास लेखन असल में विजेताओं ही को दुष्ट और धूर्त साबित करेगा। इसलिए ऐसे विजेताओं ने भारत में कभी इतिहास लिखा ही नहीं और जो मूलनिवासी जनों का इतिहास किसी अर्थ में उपलब्ध था उसे भी मिथकीय आख्यानों की बाढ़ में बहाकर गायब कर दिया।

इस विषय में भारत के बारे में एक बड़ी सच्चाई यह है कि भारत में जिन आततायी लोगों और संस्कृति ने मूलनिवासी संस्कृति को छलपूर्वक नष्ट किया है वह उन्होंने मनोवैज्ञानिक और धार्मिक षड्यंत्रों द्वारा नष्ट किया है (Keer, Malase and Phadake (eds.), 2006) इसी कारण उन्होंने कभी भी व्यवस्थित रूप से अपने छल कर्म का इतिहास नहीं लिखा। उन्होंने हमेशा ही मिथक लिखे हैं, और अपने मिथकों में इस बात के संकेत जरुर छोड़े हैं कि वे कितने अन्यायी, धूर्त और कपटी थे। इनके सभी मिथकों में बहुत स्पष्टता से लिखा गया है कि किस तरह आर्यों ने मूलनिवासी शासकों को जिन्हें इन्‍होंने राक्षस या असुर नाम दिया था, के साथ छल किया था। मूलनिवासी शूरवीरों के खिलाफ अपनी सुन्दर कन्याओं और स्त्रियों का कपटपूर्वक इस्तेमाल किया है। इस तरह उन्होंने न केवल मूलनिवासियों के प्रति घृणित व कायरतापूर्ण षड्यंत्र रचे हैं बल्कि अपनी स्त्रियों सहित अन्य स्त्रियों की उनकी दृष्टि में क्या उपयोगिता रही है इसे भी बार-बार स्पष्ट किया है। विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण करके देवों और असुरों की साझी मेहनत से उपजे अमृत को किस तरह असुरों से छीनकर देवों को पिला दिया गया था यह आर्यों के मिथक साहित्य में बहुत सामान्य बात है (Williams, 2003) । इसी तरह इंद्र हर बार किसी तेजस्वी तपस्वी से भयभीत होकर उसके तप को भंग करने के लिए अप्सराओं को भेजता है। इंद्र पहले अन्य सब तरह के उपाय करके थक जाने पर अप्सराओं या स्त्रियों को इस्तेमाल करता है। इस तरह देखें तो स्त्रियाँ ही इंद्र का या आर्यों का ब्रह्मास्त्र रही हैं। देवताओं के राजा इंद्र द्वारा अहिल्या के छलपूर्वक शीलभंग की भी कथा है, यही प्रत्येक शूरवीर या दार्शनिक के उभार के साथ ही इंद्र का आसन डोलने लगता है और वह षड्यंत्र शुरू कर देता है।

ये घटनाएँ और उल्लेख बताते हैं कि सामान्य नैतिकता और सदाचार के विषय में आर्य और उनके महान देवता हेमशा से अविकसित, अन्यायी, स्त्री विरोधी और बर्बर थे। यह उनके अपने मिथकीय शास्त्रों और ग्रंथों से स्पष्ट होता है। इतने कपट और छल से भरी कायरतापूर्ण परम्परा का इतिहास कैसे लिखा जा सकता है। सामान्य बुद्धि भी यह बतलाती है कि ऐसा इतिहास लिखकर आर्य अपने वंशजों की नजर में महान नहीं बन सकते थे। इसीलिये उन्होंने ऐसा इतिहास न लिखने का निर्णय लिया और इस इतिहास की बजाय मिथक रचे जिनमें न तर्क था न कोई न्यायबोध था न नैतिकता ही थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि आततायी आर्य अविकसित और बर्बर थे न केवल इतना, बल्कि यह भी स्पष्ट होता है कि मूलनिवासी असुर अधिक नैतिक थे प्रकृति, जीवन, बहुलता, सृजन और स्त्रियों का बहुत सम्मान करते थे. वे अधिक सभ्य और विकसित थे। आक्रामक और युद्धखोर घुमक्कड़ आर्यों के विपरीत वे खेतिहर समाज थे। उनका दर्शन भी प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों का दर्शन था जो कि बहुत हद तक भौतिकवादी दर्शन था।

Dalit History Month is a participatory radical history project. 
Our goal is to share the contributions to history from Dalits around the world. We are a parallel model of scholarship to academic institutions that study Dalits without Dalits in collaborative or lead roles of research. We believe in the power of our stories to change the savarna narrative of our experience as one solely of atrocity into one that is of our own making. Our story may have begun in violence but we continue forward by emphasizing our assertion and resistance. Join the conversation at #Dalithistorymonth on facebook, twitter, and your communities.

WHAT IS CASTE ?

The word “Caste” itself stems from the Spanish and Portuguese “casta”, which means “race, lineage, or breed”. It was applied by white colonials during the 17th century C.E. to refer to the system of social codification they witnessed existing in South Asia. The native terms for Caste are often “varna (Caste group)” and “jati (Caste)”. Each Caste group encompasses within it several individual Castes varying in cultural and social practices, and who are limited from structural power by their placement within the pyramid. Caste apartheid is the system of religiously codified exclusion that was established in Hindu scripture. Hindu origin myths state that different people were created from different parts of God Brahma’s body and were to be ranked hierarchically according to ritual status, purity, and occupation. By this system, everyone at birth, is ranked with a Caste. Crucially, Caste is inherited from the family one is born into and is unalterable throughout that person’s life. There are four main Caste groups. Those at the very top are Brahmins, who have traditionally been priests, scriptural knowledge-keepers and legislators. Below them in status are the Kshatriyas, who were kings and warriors. They are followed by Vaishyas, or the merchant classes. People in these three Caste groups are often referred to as the “upper” Castes. Those at the bottom of the Caste hierarchy are Shudras or traditional peasants. Many Shudras are also termed “Oppressed Castes”. Outside the 4-Caste group structure are people considered lower than the lowest of Castes. They go by the term Dalit (meaning “broken” but “resilient”), formerly known as “untouchables” and the Adivasis, or the indigenous peoples of South Asia. Together these Caste-oppressed groups continue to experience profound injustices including socioeconomic inequalities, usurpation of their land, rights, and brutal violence. The Caste one belongs to can determine your perceived level of ritual purity or pollution and goes on to determine the outcomes of your whole life - from where one can live and die, to what one can eat, what one’s occupation can be, and even who one can marry. The “Untouchables” in particular, are embroiled in a system of Caste apartheid even today. Their experience is made up of segregated ghettos, banned from places of worship, and denied access to schools and other public amenities including water and roads. This entire system is enforced by violence and maintained by one of the oldest, most persistent cultures of impunity throughout South Asia, most notably in India, where despite the contemporary illegality of the system, it has persisted and thrived for 2,500 years.

FaXian's Writings Provide Evidence of Widespread Untouchability

Beginning of 5th century CE : FaXian, was a Chinese Buddhist monk who travelled by foot all the way from China to India, visiting many sacred Buddhist sites in what are now Xinjiang, China, Pakistan, India, Nepal, Bangladesh and Sri Lanka and between 399 and 412 to acquire Buddhist scriptures. His journey is described in his important travelogue, A Record of Buddhist Kingdoms, Being an Account by the Chinese Monk Fa-Xian of his Travels in India and Ceylon in Search of the Buddhist Books of Discipline. In his travelogues writes: "The candalas are called sinners. They live isolated from the rest of society, and when the enter a city, they must sound an alarm by striking a piece of wood to warn everyone of their presence and enable the citizens to avoid running into them. The candalas, fishermen, and hunters are the only sellers of animal flesh." These writings confirm that between the origin of the Chaturvarnya (The Four Caste System ) and the time of Fa Hsien's travels and Buddhism, Untouchability had originated and established itself within the subcontinental religion and culture as the fifth group that lay deeply repressed and firmly outside the system. ( Japanese Studies on South Asia, Caste System, Untouchability and the depressed, 1997)

Dalits and the Origin of Untouchability in India: Origin of Untouchability
The term “Dalit” in Sanskrit is derived from the root “dal” which means to split, break, crack, and so on. It means split, broken, burst, etc. as an adjective. Jyotiba Phule, the founder of the Satya Shodak Samaj, a non-Brahmin movement in Maharashtra, is believed to have coined the term “Dalit”. He used the term to refer to the outcastes and untouchables as the victims of the caste-based social division of the Indian society.

Dalits were earlier known as “untouchables” and “outcastes” for centuries. The degrading terms were replaced by the British administration by “Depressed Classes” in 1919. Gandhiji called them Harijans (People of God). Ambedkar did not accept Gandhi s term.

He demanded a separate electorate for the “Depressed Classes”, and pro­posed the term “Protestant Hindus”. In 1935, the British government defined them as the “Scheduled Castes.” It was during the 1970s that the Dalit Panther Movement of Maharashtra popularized the term Dalit. Today, the term is used for the Dalit people of various religions and protest movements.
Dalits occupy the lowest position in the caste hierarchy based on ritual purity and occupation, and outside the Varna system, which gives them the traditional name Panchumas. They have been oppressed throughout the recorded history of India, relegated to doing agricultural tasks, and polluting occupations like disposing dead bodies, working with leather, cleaning toilets and sewage, etc.

They have been stripped of their dignity and denied basic human rights. They were considered “untouchables” implying that anybody touching them would be polluted. They were denied access to roads, temples, schools, etc. to avoid “pollution” of other castes.

To this day, thousands of villages have a separate area for Dalit houses, separate wells for Dalits, class rooms where Dalit children sit separately, and tea shops with separate glasses for Dalits. Such discrimination occurs despite laws against such practices. Centuries of oppression and dis­crimination has resulted in poverty and its associated problems amongst Dalits.

A large number of Dalits converted to religions including Buddhism, Christianity, Islam, and Sikhism for equality and human dignity. Dr Ambedkar believed that neither Marxism nor bourgeois nationalism nor republicanism provided any solution to the problem of caste.

So, he turned to religion. He rejected Christianity and Islam, because they did not originate to fight the caste system. He chose Buddhism and converted to it along with millions of Mahars. Ambedkar noted that the Buddha created his Sangha as a model of casteless society and the laity was to emulate the bhikkus in order to bring about such a society into existence.

Origin of Untouchability

The origins of untouchability can be traced back to the times when the Aryans invaded India around 1500 BC. They looked down upon the indigenous people as culturally and racially inferior. While some of the indigenous people escaped into the jungles, the rest of them were subdued and incorporated into the Aryan society as inferior castes.

In the Later-Vedic period, the people who escaped into the jungles began to be called Chandalas. There was a lot of stigma against the Chandalas in the Later-Vedic period, but untouchability on a large scale appeared only between 600 BC and 200 AD.

Manu holds that the four Varnas originated from different parts of Purusha: the Brahmans from his mouth, the Kshyatriyas from his arms, the Vaishyas from his thighs, and the Shudras from his feet. Rest of the Castes came into being as a result of alliances among the four Varnas.

The two important theories pertaining to the origin of untouchability are as follows:

The first theory says that the discovery that the Indus valley people spoke a proto- Dravidian language suggests that the people conquered by the Aryans were Dravidians. They subsequently moved down south and subjugated the indigenous people there. When Aryan influence spread to the South, the Varna system and the “untouchability” came into existence.

Thus, the Dalits were among the original tribes of South India, who became isolated from the rest of the world and so were looked down upon by others. They belonged to the first wave of Dravidians who emigrated to the South and were subse­quently won over by a more civilized wave who forced them to live as manual laborers.

Why the Aryans developed a social organization wherein the Chandalas occupied the lowest position is answered by the “mixed caste” theory offered by Manu. This theory explains the existence of the four Varnas as divinely-ordained and the other castes outside the Varna scheme as a result of unlawful sexual alliances between men and women of dif­ferent Varnas.

The Chandala resulted as the offspring of a Brahman woman and a Shudra man. Four other groups were also included among the “untouchables”. In the years after 200 AD, “untouchability” came to include more groups.

The label Chandala came to be used to refer to all those at the bottom of society. This oversimplifies what over a period of time a far more complex process. The number of “untouchable” castes always exceeded the number of mixed origin castes, so obviously other considerations influenced the clas­sification system. This theory accords priority to Varna rather than Jati.

To explain the origin of untouchability, recent theories have used components such as race and the concern for racial purity when races interact; the subjugation of diverse groups by the technologically superior Aryans; the division of labor as migrant Aryans settled down adopting agricultural and then urban ways of life; incorporation of new tribes, new guilds, and new religious sect into the Aryan society.

Preying on Dalits
S. Viswanathan
Two more alleged incidents of atrocities on Dalits in Tamil Nadu come to the foreground.

Numerous are the ways in which Dalits are tormented. They are murdered and maimed; women are raped; their children are abused and deprived of schooling; they are dispossessed of their property; their houses are torched; they are denied their legitimate rights and their sources of livelihood are destroyed. Adding to the long list of atrocities committed on Dalits were two incidents reported recently in Tamil Nadu, in which three Dalits were forced to consume human waste.

On September 5, at Kaundampatti in Dindigul district, Sankan, a Dalit agricultural worker, was forced to drink urine — for having lodged with the police a complaint of trespass against a caste Hindu, following a dispute between them over a piece of land. Sankan had to suffer many atrocities during his five-year-long struggle against his caste-Hindu landlord to get possession of the land. In his complaint, Sankan stated that the landlord had collected nearly Rs.1 lakh over a period of 15 years through deductions from his wages, as the price of the land.

An equally horrifying incident occurred at Thinniyam village in Tiruchi district on May 22. Two Dalits, Murugesan and Ramasami, were forced "to feed each other'' human excreta. The "crime'' they committed was that they stood by another Dalit, Karuppiah, who was engaged in a prolonged struggle against a former panchayat president and her husband to recover an amount of money he said he had given them as a bribe to get a house allotted for his sister.

Both incidents are related to the growing aspiration of Dalits to own land, either for cultivation or to build a house, and the continued opposition or indifference of caste Hindus and the government in this regard. Ironically, the principal accused in the Thinniyam incident, the panchayat president's husband, is a retired teacher, while in the Kaundampatti incident one of the alleged perpetrators of the act is a Chennai-based police constable, who belonged to the village.

While a first information report (FIR) has been registered with regard to the latest complaint, a case has been registered in connection with the earlier matter. In connection with the Thinniyam incident, 10 persons, including the former panchayat president and her husband, are liable to face charges under the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act and the Indian Penal Code. People's Watch-Tamil Nadu, a Madurai-based non-governmental organisation, has taken up both the cases with the National Human Rights Commission and the National Commission for Scheduled Castes and Scheduled Tribes.

Thinniyam is a tiny village near Lalgudi. About 100 Dalit families live here; the Kallars, comprising 200 families, are the predominant caste here. Seven years ago, Karuppiah (38) reportedly paid Rs.2,000 to S. Rajalakshmi, who is a Kallar by caste and was the president of the local panchayat. With no house having been allotted and Rajalakshmi's term drawing to a close, Karuppiah demanded that the money be returned. Subramanian, Rajalakshmi's husband, who was then in service as a teacher, first asked for time; later he denied that he had taken any money. A frustrated Karuppiah tom-tommed his complaint on May 20. Enraged, Subramanian, along with his son, abused and assaulted him with footwear, Karuppiah later said in a complaint to the police. The next morning Subramanian and his relatives allegedly assaulted Murugesan and Ramasami with footwear and hot iron rods for helping Karuppiah bring his grievance to public notice. It was at that time that the two were reportedly forced to feed each other human excreta.

Sankan (44), who was in Chennai on September 25 to present his case to government officials, told Frontline that he had been a victim of breach of trust. He said that since his boyhood he had been working on the farm of a landlord of the village. Sankan said that about 15 years ago the patriarch of the family had agreed to give him a piece of land on the condition that he would deduct Rs.500 every month from Sankan's wages. But he was not given any land. He was sent out of the farm five years ago. Ever since he has been pressing his erstwhile employer to give him the land. He also took the issue to a civil court. Meanwhile, the landlords attempted to sell the disputed land. When Sankan resisted the entry of Kannan, who claimed to be one of the new owners of the land, he and his family were assaulted. He lodged a complaint with the police on September 4. The next day Kannan along with a group of persons, including the police constable, Annadurai, confronted Sankan and attacked him. In his statement Sankan said that he was dragged for about 200 metres and beaten. When he stumbled, he was caught by the hair and an assailant urinated into his mouth.

The investigation into the incident has been entrusted with the Protection of Civil Rights wing of the police. Ironically, one of the officers investigating the case is a police inspector who was transferred from Tuticorin district in connection with police excesses on Dalits in Sankaralingapuram (Frontline, April 12).

'Dalit' and 'Scheduled Caste'

The word Dalit comes from the Hindi word dalan, meaning oppressed or broken. Alternatively, or legally, or as the Government of India may now have them called, Dalit is basically a caste defined in Constitution under Article 341, listed as the Scheduled Castes.

The term Scheduled Castes was first used by British in the Government of India Act, 1935, which first categorised the lower castes under 'Depressed Classes'.

However, the problem with the government's decision to replace the word 'Dalit' with Scheduled Caste is that certain members of the community don't like to identify with the term. Some members arguethat they like to identify as a Dalit, but they have actively opted out of the benefits of reservation offered by the State. Hence, they don't feel it is right to club them under the listed 'Scheduled classes'.

Then there is the thorny issue of reservation. The argument stands that the increased emphasis on the word Scheduled Caste will give rise to a sense of alienation and in turn trudge deeper the animosity between the upper and the lower caste.

Gangadhar Pantawane, a Dalit writer from Maharashtra defines Dalit as a notion of change and revolution. The Dalits belief was humanism instead of sacred books, heaven, and hell as it made them a slave to other castes. "What is Dalit. To me, Dalit is not a caste. Dalit is a symbol of change an revolution. The Dalit believes in humanism." ".. Dalitness is a matter of appreciating the potential of one's total being.


Representational image. Reuters

It is because the term takes on an emancipating, unabashed acceptance of a troubled past that the community has preferred to take on this term, rather than being called Harijans.

Even Ambedkar, early on in his writings in English, espoused the use of the terms "depressed classes" and "broken men", which could translate into Dalit. But later he assertively stuck to the usage of 'Dalit' when Mahatma Gandhi tried to replace the term with a more generic Harijan (or children of God).

From Dalits to Harijans to Dalits
The term Harijan is said to have first figured in the hymn Vaishnava jana by Narsinh Mehta. Many believe that Gandhi's attempt to promote the usage of word was to avoid the stigma associated to other terms like bhangi and chamar, directly relegating the members of the community to the menial jobs they were forced to do over centuries.

However, the usage of Harijan led to an argument between Gandhi and Ambedkar as the latter wanted to represent Dalit as a separate community, while Gandhi was in favour of granting them equality but keeping them within the bounds of Hinduism. Gandhi asked Non-Dalits to use Harijan instead of Antyaja in 1932.

The term fell out of use as many Dalit intellectuals argued that it was a farcical euphemism that stands to weed out the use of a derogatory term, without righting the wrongs of centuries and criticising the basic tenets of Hinduism, which promoted caste system since the Vedic age. Ambedkar himself opposed the use of the word and many Dalit rights' activists till date view the term with derision. They argue that the word 'Harijan' still singles out the members of the community rather than integrate them, and if singling out was the effect then the nomenclature should also reflect the years of oppression faced by the community.

However, Gandhi's insistence on the usage of the term Harijan perhaps stemmed from a will to keep the Dalits tethered to the Hindu religion amid increasing anti-Hindu voices within the community

As historian Ramchandra Guha points out in his article for The Telegraph, Gandhi did not start using the term Harijan until 1932, when Ambedkar was made to yield on his demand for a separate electorate for Dalits and sign the Poona Pact. Gandhi insisted that the Dalits can be given larger representation in the legislature but they must remain part of the larger Hindu electorate. However, it was not until the 1970s that the term singularly and indistinctly came to be attached with the oppressed class' identity and their political aspirations.

The Dalit Panther Movement

After the death of Ambedkar, the first Dalit movement to create a stir was the Dalit Panthers Party founded in the 1970s in Maharashtra's then Bombay. Its method of fixing instant accountability with the upper caste, in ways that were sometimes undemocratic, caught the imagination of Dalits in Maharashtra who were facing atrocities despite the Constitution outlawing inequality and caste-based discrimination.

The Panthers published the organisation’s manifesto in 1973 and given a new definition to the term ‘Dalit’: " Dalits are members of the Scheduled Castes and Tribes, Neo-Buddhists, the working people, landless and poor peasants, women, and all those who are being exploited politically, economically and in the name of religion."

JV Pawar, one of the founders of the organisation, in an interview with The Wire, said "No violence ever took place. No one was beaten up, killed. Once we asked the headman to drink water from the Dalit well, but just when he was about to, we stopped him, because he had learned his lesson."

He described the methods implied at the time as something that ensured immediate grievance redressal, rather than a long drawn process and wait for the authorities to act against the dominant upper caste. The Panthers were also associated with the 1974 riots of the BDD chawl, when Pawar and his associates were arrested for asking the Dalit community to boycott elections. However, a sporadic violence broke out and continued for three days, with the Shiv Sena (then Naik Sena) joining in the rioting.

The group was later disbanded as it disintegrated due to infighting and individual ambitions, but the movement heightened the sense of pride in the Dalit identity,

Many Dalit writers of the time started using the word Dalit instead of previously used Achchuta, or oppressed in their poems, essay and stories expressing their aggression and aspirations. Ambedkar himself had chosen “depressed classes” and “broken men” in his writings, even when the term Dalit existed and was sometimes used in social discourse.

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Updated Date: Nov 16, 2018


Dalit: The Word, the Sentiment, and a 200-year-old History     

The word ‘Dalit’ is about assertion of identity, and carries with it, a whole bagage of history. 

Updated: 
INDIA
4 min read
Members of the Dalit community raise slogans during Bharat Bandh against the alleged dilution of SC/ST Act in New Delhi, on 2 April 2018.
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Last week, the Ministry of Information and Broadcasting issued an advisory to the media, asking them to refrain from using the nomenclature ‘Dalit’ for people belonging to Scheduled Castes.

This directive from the Centre directly follows the legal battle waged by activist, Pankaj Meshram who, in June this year, had filed a public interest litigation in the Bombay High Court asking to remove the word ‘Dalit’ from the public discourse and replace it instead with the more constitutional term, ‘Scheduled Caste’.

In light of these controversies, the question that should be asked is, why is the word ‘Dalit’ in the eye of the storm now? Why is it contentious for the term ‘Dalit’ to be part of the public discourse?

Dalit, used in a similar manner as ‘Blacks’ in the US, has been used by the community as a symbolic reassertion of identity and struggle against an oppressive, caste-ridden society. The position and the history of Dalits themselves can be traced through the names used for them. This history is semantic, political, and social all at once, and has provided a unifying force to an oppressed community.

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I&B Ministry’s Fiat on Use of ‘Dalit’: Ignorance or Hidden Agenda?

What is wrong with using a term, namely Dalit, that’s been adopted by the community itself?
ALOK PRASANNA KUMARUpdated: 11 Sep 2018, 7:28 PM IST

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The Information and Broadcasting Ministry’s letter to television channels to refrain from using the word ‘Dalit’ (and use ‘Scheduled Caste’ instead) is silly and legally indefensible. The ostensible basis for this is the order of the Nagpur Bench of the Bombay High Court in Pankaj v Joint Secretary which is partially extracted in the letter.