Origin of Chamar

DrAmbedkar SiddharthaC57
चमारद्वीप

यहाँ बहुत से लोग कहते है कि यह पेज जाति पर आधारित है.. सिर्फ चमारों के हित में सोचता है.. तो उन लोगों के लिए छोटी सी जानकारी यहाँ उपलब्ध करवाई जा रही है:
सभी मूल निवासियों के इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि किसी समय एशिया महाद्वीप को चमारद्वीप कहा जाता था। जो बाद में जम्बारद्वीप के नाम से जाना गया और कालांतर में वही जम्बारद्वीप, जम्बूद्वीप के नाम से प्रसिद्ध हुआ था। चमारद्वीप की सीमाए बहुत विशाल थी। चमारद्वीप की सीमाए अफ्गानिस्तान से श्री लंका तक, ऑस्ट्रेलिया, प्रायदीप और दक्षिण अफ्रीका तक फैली हुई थी। 3200 ईसा पूर्व जब यूरेशियन चमारद्वीप पर आये तो देश का विघटन शुरू हुआ। क्योकि हर कोई अपने आप को युरेशियनों से बचाना चाहता था। जैसे जैसे देश का विघटन हुआ, बहुत से प्रदेश चमारद्वीप से अलग होते गए और चमारद्वीप का नाम बदलता गया। भारत के नामों का इतिहास कोई ज्यादा बड़ा नहीं है परन्तु हर मूल निवासी को इस इतिहास का पता होना बहुत जरुरी है, तो ईसा से 3200 साल पहले एशिया महाद्वीप का नाम चमारद्वीप था, यूरेशियन भारत में आये तो जम्बारद्वीप हो हो गया, 485 ईसवी तक भारत का नाम जम्बूद्वीप था, 485 ईसवी में सिद्धार्थ बौद्ध ने मूल निवासियों के लिए क्रांति की, सभी मूल निवासियों को इकठ्ठा करने की कोशिश की। इस में सिद्धार्थ गौतम अर्थात बौद्ध धर्म को बहुत सफलता मिली थी। किन्तु युरेशियनों ने झूठे बौद्ध भिक्षु बन कर बौद्ध धर्म का विनाश कर दिया। इस प्रकार 600 या 800 ईसवी में भारत का नाम आर्यवर्त रखा गया। 1600 ईसवी अर्थात भक्ति काल तक भारत का नाम आर्यवर्त था। भारत का नाम किसी महान राजा भरत के नाम पर रखा गया है यह एक काल्पनिक कहानी है। असल में 1600 ईसवी में मनु नाम के एक यूरेशियन ब्राह्मण ने मनु समृति लिख कर फिर से भारत पर ब्राह्मणों अर्थात युरेशियनों का शासन स्थापित किया था। मनु के एक बेटे का नाम भरत था। उसी भरत के नाम पर आर्यवर्त को भारत कहा गया। आज़ादी के बाद भारत की संसद में एक प्रस्ताव पारित करके भारत का नाम इंडिया रख दिया गया। अब समझ आया सारे मूल निवासी चमार कैसे हुए? अभी भी समझ में नहीं आया हो तो कृपया नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और पूरी पोस्ट पढ़े: www.ChamarOfficial.tk
— with Kamal Ahirwar
चमार जाति का गौरवशाली इतिहास, कौन हैं ये लोग सिकन्दर लोदी (1489-1517) के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में 'चमार' नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता | आज जिन्हें हम चमार जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छूआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवर वंश के क्षत्रिय हैं | जिन्हें सिकन्दर लोदी ने चमार घोषित करके अपमानित करने की चेष्टा की | भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान कर्नल टाड को माना जाता है जिन्होनें अपनी पुस्तक द हिस्ट्री आफ राजस्थान में चंवर वंश के बारे में विस्तार से लिखा है | प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक हिन्दू चर्ममारी जाति एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी | महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है | डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी | अर्वनाइजेशन' की लेखिका डॉ हमीदा खातून लिखती हैं मध्यकालीन इस्लामी शासन से पूर्व भारत में चर्म एवं सफाई कर्म के लिए किसी विशेष जाति का एक भी उल्लेख नहीं मिलता है | हिंदू चमड़े को निषिद्ध व हेय समझते थे | लेकिन भारत में मुस्लिम शासकों के आने के बाद इसके उत्पादन के भारी प्रयास किए गये थे | डॅा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे | इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्पा रावल वंश के साथ था | राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी | संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे | उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने | उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं | राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है | औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं | संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया | दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया | उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए | लेकिन उन्होंने कहा :- वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान, फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान. वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार, तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार   (रैदास रामायण) संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया | इससे भयभीत हो सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था | संत रैदास का यह दोहा देखिए :- बादशाह ने वचन उचारा | मत प्यारा इसलाम हमारा || खंडन करै उसे रविदासा  | उसे करौ प्राण कौ नाशा || जब तक राम नाम रट लावे | दाना पानी यह नहींपावे || जब इसलाम धर्म स्वीकारे | मुख से कलमा आपा उचारै || पढे नमाज जभी चितलाई | दाना पानी तब यह पाई || समस्या तो यह है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही नहीं पढ़ा, जिसमें उस समय के समाज का चित्रण है जो बादशाह सिकंदर लोदी के अत्याचार, इस्लाम में जबरदस्ती धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रियों को निम्न कर्म में धकेलने की ओर संकेत करता है | चंवर वंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने 'चमार' बनाया और हमारे-आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया | इस समाज ने पददलित और अपमानित होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है | आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 35 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं | जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता | यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता | हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती | धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की |
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चमार महापंडित है सूर्यवंशी है

***** हर चमार महापंडित है सूर्यवंशी है *****
आप सभी साथी इस पर अपनी
प्रतिक्रिया दे
हजारो वर्षो पहले एशिया महाद्वीप में एक राजवंश रहा करता
था जिसे हम इक्ष्वाकु राजवंश या सूर्यवंशी क्षत्रिय कहते थे
इस इक्ष्वाकु राजवंश से सब घबराते थे इसी वंश में भगवान
गौतम बुद्ध , अशोक सम्राट , चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे महान सम्राट पैदा हुए
थे ।
लेकिन आज कल कुछ हिंदूवादी इस परिवार का हिन्दुकरण करना
चाहते हैं। जब की सच्चाई ये है की इक्ष्वाकु
राजवंश चमारो का वंश है। चमार ही सूर्यवंशी
क्षत्रिय है । और बुद्ध के वंशज हैं आइये प्रमाणित करे कैसे ।
1- बौद्ध लोग जीव हिंसा से विरत रहते थे लेकिन मांस खाते थे
अर्थात वो किसी भी जीव को काट कर
कुर्बानी दे कर या बली देकर मांस नही
खाते थे । बल्कि भारतीय बुद्धिस्ट सिर्फ मरे हुए जानवर का
माँस खाते थे जिस में की जीव होता ही
नही था । इस प्रकार जीव हत्या
नही करते थे । और पुरे भारत में ऐसा करने वाली
सिर्फ एक जाती थी वो है चमार आप बुजुर्गो से पता
कर सकते हैं ।
2- पुरे भारत में जनश्रुतियो और लोक कथाओ में चमार को ब्राह्मण बड़ा भाई
बताता है क्यों की ब्राह्मण हिन्दू धर्म का मुखिया है तो चमार
बौद्ध धर्म का मुखिया है इसीलिए चमारो की
शादी में पंडित नही बुलाया जाता ।
3- रामायण में और कुमारिल भट्ट की किताबो में बुद्ध को शुद्र
लिखा गया है और रिअल में भी चमार को ही मुख्य
शुद्र माना गया है ।अन्य जातिया कभी निशाने पर
नही रही।
4- समस्त जातियों में सिर्फ चमार जाती ही
ऐसी है जो गरीब होने के बावजूद
अपनी आन - शान पे मर मिटती है और इस
जाती में आज भी राजशी गुण झलकते
हैं ।
5-चमारो का घर गाँव के बाहर अक्सर होता है क्यों की चमार
गाँव के राजा होते थे इनको ही गाँवों में डीह बाबा
कहा जाता है।
6- चमार जाती से बौद्ध धर्म छिनने के बाद उसे धर्म
विहीन कर दिया गया था और अछूत इस लिए बना दिया गया
की यह जाती फिर कही से बौद्ध
धम्म न खड़ा कर पाए ।
7- चमार जाती की शिक्षा पर रोक इसी
लिए लगाई गई थी की वह अनपढ़ रहेगा तो खुद
को चमार अछूत समझेगा कभी यह नही जान पायेगा
की चमार एक राजशाही खून है । इस लिए चमारों
की शिक्षा पर रोक लगाई गई थी की
चमार शिक्षा पायेगा तो फिर से बौद्ध धम्म खड़ा कर देगा ।
8 - चमार खूद को इसीलिए चमार कहलाना पसंद
नही करते क्यों की चमार इन का नाम है
ही नही इनका नाम तो सूर्यवंशी
क्षत्रिय था । इसीलिए चमार आज भी खुद को चमार
कहने पर भडक जाते हैं । और लड़ाईया हो जाती है ।
9- ब्राह्मणो में जीस तरह शुक्ल शर्मा आदि समर्थक जातियाँ
हैं चमारो की भी समर्थक जातियाँ थी
जैसे की - कोरी चमार , नोनिया चमार ,
तांती चमार , दुसाध चमार , पासी चमार आदि लेकिन
चमारो की सत्ता विलुप्त होने के बाद इन सब में फुट
पड़ती गई ।
10- चन्द्रगुप्त मौर्य भी चमार थे लेकिन गोरे और सुन्दर थे
जब की चाणक्य ब्राह्मण था और काला इसी लिए
कहावत बन गई की -
"काला बाभन गोरा चमार
दुई जात से सदा होशियार !"
11- जो भी जातिया आर्य नही थी वो
चमार कहलाती थी और ऐसा आज भी
है चाहे मौर्या हो या नोनिया या दुशाध या अन्य शुद्र ब्रह्मण सब को चमार
ही कहता है।
ये सारी बाते जो ऊपर लिखी गई हैं ये वर्मा और
तिब्बत के बौद्ध ग्रंथि में इसका प्रमाण है और अधिक जानकारी
हेतु आप बाबा साहब की लिखी किताब WHO
WAS SHUDRAS (शुद्र कौन थे ?) से
पढ़ सकते हैं।
अत: हर चमार से अनुरोध है की इस मैसेज को
किसी अगले चमार बौद्ध भाई के पास जरुर भेजे ताकि उसको
भी यह पता चला की उस का खून भेड़-बकरियों का
नही है बल्कि हर चमार महापंडित है सूर्यवंशी
है ।
जय भीम । जय भारत ।।
Brijesh argal 
( bhim gruop gwalior )

Shudro Ka Itihas

आज कल हमारे भारत के स्कूलों और कॉलेजों में जो भारत का इतिहास पढाया जाता है, उस इतिहास और वास्तविक इतिहास में बहुत अंतर है । वेदों और पुराणों में जो इतिहास वर्णित है, वो भी मात्र एक कोरा झूठ है । क्या कभी किसी ने सोचा जो भी इतिहास हमारे पुराणों, वेदों और किताबों में वर्णित है उस में कितना झूठ लिखा है । जो कभी घटित ही नहीं हुआ उसे आज भारत का इतिहास बना कर भारत की नयी पीढ़ी को गुमराह किया जा रहा है । पुराणों-वेदों में वर्णित देवता और असुरों का इतिहास? क्या कभी भारत में देवता का हुआ करते थे‌? जो हमेशा असुरों से लड़ते रहते थे. आज वो देवता और असुर कहाँ है? भारत में कभी भी ना तो कभी देवता थे, ना है और ना ही कभी होंगे । ना ही भारत में कभी असुर थे, ना है और ना ही कभी होंगे । ये शास्वत सत्य है । shudro ka itihas1आज नहीं तो कल पुरे भारत को यह बात माननी ही होगी । क्योकि इन बातों का कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं है । जिन बातों का कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं है, उन बातों को इतिहासकारों ने सच कैसे मान लिया? इतिहासकारों ने बहुत घृणित कार्य किया है । उन्होंने बिना किसी वैज्ञानिक आधार पर बिना कोई शोध किये देवी-देवताओं को भारत के इतिहास की शान बना दिया । देवता भी इसे अजीब अजीब की कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति विश्वास ही नहीं कर सकता । विष्णु जो एक अच्छा खासा इन्सान हुआ करता था, आज वेदों और पुराणों के झूठ के कारण सारी दुनिया का पालक भगवान् बना बैठा है । ऊपर से विष्णु के नाम के साथ ऐसे ऐसे कार्य जोड़ दिए है कि आज स्वयं विष्णु इस धरती पर आ जाये तो बेचारा शर्म के मारे डूब मरे । ये सिर्फ एक विष्णु की ही बात नहीं है, कुल मिला कर 33 करोड़ ऐसे अजीब नमूने हमारे इतिहास में भरे पड़े है । ऊपर से इतिहास में ब्राह्मणों के ऐसे कृत्य लिखे हुए है, अगर ब्राह्मणों में शर्म नाम की और मानवता नाम की कोई चीज होती तो आज पूरा ब्राह्मण समाज डूब के मर जाता । क्या पूरा देश सिर्फ एक ही वर्ग के लोगों ने चलाया? क्या पिछले 2000 सालों में समाज के दुसरे वर्गों ने भारत के लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया? अगर किया.. तो इतिहासकारों ने दुसरे वर्गों के बारे क्यों नहीं लिखा? और जो लिखा है उस में इतना झूठ क्यों? इन सब बातों का एक ही अर्थ निकालता है कि भारत के इतिहासकार बिकाऊ थे और आज भी भारत के बिकाऊ इतिहासकार चंद सिक्को के बदले पुरे देश की जनता की भावनाओं से खेल रहे है । हमारे समाज के 5% ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों को दुनिया की सबसे ऊँची जाति लिख कर बाकि सभी जातियों (95% लोगों) के साथ इन इतिहासकारों ने नाइंसाफी की है । अगर किसी से पूछा जाये कि ईसा से 3200 साल पहले के इतिहास का कोई वर्णन क्यों नहीं है? तो उत्तर मिलाता है इस पहले कोई विवरण कही नहीं है । लेकिन हम पूछते है, क्या इतिहासकरों ने कोई अच्छा शोध किया? इतिहासकारों ने इतिहास लिखने से पहले पुराणी किताबों को पढ़ा? क्या इतिहासकारों ने देश के सभी एतिहासिक स्थानों पर शोध किये? अगर किये तो वो शोध साफ़ और स्पष्ट क्यों नहीं है? तो कहा है भारत का इतिहास? आज भारत के बाहर निकालो तो सारी दुनिया को भारत का इतिहास पता है । अगर कोई भारतीय विदेशियों को अपना इतिहास बताता है तो सभी विदेशी बहुत हंसते है, मजाक बनाते है । सारी दुनिया को भारत का इतिहास पता है, फिर भी भारत के 95% लोगों को अँधेरे में रखा गया है । क्योकि अगर भारत का सच्चा इतिहास सामने आ गया तो ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों द्वारा समाज के सभी वर्गों पर किये गए अत्याचार सामने आ जायेंगे, और देश के लोग हिन्दू नाम के तथाकथित धर्म की सचाई जानकर हिन्दू धर्म को मानने से इनकार कर देंगे । कोई भी भारतवासी हिन्दू धर्म को नहीं मानेगा । ब्राह्मणों का समाज में जो वर्चस्व है वो समाप्त हो जायेगा ।
बहुत से लोग ये नहीं जानते कि भारत में कभी देवता थे ही नहीं, और न ही असुर थे । ये सब कोरा झूठ है, जिसको ब्राह्मणों ने अपने अपने फायदे के लिए लिखा था, और आज भी ब्राह्मण वर्ग इन सब बातों के द्वारा भारत के समाज के हर वर्ग को बेबकुफ़ बना रहा है । अगर आम आदमी अपने दिमाग पर जोर डाले और सोचे, तो सारी सच्चाई सामने आ जाती है । ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य ईसा से 3200 साल पहले में भारत में आये थे । आज ये बात विज्ञान के द्वारा साबित हो चुकी है । लेकिन ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य इतने चतुर है कि वो विज्ञान के द्वारा प्रमाणित इतिहास और जानकारी भारत के अन्य लोगों के साथ बांटना ही नहीं चाहते । क्योकि अगर ये जानकारी भारत के लोगो को पता चल गई तो भारत के लोग ब्राह्मणों, राजपूतो और वैश्यों को देशद्रोही, अत्याचारी और अधार्मिक सिद्ध कर के देश से बाहर निकल देंगे । भारत के लोगों को सच्चाई पता ना चले इस के लिए आज भी ब्राह्मणों ने ढेर सारे संगठन जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी बना रखे है. हजारों धर्मगुरु बना रखे है. जो सिर्फ ढोग, पाखंड और भारत के लोगों को झूठ बता कर अँधेरे में रखते है, क्यों रखते है? ताकि भारत के 95% लोगों को भारत का सच्चा इतिहास पता ना चल जाये । और वो 95% लोग ब्राह्मणों को देशद्रोही करार दे कर भारत से बाहर ना निकल दे । भारत से ब्राह्मणों का वर्चस्व ही ख़त्म ना हो जाये ।
यह भारत के सच्चे इतिहास की शुरुआत है तो यहाँ कुछ बातों पर प्रकाश डालना बहुत जरुरी है । ताकि लोगों को थोडा तो पता चले कि आखिर ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों ने भारत में आते ही क्या किया जिस से उनका वर्चस्व भारत पर कायम हो पाया: 1.ईसा से 3200 साल पहले जब भारत में रुद्रों का शासन हुआ करता था । भारत में एक विदेशी जाति आक्रमण करने और देश को लूटने के उदेश्य आई । वह जाति मोरू से यहाँ आई जिनको “मोगल” कहा जाता था । मोरू प्रदेश, काला सागर के उत्तर में यूरेशिया को बोला जाता था । यही यूरेशियन लोग कालांतर में पहले “देव” और आज ब्राह्मण कहलाते है । यूरेशियन लोग भारत पर आक्रमण के उदेश्य से यहाँ आये थे । लेकिन भारत में उस समय गण व्यवस्था थी, जिसको पार पाना अर्थात जीतना युरेशिनों के बस की बात नहीं थी । भारत के मूल-निवासियों और यूरेशियन आर्यों के बीच बहुत से युद्ध हुए । जिनको भारत के इतिहास और वेद पुराणों में सुर-असुर संग्राम के रूप में लिखा गया है । भारत की शासन व्यवस्था दुनिया की श्रेष्ठतम शासन व्यवथा थी । जिसे गण व्यवस्था कहा जाता था और आज भी दुनिया के अधिकांश देशों ने इसी व्यवस्था को अपनाया है । ईसा पूर्व 3200 के बाद युरेशियनों और मूल निवासियों के बीच बहुत से युद्ध हुए जिन में यूरेशियन आर्यों को हार का मुंह देखना पड़ा। 2.पिछले कई सालों में भारत में इतिहास विषय पर हजारों शोध हुए । जिस में कुछ शोधों का उलेख यहाँ किया जाना बहुत जरुरी है । जैसे संस्कृत भाषा पर शोध, संस्कृत भाषा के लाखों शब्द रूस की भाषा से मिलते है । तो यह बात यहाँ भी सिद्ध हो जाती है ब्राहमण यूरेशियन है । तभी आज भी इन लोगों की भाषा रूस के लोगों से मिलती है । कालांतर में यूरेशिया में इन लोगों का अस्तिव ही मिट गया तो भारत में आये हुए युरेशियनों के पास वापिस अपने देश में जाने रास्ता भी बंद हो गया और यूरेशियन लोग भारत में ही रहने पर मजबूर हो गए । युरेशियनों को मजबूरी में भारत में ही रहना पड़ा और आज यूरेशियन भारत का ही एक अंग बन गए है, जिनको आज के समय में ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य कहा जाता है । 3.ईसा पूर्व 3200 में यूरेशिया से आये लोगों की चमड़ी का रंग गोरा था, आँखों का रंग हल्का था और इनकी खोपड़ी लम्बाई लिए हुए थी । ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य यूरेशिया से आये है. यह बात 2001 में प्रसिद्ध शोधकर्ता माइकल बामशाद ने वाशिंगटन विश्वविद्यालय में भारत की सभी जातियों के लोगों का DNA परिक्षण करके सिद्ध कर दी थी । DNA परिक्षण में यह बात साफ़ हो गई थी कि क्रमश: ब्राह्मण का 99.90%, राजपूत का 99.88% और वैश्य का 99.86% DNA यूरेशियन लोगों से मिलता है । बाकि सभी जाति के लोगों का DNA सिर्फ भारत के ही लोगों के साथ मिलाता है । 4.जब यूरेशियन भारत में आये तो यह आक्रमणकारी लोग नशा करते थे । जिसको कालांतर में “सोमरस” और आज शराब कहा जाता है । यूरेशियन लोग उस समय सोमरस पीते थे तो अपने आपको “सुर” और अपने समाज को “सुर समाज” कहते थे । यूरेशियन लोग ठंडे प्रदेशों से भारत में आये थे, ये लोग सुरापान करते थे तो इन लोगों ने भारत पर कुटनीतिक रूप से विजय पाने के लिए अपने आपको देव और अपने समाज को देव समाज कहना प्रारम्भ कर दिया । 5.भारत के लोग अत्यंत उच्च कोटि के विद्वान हुआ करते थे । इस बात का पता गण व्यवस्था के बारे अध्ययन करने से चलता है । आज जिस व्यवथा को दुनिया के हर देश ने अपनाया है, और जिस व्यवस्था के अंतर्गत भारत पर सरकार शासन करती है । वही व्यवस्था 3200 ईसा पूर्व से पहले भी भारत में थी । पुरे देश का एक ही शासन कर्ता हुआ करता था । जिसको गणाधिपति कहा जाता था । गणाधिपति के नीचे गणाधीश हुआ करता था, और गणाधीश के नीचे विभिन्न गण नायक हुआ करते थे जो स्थानीय क्षेत्रों में शासन व्यवस्था देखते या संभालते थे । यह व्यवस्था बिलकुल वैसी थी । जैसे आज भारत का राष्ट्रपति, फिर प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री के नीचे अलग अलग राज्यों के मुख्मंत्री । कालांतर में भारत पर रुद्रों का शासन हुआ करता था । भारत में कुल 11 रूद्र हुए जिन्होंने भारत पर ईसा से 3200 साल के बाद तक शासन किया। सभी रुद्रों को भारत का सम्राट कहा जाता था और आज भी आप लोग जानते ही होंगे कि शिव से लेकर शंकर तक सभी रुद्रों को देवाधिदेव, नागराज, असुरपति जैसे शब्दों से बिभुषित किया जाता है । रुद्र भारत के मूल निवासी लोगों जिनको उस समय नागवंशी कहा जाता था पर शासन करते थे । इस बात का पता “वेदों और पुराणों” में वर्णित रुद्रों के बारे अध्ययन करने से चलता है । आज भी ग्यारह के ग्यारह रुद्रों को नाग से विभूषित दिखाया जाता है । नागवंशियों में कोई भी जाति प्रथा प्रचलित नहीं थी । इसी बात से पता चलता है कि भारत के लोग कितने सभ्य, सुशिक्षित और सुशासित थे । इसी काल को भारत का “स्वर्ण युग” कहा जाता था और भारत को विश्व गुरु होने का गौरव प्राप्त था । 6.असुर कौन थे? ये भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है । क्योकि भारत के बहुत से धार्मिक गर्न्थो में असुरों का वर्णन आता है । लेकिन ये बात आज तक सिद्ध नहीं हो पाई कि असुर थे भी या नहीं । अगर थे, तो कहा गए? और आज वो असुर कहा है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमे वेदों और पुराणों का अध्ययन करना पड़ेगा । आज भी हम खास तौर पर “शिव महापुराण” का अध्ययन करे तो असुरों के बारे सब कुछ स्पष्ट हो जाता है । असुराधिपति भी रुद्रों को ही कहा गया है । शिव से लेकर शंकर तक सभी रुद्रों को असुराधिपति कहा जाता है । आज भी रुद्रों को असुराधिपति होने के कारण अछूत या शुद्र देवता कहा जाता है । कोई भी ब्राह्मण रूद्र पूजा के बाद स्नान करने के बाद ही मंदिरों में प्रवेश करते है या गंगा जल इत्यादि अपने शरीर पर छिड़क कर दुसरे देवताओं की पूजा करते है । नागवंशी लोग सांवले या काले रंग के हुआ करते थे और नागवंशी सुरापान नहीं करते थे । आज भी आपको जगह जगह वेदों और पुराणों में लिखा हुआ मिल जायेगा कि नाग दूध पीते है कोई भी नाग “सूरा” अर्थात शराब का सेवन नहीं करते थे । अर्थात भारत के मूल निवासी कालांतर में असुर कहलाये और आज उन्ही नागवंशियों को शुद्र कहा जाता है । 7.युरेशियनों ने भारत कूटनीति द्वारा भारत की सता हासिल की और पहले तीन महत्वपूर्ण नियम बनाये जिनके करना आज भी ब्राहमण पुरे समाज में सर्वश्रेठ माने जाते है: 8.वर्ण-व्यवस्था: युरेशियनों ने सबसे पहले वर्ण-व्यवस्था को स्थापित किया अर्थात यूरेशियन साफ़ रंग के थे तो उन्हों ने अपने आपको श्रेष्ठ पद दिया । यूरेशियन उस समय देवता कहलाये और आज ब्राह्मण कहलाते है । भारत के लोग देखने में सांवले और काले थे तो मूल निवासियों को नीच कोटि का बना दिया गया । 400 ईसा पूर्व या उस से पहले भारत के मूल निवासियों को स्थान और रंग के आधार पर 3000 जातियों में बांटा गया । आधार बनाया गया वेदों और पुराणों को, जिनको यूरेशियन ने संस्कृत में लिखा । भारत के मूल निवासियों को संस्कृत का ज्ञान नहीं था तो उस समय जो भी यूरेशियन बोल देते थे उसी को भारत के मूल निवासियों ने सच मान लिया । जिस भी मूल निवासी राजा ने जाति प्रथा का विरोध किया उसको युरेशियनों ने छल कपट या प्रत्यक्ष युद्धों में समाप्त कर दिया । जिस का वर्णन सभी वेदों और पुराणों में सुर-असुर संग्रामों के रूप में मिलाता है । लाखों मूल निवासियों को मौत के घाट उतारा गया । कालांतर में उसी जाति प्रथा को 3000 जातियों को 7500 उप जातियों में बांटा गया । 9.शिक्षा-व्यवस्था: इस व्यवस्था के अंतर्गत युरेशियनों ने भारत के लोगों के पढ़ने लिखने पर पूर्ण पाबन्दी लगा दी । कोई भी भारत का मूल-निवासी पढ़ लिख नहीं सकता था । सिर्फ यूरेशियन ही पढ़ लिख सकते थे । भारत के लोग पढ़ लिख ना पाए इस के लिए कठोर नियन बनाये गए । मनु-स्मृति का अध्ययन किया जाये तो यह बात सामने आती है । कोई भी भारत का मूल निवासी अगर लिखने का कार्य करता था तो उसके हाथ कट देने का नियम था । अगर कोई मूल-निवासी वेदों को सुन ले तो उसके कानों में गरम शीशा या तेल से भर देने का नियम था । इस प्रकार भारत के लोगों को पढने लिखने से वंचित कर के युरेशियनों ने वेदों और पुराणों में अपने हित के लिए मनचाहे बदलाव किये । ये व्यवस्था पहली इसवी से 1947 तक चली । जब 1947 में देश आज़ाद हुआ तो डॉ भीमा राव अम्बेडकर के प्रयासों से भारत के मूल-निवासियों को पढ़ने लिखने का अधिकार मिला । आज भी ब्राह्मण वेदों और पुराणों में नए नए अध्याय जोड़ते जा रहे है और भारत के मूल निवासियों को कमजोर बनाने का प्रयास सतत जारी है । 10.धर्म व्यवस्था: धर्म व्यवस्था ही भारत के मूल निवासियों के पतन के सबसे बड़ा कारण था । धर्म व्यवस्था कर के युरेशियनों ने अपने आपको भगवान् तक घोषित के दिया । धर्म व्यवस्था कर के युरेशियनों ने खुद को देवता बना कर हर तरह से समाज में श्रेष्ठ बना दिया । धर्म व्यवस्था में “दान का अधिकार” बना कर युरेशियनों ने अपने आपको काम करने से मुक्त कर दिया और अपने लिए मुफ्त में ऐश करने प्रबंध भी इसी दान के अधिकार से कर लिया । धर्म व्यवस्था के नियम भी बहुत कठोर थे । जैसे कोई भी भारत का मूल निवासी मंदिरों, राज महलों और युरेशियनों के आवास में नहीं जा सकता था । अगर कोई मूल निवासी ऐसा करता था तो उसको मार दिया जाता था । आज भी यूरेशियन पुरे भारत में अपने घरों में मूल निवासियों को आने नहीं देते । आज भी दान व्यवस्था के चलते भारत के मंदिरों में कम से कम 10 ट्रिलियन डॉलर की संम्पति युरेशियनों के अधिकार में है । जो मुख्य तौर पर भारत में गरीबी और ख़राब आर्थिक हालातों के लिए जिमेवार है । संम्पति के अधिकार हासिल कर के तो युरेशियनों ने मानवता की सारी सीमा ही तोड़ दी । यहाँ तक भारत में रूद्र शासन से समय से पूजित नारी को भी संम्पति में शामिल कर लिया । नारी को संम्पति में शामिल करने से भी भारत के मूल निवासियों का पतन हुआ । संम्पति के अधिकार भी बहुत कठोर थे । जैसे यूरेशियन सभी प्रकार की संम्पतियों का मालिक था । भारत के मूल निवासियों को संम्पति रखने का अधिकार नहीं था । यूरेशियन भारत की किसी भी राजा की संम्पति को भी ले सकता था । यूरेशियन किसी भी राजा की उसके राज्य से बाहर निकल सकता था । यूरेशियन किसी की भी स्त्री की ले सकता था । यहाँ तक युरेशियनों को राजा की स्त्री के साथ संम्भोग की पूर्ण आज़ादी थी । अगर किसी राजा के सन्तान नहीं होती थी तो यूरेशियन राजा की स्त्री के साथ संम्भोग कर बच्चे पैदा करता था । जिसे कालांतर में “नियोग” पद्धति कहा जाता था । इस प्रकार राजा की होने वाली संतान भी यूरेशियन होती थी । शुद्र व्यवस्था के द्वारा तो युरेशियनों ने सारे देश के मूल निवासियों को अत्यंत गिरा हुआ बना दिया । हज़ारों कठोर नियम बनाये गए । मूल निवासियों का हर प्रकार से पतन हो गया । मूल निवासी किसी भी प्रकार से ऊपर उठने योग्य ही नहीं रह गए । मूल निवासियों पर शासन करने के लिए और बाकायदा मनु-स्मृति जैसे बृहद ग्रन्थ की रचना की गई । आज भी लोग 2002 से पहले प्रकाशित के मनु-स्मृति की प्रतियों को पढेंगे तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी ।
ये कुछ महत्वपूर्ण बातें थी जिन पर भारत का इतिहास लिखने से पहले प्रकाश डालना जरुरी था । यही कुछ बातें है जिनका ज्ञान भारत के मूल निवासियों को होना बहुत जरुरी है । अगर भारत के मूल निवासी युरेशियनों के बनाये हुए नियमों को मानने से मना कर दे । युरेशियनों की बनायीं हुई वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, संम्पति व्यवस्था, वेद व्यवस्था, धर्म व्यवस्था को ना माने । सभी मूल निवासी ब्राह्मणों के बनाये हुए जातिवाद के बन्धनों से स्वयं को मुक्त करे और सभी मूल निवासी नागवंशी समाज की फिर से स्थापना करे । सभी मूल निवासी मिलजुल कर देश का असली इतिहास अपने लोगों को बताये । सभी नागवंशी अपनी क़ाबलियत को समझे । तभी भारत के मूल निवासी पुन: उसी विश्व गुरु के पद को प्राप्त कर सकते है और भारत में फिर से स्वर्ण युग की स्थापना कर सकते है । जल्दी ही भारत का विस्तृत इतिहास अलग अलग अध्यायों के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा । हमारी टीम रात दिन भारत के इतिहास पर हुए हजारों शोधों और पुस्तकों का अध्ययन कर रही है, और भारत का सच्चा इतिहास लिखा जा रहा है ।
आप सभी से विनम्र प्रार्थना है कि भारत का इतिहास सभी लोगों तक पहुंचाए । हमारे इस प्रयास को सार्थक बनाने में हमारा सहयोग करे । “मूलनिवासी फाउंडेशन” आपसे सहयोग की अपेक्षा करता है । खुद भी जागो, और को भी जगाये..!! आओ अम्बेडकर के सपनों का भारत बनाये…!!

Chamar-The Great

कितनी घिनौनी मानसिकता हो गई है सभी की चमारो के प्रति.. देख कर बहुत दुःख हुआ..  हर कोई चमारों को ही गुमराह करता नज़र आता है… जब भी कोई बात सामने आती है चमारों को बलि का बकरा बना दिया जाता है.. जो कोई देखो… चमारो को धर्म, जाति या किसी भी सामाजिक आधार पर चमार को बांटता रहता है… मैं दीक्षा बी. चमार तुम सभी जातियों से पूछती हूँ… हमारे बिना तुम लोगो की औकात ही क्या है…??? अगर हम कोई बात कहे तो हम लोगों को RSS का सदस्य बता देते है… ब्राहमण हमे मुस्लिम बता देते है… अरे तुम लोग हो कौन हमे ये सब कहने वाले…?????
jai mulnivasiआज मैं दीक्षा बी. चमार… मैं कहती हूँ.. तुम सब ने किया ही क्या है… सिर्फ चमारों के कन्धों पर रख कर बन्दूक ही चलाई है… तुम लोगों की औकात नहीं है चमारों के बराबर आने की… एहसान मानो हमारी जात के डॉ अम्बेडकर साहब का.. जिन्होंने तुम लोगों को इस समाज में रहने लायक अधिकार दिए…. आज तुम लोग जो सर उठा कर चलते हो.. वो हमारे अम्बेडकर साहब का एहसान है तुम लोगों पर.. शर्म आती है मुझे तुम लोगों पर… ये सिला देते हो एहसानों का…??? आज भी चमार जहाँ कही भी है.. किसी भी धर्म में है.. अछूत कहलाता है… अरे हम इन ब्राह्मणों के कारण अछूत नहीं है… तुम लोगों की मानसिकता के कारण ज्यादा अछूत कहलाते है… आज अगर अम्बेडकर साहब देखते तो थूकते तुम लोगों पर… लिया सब चमार से और चमारों से ही नफरत करते हो?? क्यों??? कौन कहता है चमार महान नहीं होते?? गुरु रविदास जी महाराज को क्यों भूल गए??? अंतिम महान मानव थे इस दुनिया के.. जिन्होंने अपनी जिंदगी में हजारों चमत्कार किये.. आज भी उनके किये चमत्कारों के प्रमाण मौजूद है.. उन्होंने हर बार सिद्ध किया की मैं भगवान् हूँ.. अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष कर के दिखाया… सच्चा सौदा अर्थात नानक की धर्म की दीक्षा दी(गुरुग्रंथ साहिब पन्ना न.955), 40 किलो का पत्थर पानी पर चला कर दिखाया, 500 मीटर तक उलटी गंगा बहा के दिखाई(गुरु ग्रन्थ साहिब पन्ना न.958), गंगा को काम करने वाली सिला के नीचे से निकल कर दिखाया, अपना सीना फाड़ कर जनेऊ निकल कर दिखाया, शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में पराजित किया(प्रमाण के लिए गुरु ग्रन्थ साहिब पढ़े).. जिस आदमी ने तुम लोगो के लिए अपनी छाती फाड़ दी… उस महामानव को कोई मानता ही नहीं है.. कि गुरु रविदास जी महाराज भगवान् थे… कोई उनको भगवान् स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है…. लेकिन क्यों??? कौन कहता है.. सिख महान धर्म है ?? आज सिख भी गुरुदेव रविदास जी महाराज के किये उपकारों को भूल गए… सिख धर्म हम से है… हमारे कारण ही सिख धर्म का उदय हुआ… जिस किसी को भी शक है.. गुरु ग्रन्थ साहिब का पन्ना न. 965 खोल कर देखे.. और पढ़े… वहा साफ़ साफ़ लिखा है.. की नानक ने गुरु दीक्षा हमारे गुरुदेव रविदास जी महाराज से ली है…. आज भी सारे सिख हमारे ऋणी…. लेकिन कोई नहीं मानता… सब के गुरु, पीर, देवता आदि महान… सबसे बेकार सिर्फ चमार.. आज भी हमारे गुरुदेव जी को सब सिर्फ संत.. सिर्फ गुरु.. कहते है.. क्यों???? बात साफ़ है… कोई भी चमारों का हित नहीं चाहता…. हर कोई चमारों का दमन करने में लगा हुआ है… कोई धर्म परिवर्तन करवाना चाहता है.. ईसाईयों से लेकर बौद्धों तक सब के सब चमार को अपने धर्म में मिलाना चाहते है… कोई अम्बेडकर के नाम पर बाँट रहा है… कोई गुरुदेव रविदास जी के नाम पर बाँट रहा है…. लेकिन क्या धर्म परिवर्तन कर के, या आपस मैं बंट कर कोई चमार ऊँची जात बन गया क्या?? लेकिन मैं दीक्षा बी. चमार पूछती हूँ.. हमने बिगाड़ा क्या है तुम्हारा….?? हमारा कसूर क्या है…?? आज तुम लोग जिस क्रांति की मशाल को लेकर चल रहे हो.. वो मशाल हमारे लोगों ने जलाई.. आज जिस आज़ादी की तुम लोग बात करते हो वो आज़ादी का सपना हमारे लोगों तुम्हे दिया है… तुम लोग जो इज्ज़त की रोटी खाते हो वो भी चमारों के कारण तुम्हे मिली है….. आज मैं दीक्षा बी. चमार एलान करती हूँ… हमारे गुरु रविदास जी महाराज हमारे भगवान् थे.. हमारे भगवान् है.. और हमेशा हमारे भगवान् रहेंगे….. सभी चमारों से अपील है.. कोई भी चमार अपना धर्म परिवर्तन नहीं करेगा.. हर हाल में सिर्फ चमार बन के रहेगा… किसी ने धर्म परिवर्तन किया है तो वापिस चमार बन जाओ.. किसी भी धर्म को मत मानो… किसी भी धर्म का सम्मान मत करो… किसी भी जात का सम्मान मत करो… किसी भी धर्म को दान मत दो.. क्योकि ये सब के सब हमारे और अपने पतन के लिए खुद जिमेवार है… अपने गुरु रविदास जी महाराज को भगवान् मानो… सिर्फ उनका अनुसरण करो… अम्बेडकर ने रविदास जी महाराज के पद चिन्हों पर चले तो महान आदमी कहलाये… ऐसा व्यक्तित्व जिसे भारत तो क्या.. ये पूरी दुनिया कभी नहीं भुला सकती…. अगर हम भी उन्ही रविदास जी महाराज के पद चिन्हों पर चलेंगे तो सोचो कहा पहुंचेंगे….?? गुरुदेव रविदास जी महाराज और धर्मो के भगवानों की तरह हजारों साल पहले नहीं हुए.. आज से सिर्फ 636 साल पहले इस धरती पर थे… हम क्यों इन सभी धर्म की बातों को माने? जिनके भगवान् हजारों साल पहले हुए… किस ने देखा? हुए भी या नहीं हुए? आजकल हर जगह ब्राह्मणवाद फैला हुआ है, क्या पता इन लोगों ने भी ब्राह्मणों की तरह कहानियां लिख कर अपना भगवान् पैदा किया हो? तो दोस्तों, सिर्फ अपने गुरुदेव जी महाराज को मानो… गुरुदेव में श्रदा रखो… उनके बताये कार्य करो… गुरुदेव के बताये रास्ते पर चलो.. जब बाबा साहब गुरुदेव के पद चिन्हों पर चल कर महान बन सकते है तो हम क्यों नहीं? अगर तुम्हे कोई भी धर्म का आदमी आकर तंग करता है… तो बाबा बलि को याद करो, जिनको सभी चमार सिद्ध चान्नों, बाबा बलि जैसे नामों जानते है.. वही हमारे तारण हार बनेंगे.. अपने भगवान् बाबा सिद्ध चान्नों में आस्था रखो.. आज भी ये सब तथाकथित ऊँचे धर्मो वाले बाबा सिद्ध चान्नों के नाम से ही डरते है… क्योकि बाबा सिद्ध चान्नों सिर्फ हमारी पुकार पर ही इन्साफ कर देते है… एक बार याद कर के देखो.. इन ऊँची जात और धर्म वालों के बाबा सिद्ध चान्नों के नाम से ही दिल घट जाते है…
अंतिम चेतावनी है और धर्म के लोगों को… अगर मेरे लोगों को गुमराह किया… या मेरे लोगों को बांटा… तो मैं तुम सभी के धर्म की माँ का शाकिनाका कर दूंगी….

RUDRA-The Mulnivasi

जब ईसा से 3200 साल पहले यूरेशियन दक्षिण से भारत से आये उस समय उत्तर भारत में रुद्रों का शासन था। दक्षिण भारत में उस समय जो भी हुआ, वो भारत के लिए अभिशाप बन गया और उस अभिशाप को आज भी भारत के लोग झेल रहे है। उस समय अगर रुद्रों ने सही समय पर सही कदम उठा कर रोक दिया होता तो आज भारत और भारत के मूल निवासियों की यह हालत नहीं होती। उस समय पुरे भारत में कोई भी जाति प्रथा नहीं थी अर्थात सभी लोग मिल जुल कर रहते थे। वेदों और पुराणों का अध्ययन करने से पता चलता है कि उस समय भारत के मूल निवासियों को नागवंशी कहा जाता था। प्रमाण के लिए आज भी 11 रुद्रों के गले में नागों को देखा जा सकता है, आज भी 11 रुद्रों को नागों के राजा या सम्राट की उपाधि दी जाती है। शिव से लेकर
rudra-the-chamar1शंकर तक सभी रुद्रों को नागों से विभूषित दिखाया जाता है, इसी आधार पर ब्राह्मणों ने भी अपने एक आर्य विष्णु को नाग शैया पर सोया हुआ दिखाया था ताकि भारत के समतावादी और सामान रूप से रहने वाले नागवंशी विष्णु को रुद्रों के बराबर समझे और विष्णु को भगवान् माने। युरेशियनों को खुद तो कुछ नहीं आता था ना युरेशियनों में कोई सभ्यता थी। युरेशियन तो एक क्रूर और बर्बर जाति थी जो जहा भी जाते वहां सिर्फ विनाश करते थे। भारत के मूल निवासी बहुत भोले भाले थे, जबकि यूरेशियन बहुत चालक चतुर थे। मूल निवासी समता के साथ जिंदगी बिताना पसंद करते थे, काफी हद तक भारत के लोगों और रुद्रों की समतावादी नीति भी युरेशियनों के यहाँ बसने का कारण बनी।
ईसा से 3200 साल पहले भारत में गणतन्त्र था। भारत की सीमाए अफगानिस्तान से लेकर श्री लंका, ऑस्ट्रेलिया, भारत के प्रायदीप और दक्षिण अफ्रीका तक थी। पूरा देश 3-5 राज्यों में बंटा हुआ था। जिस में एक गणाधिपति, एक गणाधीश और गणाधीश के नीचे विभिन्न राज्यों के गणनायक होते थे। यह व्यवस्था बिलकुल आज के गणतंत्र जैसी थी, जिसमें रूद्र जो उस समय “गणाधिपति” कहलाते थे वह पीढ़ी दर पीढ़ी शासन करते थे। इसी कारण भारत पर 11 रुद्रों ने पीढ़ी दर पीढ़ी शासन किया। गण नायक समय समय पर राज्यों के लोगों द्वारा चुने जाते थे और सभी गण नायक मिल कर गणाधीश का चयन किया करते थे। उसी समय काल को भारत का “स्वर्ण युग” भी कहा जाता था और भारत को विश्व गुरु होने का गौरव भी प्राप्त था क्योकि उस समय भारत के अलावा दुनिया के किसी भी कोने या देश में गणतंत्र नहीं था। रुद्रों के विषय में पुराणों और इतिहास में कोई खास जानकारी नहीं मिलती क्योकि युरेशियनों ने काफी हद तक रुद्रों के इतिहास को नष्ट कर दिया है। आज जो भी जानकारी पुराणों और वेदों में उपलब्ध है उसे रुद्रों के बारे प्रमाणिक नहीं माना जा सकता। क्योकि “रूद्र परसना” “रूपा मंडाना” “विश्वकर्मा पूरण” “पदम् पूरण” “महाभारत” “वाल्मीकि रामायण” “अग्नि पूरण” “ज्योतिष शास्त्र” जैसे पुराणों का अध्ययन करने पर पाया गया कि सभी पुराणों में 11 रुद्रों के नाम अलग लिखे गए है तो रुद्रों के नामों की जानकारी सत्य साबित नहीं होती। अर्थात यूरेशियन रुद्रों से इतनी इर्ष्या और जलन करते थे कि युरेशियनों ने रुद्रों का नाम भी समाप्त कर दिया। लेकिन पहले रूद्र शिव और अंतिम रूद्र शंकर हुआ यह बात आज भी सत्य है और प्रमाणित है। क्योकि आज किसी को पता नहीं है की शिव से पहले क्या था? शिव को ही बहुत से धर्म सृष्टि का आधार मानते है। 11वे रूद्र शंकर के बारे वेदों पुराणों और इतिहास की बहुत सी किताबों में ढेर सारी जानकारी उपलब्ध है।
11वे रूद्र सम्राट शंकर के बारे अगर जानकारी इक्कठी की जाये तो बहुत सी बाते सामने आती है। सम्राट शंकर नामक रूद्र की राजधानी उतर भारत में स्थित थी। अफगानिस्तान से उतरी भारत, तिब्बत, नेपाल से पंजाब तक के राज्य की देखभाल शंकर करता था। आज भी अफगानिस्तान से उत्तरी भारत, तिब्बत और नेपाल पंजाब आदि के प्राचीन मंदिरों और कलाकृतियों का अध्ययन किया जाये तो हर मंदिर और प्राचीन कलाओं में नागों की नक्काशी की हुई पाई जाती है। उस समय रुद्रों का शासन चीन पर भी रहा होगा, लेकिन कोई ठोस प्रमाण ना मिलने के कारण हम यहाँ चीन का उलेख नहीं कर पा रहे है। फिर अगर चीन के लोगों की जीवनशैली को देखा जाये तो चीन के लोग आज भी नागों को ड्रेगनों के रूप में पूजते है या उनको मानते है। अर्थात रुद्रों का राज्य चीन में भी रहा होगा। रूद्र शंकर के बारे भी सारी सच्चाई वेदों और पुराणों से सामने आती है। शंकर के बारे अध्ययन करने पर पता चलता है कि शंकर का पहला विवाह नाग कन्या गौरा के साथ हुआ था। जो बहुत शक्तिशाली नाग कन्या थी और राज्य प्रबंधन में भी शंकर का साथ देती थी। उतर भारत के पुराने लोक गीतों, राजस्थान के पुराने लोक गीतों और द्रविड़ समाज के पुराने लोक गीतों से यह जानकारी सामने आती है। जोकि पीढ़ी दर पीढ़ी लोग गाते आ रहे है, और आज वह लोक गीत समय के अनुसार समाप्त होने के कगार पर है। उन्ही लोक गीतों और पुराणों को आधार मान कर यह बात भी सामने आती है कि सम्राट शकर की पत्नी गौरा ने उस समय यूरेशियन आर्यों के विरुद्ध बहुत से युद्धों में भाग लिया और हजारों आर्यों का विनाश किया। उसी गौरा को बाद में धोखे से यूरेशियन आर्यों ने आग में जला कर मार डाला और उसी को सती दाह कहा गया। जिस पर बाद में सती प्रथा की नीव राखी गई जो हजारों नाग कन्याओं की मौत का कारण बनी।
गौरा की मृत्यु के बाद नागराज, असुराधिपति, असुरराज सम्राट शंकर उदास रहने लगे। यहाँ बात आज भी प्रमाणित है, अगर वेदों और पुराणों का अध्ययन किया जाये और समाज में प्रचलित अति प्राचीन नाग कथाओं को सच माना जाये तो नागवंशी अपने जीवन साथी के बिना या तो जिन्दा नहीं रहते थे या बहुत उदास रहते थे। सम्राट शंकर के मृत्यु को वर्ण ना करने के पीछे दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि उस समय तक सम्राट शंकर के कोई भी संतान नहीं थी। तो समस्या यह भी थी कि सम्राट शंकर राज्य किसके अधीन छोड़कर जाते? क्योकि उस समय पुरे भारत का शासन सिर्फ रुद्रों के वंशज ही देखते थे। उस समय सभी यूरेशियन आर्यों ने मिलजुल कर भारत के प्रमुख पद गणाधिपति को भारत के मूल निवासियों से छिनने की चाल चली और आर्य कन्या पार्वती को शंकर के पीछे लगा दिया। पार्वती ने कई साल सम्राट शंकर का पीछा किया और शंकर को शादी के लिए मना लिया। परन्तु यूरेशियन आर्य ब्रह्मा के पुत्र आर्य दक्ष को यह बात अच्छी नहीं लगी कि उसकी बेटी को बलि की बकरी बनाया जाये। आर्य दक्ष की बेटी की शादी किसी मूल निवासी से हो यह बात भी दक्ष को पसंद नहीं थी। यही कारण था कि दक्ष हमेशा शंकर को नीचा दिखता था और खुद को बहुत बड़ा प्रजापालक समझता था। परन्तु सम्राट शंकर से डरता भी बहुत था क्योकि दक्ष को पता था कि आमने सामने की लड़ाई में सम्राट शंकर को पार पाना अर्थात जीत असंभव था। तब सभी देवताओं अर्थात यूरेशियन आर्यों ने मिल कर दक्ष को समझया और पार्वती का विवाह सम्राट शंकर से करवा दिया। विवाह के कुछ समय बाद शंकर अपने राज्य प्रबंधन के कार्य से अपने राज्य में भ्रमण करने चले गए। जब कुछ सालों बाद सम्राट शंकर वापिस आये तो उनके घर के दरवाजे पर एक आर्य पुत्र खड़ा पाया जिसने सम्राट शंकर को अन्दर प्रवेश करने से रोक दिया। आर्य पुत्र का दु:साहस सेख कर सम्राट शंकर को क्रोध आ गया और उसको वहा से हटा कर सम्राट शंकर अन्दर चले गए। यहाँ यह कहना की सम्राट शंकर ने उस बालक को मार दिया तो यह बात ना तो न्यायोचित है और ना ही न्यायसंगत। क्योकि सम्राट शंकर जैसा महाबलशाली, महापराक्रमी राजा एक छोटे से बालक की हत्या कैसे कर सकता था। अब वो बालक कहा से आया इस बात का जो उलेख पुराणों में किया गया है वो एक बहुत बड़ा झूठ है। ना ही तो पार्वती ने अपने मैला निकला, ना ही किसी बालक का निर्माण किया, ना ही उस बालक को मारा गया और ना ही बाद में जिन्दा किया गया। क्योकि यह बात विज्ञान संगत नहीं है, किसी भी आदमी के बच्चे को मार कर जिन्दा कैसे किया जा सकता है? किसी आदमी के बच्चे की गर्दन पर हाथी जैसे जानवर का सिर कैसे जोड़ा जा सकता है? वास्तव में पार्वती चरित्रहीन औरत थी, जिसने किसी आर्य से शारीरिक सम्बन्ध बनाकर एक पुत्र को जन्म दिया था और आर्यों ने उस बालक को रुद्र्वंश का राजा बनाने की चाल चली गई थी।
सम्राट शंकर तो हमेशा राज्य कार्यों में व्यस्त रहते थे तो उनके पास समय कम होता था। जिसको यूरेशियन आर्यों ने बाद में सम्राट शकर का हमेशा अपने गणों के साथ नशे में मगन रहने का झूठा प्रचार किया। सम्राट शंकर के राज्य में सभी मूल निवासी मिलजुल कर रहते थे, उन में से कोई मांसाहारी था तो कोई शाकाहारी, परन्तु आपस में कोई भेद-भाव नहीं था। लेकिन यूरेशियन आर्यों ने इसका हमेशा ही गलत प्रचार किया, सम्राट शंकर के गणों को जो सम्राट शंकर की राज्य प्रबंधन में सहायता करते थे उनको भुत, प्रेत, पिशाच और राक्षस तक कहा। सम्राट शंकर का शासन पुरे भारत में था, ये बात यहाँ से भी प्रमाणित हो जाती है कि आज भी उतर भारत से लेकर दक्षिण और पूर्वी भारत से पश्चिम भारत के लोग सम्राट शंकर को किसी न किसी रूप में अपने महादेवता के रूप में मानते है। आज भी सभी आदिवासी कबीलों में सम्राट शिव से लेकर सम्राट शंकर तक सभी रुद्रों के बारे लोक गीत गाये जाते है। लोग तरह तरह से उस रुद्रों के शासन काल को याद करते है।
पार्वती के द्वारा विश्वास भंग करने के बाद सम्राट शंकर पार्वती से दूर दूर ही रहा करते थे। इसी से दुखी हो कर पार्वती ने महाशिवरात्रि की रात को सम्राट शंकर को भांग का घोटा बना कर, उस में जहर मिला कर सम्राट शंकर को पीने को दे दिया और सम्राट शंकर की मृत्यु हो गई। जहर से सम्राट शंकर की काया नीली हो गई, मृत्यु के बाद अगले दिन सम्राट शंकर का शरीर बहार निकला गया और एक बड़ी सी शिला पर बिठा दिया गया और भारत के मूल निवासियों को बता दिया गया कि सम्राट समाधि में चले गए है। कही भारत के मूल निवासी विद्रोह ना कर दे, इस लिए सारे भारत के लोगों को बताया गया कि धरती को बचाने के लिए सम्राट शंकर ने जहर पीया है, प्रचारित किया गया। जो बाद में समुद्र मंथन के साथ जोड़ दिया गया। ना कभी समुद्र मंथन हुआ, ना कभी जहर निकला, ना किसी ने वो जहर पिया और ना ही कभी अमृत निकला। असल में रुद्रों का शासन हड़पने को भारतीय पुराणों और वेदों में अमृत मिलाना कहा गया है। जो यूरेशियन आर्यों के लिए बहुत बड़ी बात थी, और आज भी यूरेशियन सम्राट शंकर के मृत्यु दिवस को धूमधाम से मानते है। और सारे मूल निवासी भी अपने देश के सबसे बड़े और अंतिम सम्राट की मृत्यु का जश्न यूरेशियन आर्यों के साथ मानते है।
सम्राट शंकर की मृत्यु तो आर्य घोषित नहीं कर पाए क्योकि अगर सम्राट शंकर की मृत्यु घोषित कर दी जाति तो पुरे देश में विद्रोह हो जाता और यूरेशियन आर्यों का नामो निशान इस देश से और इस दुनिया से मिट जाता और सम्राट शंकर के शरीर को सबके सामने बिठा कर हमेशा-हमेशा के लिए मूल निवासियों का भगवान् बना दिया और उसकी आड़ में आर्यों ने भारत पर अपना शासन शुरु किया। अब यूरेशियन आर्यों के हाथ में भारत की मुख्य शासन तंत्र आ गया था और उसी को समयानुसार अमृत बोला गया जो सिर्फ यूरेशियन आर्यों को प्राप्त हुआ था।
सम्राट शंकर का वंश यही समाप्त नहीं हो गया था। पार्वती के विश्वास घात के बाद बहुत सी जगहों पर सम्राट शंकर ने और औरतों के साथ बच्चे पैदा किये थे। जिन में एक बच्चा दक्षिण भारत में भी पैदा किया गया था और उसका नाम कार्तिक था। लेकिन कार्तिक को किसी भी आर्य ने रुद्रों की संतान नहीं माना तो वह हमेशा के लिए दक्षिण भारत में ही रह गया। इस प्रकार यूरेशियन आर्यों ने भारत से रूद्र शासन का अंत कर दिया। और रुद्रों का नाम इस ख़त्म कर दिया। यूरेशियन आर्यों की नीचता का पता इस बात से भी लगता है कि उन्होंने एक झूठी काल्पनिक कहानी गढ़ कर सम्राट शंकर का लिंग बना दिया। और उसको योनी में खड़ा कर दिया। और आज सारा भारत उसी को शिवलिंग के नाम से पूजता है, कोई यह नहीं जानता कि वो शिवलिंग आया कहा से, किसने बनाया? आज कोई भी मूल निवासी बहुत से मूल निवासी सम्राट शंकर को अपना सम्राट तक नहीं मानते। सभी आँखे बंद कर के ब्राह्मणों की बताई बातों पर चलते है, और अपने सम्राट शंकर को हर राज बे-इज्ज़त होते देखते है। कोई भी इस प्रथा का विरोध तक नहीं करता। हमारी टीम ने कई दिनों की मेहनत के बाद ये सच ढूंढ कर निकला। लेकिन फिर भी हमारे ही मूल निवासी हमे ही गलियां देंगे। कोई सच जानना नहीं चाहेगा। अब प्रश्न उठता है कि रूद्र वंश के लोग कहा गए? इतना महान वंश ऐसे ही ख़त्म तो नहीं हो गया होगा? तो हमारी टीम ने उतर भारत के सभी राज्यों का इतिहास ढूंढा तो पता चला कि जम्मू और कश्मीर के आस पास के प्रदेशों पर ईसा से 200 साल पहले से 550 इसवी तक चमारों का शासन था। यह बात आप भारत के आधुनिक इतिहास में भी पढ़ सकते हो और जान सकते हो कि जम्मू कश्मीर के आसपास के राजा चमार हुआ करते थे। ये बात आज सारी दुनिया मानती है। जम्मू कश्मीर में पुरात्व विभाग द्वारा खुदाई के बाद ईसा से 200 साल पहले के सिक्के मिले है। जिन पर शिव और शंकर आदि रुद्रों के चिन्ह और मूर्तियाँ पाई गई। इस का अर्थ यह निकलता है। रूद्र वशं के लोगों पर यूरेशियन आर्यों ने मनचाहे अत्याचार किये और उनको मृत जानवरों को खाने पर विवश किया। रूद्र वंश का इतना पतन किया गया कि आज वही रूद्र वंश चमार जाति के नाम के साथ समाज में अपनी पहचान भूल कर खुद को निरह समझ कर सामाजिक अत्याचारों का सामना कर रहा है। सभी पाठक गण कृपया यह ना समझे कि हमारी टीम में सिर्फ चमार ही है और हम जानबूझ कर चमारों को बहुत बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहे है। हमारी टीम में ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई हर जाति के लोग है, जिनको आज ये सभी यूरेशियन शुद्र बुलाते है। हम सभी सिर्फ मूल निवासी है। जो सिर्फ मूल निवासियों के हित में कार्य कर रहे है। सभी पाठक गणों से प्रार्थना है कोई भी टिपण्णी करने से पहले ऊपर दिए गए प्रमाणों पर विचार करे। कर्मश:

Chamar

Who are they?
One of the largest communities of India, they are a Scheduled Caste that has a single generic name. The name Chamar is derived from the Sanskrit charmakar (leather worker). They work with leather, making hides and shoes and bags. They were relegated to living on the outer edges of villages due to the small of rotting hides and chemicals that they were steeped in. The name Dalit (Marathi for the broken or oppressed people) is a preferred name for this community.
They are known by various names in each state and are listed along with other synonyms and subgroups. In Uttar Pradesh they are known as Raidas; in Bihar as Charmkar, Mochi or Ravidas; in Chandigarh as Jatia Chamar or Ramdasi; in Himachal Pradesh as Arya or Mochi; in Punjab as Ramdasi or Raigar; and in Haryana as Jatav or Jatia. Some of these subgroups, such as the Satnami of Madhya Pradesh, prefer not to identified with Chamars and maintain a separate identity.
They belong to a caste group of heterogeneous people who are not racially or socially homogenous. They are a conglomeration of a large number of people groups from the lowest caste regarded as untouchable according to Hindu social and religious belief. The Indian Constitution abolished the Chamar’s untouchable status and was listed in a schedule with all other lower castes (from which the term Scheduled Caste is derived) and made them eligible to receive special benefits from the government’s developmental schemes. In spite of this legislation, social stigma remains and higher castes still do not drink or eat food and water from Chamars, especially in rural areas. UP has the largest percentage (21%) and number (37 million) of the Oppressed Dalits (a collective term used for people groups considered untouchables by Hindus). The Chamar live in almost all the states of northern, central and western India.

What Are Their Lives Like?

The Chamar are partly urban and partly rural community, mostly living in the plains. In the past, the Chamar have been landless and known for their work in skin and hide work and agricultural labour. However, under the government’s post-independence land allotment programs, seven of the twenty-nine Chamar communities have become landholders. The Reservation policies for Scheduled Castes have enabled many Chamar to become government employees. Some other occupations include unskilled labour for daily wages or contract basis, masonry, basketry and self employment.
The Chamar play an important part in politics. In an attempt to rid themselves of caste bias and exploitation, they have united with other Dalits to form a national political party called the Bahujan Samaj Party which has takes an offensive position towards higher castes. The Party has been quite successful. One of its Chamar leaders, Ms. Mayawati, was elected Chief Minister of Uttar Pradesh in 1995. This was a milestone in conservative Uttar Pradesh which is traditionally ruled by the higher castes.
Although education is important to the Chamars, boys are sent to school only for a short time and leave to find work in order to support the family. Girls are generally kept home as it is socially unacceptable to extend opportunities to them that are traditionally reserved for boys. The Chamar are a dynamic community and are more likely to make use of the opportunities offered by development programs in comparison to other Dalits. Family planning is increasingly acceptable to them.
The Chamar are non-vegetarians who eat mostly pork; beef is eaten in Gujarat though it is not permitted by Hindus. Some eat carrion. Goan Chamar have a diet of fish curry and rice. Other staples are wheat, rice, barley, millet and maize.

Customs

The Chamar marry within their community but maintain exogamy at village or clan level. In Uttar Pradesh, marriages between cousins are acceptable, preferably with the daughter of a mother’s brother. Marriage is arranged by negotiation between families. Child marriages are becoming less common. Marriage symbols are vermilion on the forehead, bangles and toe-rings. A dowry is given by the bride’s family though a few Chamar pay a cash bride price. Divorce is permitted on grounds of maladjustment, adultery or cruelty. Widows and divorced women are allowed to remarry.
Chamar’s live apart from their parents and in joint families. A son is entitled to an equal share of inheritance; the oldest succeeds his father as head of the family. Daughters receive no inheritance and have a low status. In villages, the women tend domestic animals, collect cow dung and make ‘pats’ that is used as fuel and sometimes also work as laborers to contribute to the family’s income. They participate in social and religious events that relate to family and community.
Community councils exercise social control. Sentencing for includes social boycott, excommunication and cash fines. The community is rich in oral tradition and has a vast repertoire of folk-songs, sung to the accompaniment of percussion instruments.

What Are Their Beliefs?

Chamar communities are mainly Hindu but some are Buddhist and Sikh. In North India, most Hindu Chamar belong to the Raidasi sect and worship guru Ravidas, a disciple of Ramananda, who is known as a champion for promoting change for the oppressed Chamar. Other gods, family and village deities are also worshipped.
The Jatav, a subgroup of the Chamar famous for leather craftsmanship, live in the districts of Agra and Mathura and disassociate their community from other Chamar. The Jatav continue mass conversions to Buddhism since 1956, when Dr. Ambedkar, a champion for India’s disadvantaged people, embraced Buddhism. Festivals for his birth and death anniversaries are held in his honor.
In Haryana, some Chamar, influenced by Dr. Ambedkar, converted to Buddhism, while others are Christian and Sikh. Sociologists have found that despite calling themselves Buddhists, old Hindu beliefs are so ingrained that they coexist with their belief in Ambedkar and Buddha. Some Chamar communities also believe in spirits and the ‘evil eye’ and consult sorcerers. Bihari deities include Sati, and Sitala Mata, while in Goa, Ganesh and Shiva are worshipped. Most Chamar in Punjab and Chandigarh are Sikh and are called Ramdasi after Guru Ramdas the fifth Sikh Guru. They bow down before the Guru Granth Sahib, the holy book of the Sikhs. The Nirankari and Radhasaomi sects advocate worship to an omnipresent Supreme Being who is without form, does away with rituals and idolatry and provides close fellowship within equals.

What Are Their Needs?

The basic needs of the Chamar are financial security and literacy. A greater need is for equal opportunity, dignity and freedom from discrimination. .
Outside India ?                                                                                                                                          A lot of Chamars escaped oppression and emigrated to Fiji, St Lucia etc as labourers over 100 years ago. These people removed the caste system and the dowry system altogether from their culture. Their decendants grew up to be educated professionals such as doctors, professors, bankers and businessmen who now thrive in Fiji USA New Zealand Canada etc.. They live with dignity and pride with no stigma. They enjoy a quality lifestyle far removed from what their fellow dalits are subjected to in India even today. Their success is proof that the reason Dalits are backward is because they are subjugated and trodden upon by the so called upper castes in their homeland.. Give us a level playing field and we are just as good as anybody else. Had god designated the occupation and status of Dalits, those in Fiji would still have been exactly in the same situation as Dalits in India.
चमार कोई नीच जाति नहीँ, बल्कि सनातन धर्म के रक्षक जिन्होंने मुगलोँ का जुल्म सहा मगर धर्म न त्यागा Read more at: http://hindi.revoltpress.com/history/its-chanvar-the-great-kshatriyas-not-chamar/
 आप जानकार हैरान हो सकते हैं कि भारत में जिस जाति चमार बोला जाता है वो असल में चंवरवंश की क्षत्रिय जाति है। यह खुलासा डॉक्टर विजय सोनकर की पुस्तक – “हिन्दू चर्ममारी जाति:एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास” में हुआ है। इस किताब में डॉ सोनकर ने लिखा है कि – “विदेशी विद्वान् कर्नल टॉड द्वारा पुस्तक “राजस्थान का इतिहास” में चंवरवंश के बारे में बहुत विस्तार में लिखा गया है।” डॉ सोनकर बताते हैं कि – “इतना ही नहीं बल्कि महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस वंश का उल्लेख है। हिन्दू वर्ण व्यवस्था को क्रूर और भेद-भाव बनाने वाले हिन्दू नहीं, बल्कि विदेशी आक्रमणकारी थे!” जब भारत पर तुर्कियों का राज था, उस सदी में इस वंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था, उस समय उनके प्रतापी राजा थे चंवर सेन। इस राज परिवार के वैवाहिक सम्बन्ध बप्पा रावल के वंश के साथ थे। राणा सांगा और उनकी पत्नी झाली रानी ने संत रैदासजी जो कि चंवरवंश के थे, उनको मेवाड़ का राजगुरु बनाया था। वे चित्तोड़ के किले में बाकायदा प्रार्थना करते थे। इस तरह आज के समाज में जिन्हें चमार बुलाया जाता है, उनका इतिहास में कहीं भी उल्लेख नहीं है। डॉक्टर विजय सोनकर के अनुसार प्राचीनकाल में ना तो यह शब्द पाया जाता है, ना हीं इस नाम की कोई जाति है। ऋग्वेद में बुनकरों का उल्लेख तो है, पर वहाँ भी उन्हें चमार नहीं बल्कि तुतुवाय के नाम से सम्बोधित किया गया है। सोनकर कहते हैं कि चमार शब्द का उपयोग पहली बार सिकंदर लोदी ने किया था। ये वो समय था जब हिन्दू संत रविदास का चमत्कार बढ़ने लगा था अत: मुगल शासन घबरा गया। सिकंदर लोदी ने सदना कसाई को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा। वह जानता था कि यदि संत रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गई, स्वयं सदना कसाई शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सके और संत रविदास की भक्ति से प्रभावित होकर उनका भक्त यानी वैष्णव (हिन्दू) हो गए। उनका नाम सदना कसाई से रामदास हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए। जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी ने क्रोधित होकर इनके अनुयायियों को अपमानित करने के लिए पहली बार “चमार“ शब्द का उपयोग किया था। उन्होंने संत रविदास को कारावास में डाल दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जूती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया। उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए गए लेकिन उन्होंने कहा :- ”वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान, फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान। वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार, तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार॥” यातनायें सहने के पश्चात् भी वे अपने वैदिक धर्म पर अडिग रहे और अपने अनुयायियों को विधर्मी होने से बचा लिया। ऐसे थे हमारे महान संत रविदास जिन्होंने धर्म, देश रक्षार्थ सारा जीवन लगा दिया। शीघ्र ही चंवरवंश के वीरों ने दिल्ली को घेर लिया और सिकन्दर लोदी को संत को छोड़ना ही पड़ा। संत रविदास की मृत्यु चैत्र शुक्ल चतुर्दशी विक्रम संवत १५८४ रविवार के दिन चित्तौड़ में हुई। वे आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी स्मृति आज भी हमें उनके आदर्शो पर चलने हेतु प्रेरित करती है, आज भी उनका जीवन हमारे समाज के लिए प्रासंगिक है। हमें यह ध्यान रखना होगा की आज के छह सौ वर्ष पहले चमार जाती थी ही नहीं। इतने ज़ुल्म सहने के बाद भी इस वंश के हिन्दुओं ने धर्म और राष्ट्र हित को नहीं त्यागा, गलती हमारे भारतीय समाज में है। आज भारतीय अपने से ज्यादा भरोसा वामपंथियों और अंग्रेजों के लेखन पर करते हैं, उनके कहे झूठ के चलते बस आपस में ही लड़ते रहते हैं। हिन्दू समाज को ऐसे सलीमशाही जूतियाँ चाटने वाले इतिहासकारों और इनके द्वारा फैलाए गये वैमनस्य से अवगत होकर ऊपर उठाना चाहिए l सत्य तो यह है कि आज हिन्दू समाज अगर कायम है, तो उसमें बहुत बड़ा बलिदान इस वंश के वीरों का है। जिन्होंने नीचे काम करना स्वीकार किया, पर इस्लाम नहीं अपनाया। उस समय या तो आप इस्लाम को अपना सकते थे, या मौत को गले लगा सकते था, अपने जनपद/प्रदेश से भाग सकते थे, या फिर आप वो काम करने को हामी भर सकते थे जो अन्य लोग नहीं करना चाहते थे। चंवर वंश के इन वीरों ने पद्दलित होना स्वीकार किया, धर्म बचाने हेतु सुवर पलना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है। नोट :- हिन्दू समाज में छुआ-छूत, भेद-भाव, ऊँच-नीच का भाव था ही नहीं, ये सब कुरीतियाँ मुगल कालीन, अंग्रेज कालीन और भाड़े के वामपंथी व् हिन्दू विरोधी इतिहासकारों की देन है। 

वाल्मीकि का सच


महर्षि बाल्मीकि कौन थे? उनके बारे में विस्तार से रचयिता आदि कवि वाल्मीकि के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए नहीं बल्कि “सफाई कर्मी जाति ” को हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था पर आस्था पक्की करने के तहत दी है। वाल्मीकि का सफाई कर्मचारियों से क्या सम्बन्ध बनता है? छुआछूत और दलित मुक्ति का वाल्मीकि से क्या लेना देना है ? क्या वाल्मीकि छूआछूत की जड़ हिन्दू ब्राह्मण जाति धर्म से मुक्ति की बात करते हैं ? वाल्मीकि ब्राहमण थे, यह बात रामायण से ही सिद्ध है। वाल्मीकि ने कठोर तपस्या की, यह भी पता चलता है कि दलित परम्परा में तपस्या कीअवधारणा ही नहीं है। यह वैदिक परम्परा की अवधारणा है। इसी वैदिक परम्परा से वाल्मीकि आते हैं। वाल्मीकि का आश्रम भी वैदिक परम्परा का गुरुकुल है, जिसमें ब्राह्मण और राजपरिवारों के बच्चे विद्या अर्जन करते हैं। ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि वाल्मीकि ने शूद्रों- अछूतो को शिक्षा दी हो। अछूत जातियों की या सफाईकार्य से जुड़े लोगों की मुक्ति के संबंध में भी उनके किसी आन्दोलन का पता नहीं चलता। फिर वाल्मीकि सफाई कर्मचारयों के भगवान कैसे हो गए? जब हम इतिहास का अवलोकन करते हें, तो 1925 से पहले हमें वाल्मीकि शब्द नहीं मिलता। सफाई कर्मचारियों और चूह्डों को हिंदू फोल्ड में बनाये रखने के उद्देश्य से उन्हें वाल्मीकि से जोड़ने और वाल्मीकि नाम देने की योजना बीस के दशक में आर्य समाज ने बनाई थी। इस काम को जिस आर्य समाजी पंडित ने अंजाम दिया था, उसका नाम अमीचंद शर्मा था। यह वही समय है, जब पूरे देश में दलित मुक्ति के आन्दोलन चल रहे थे। महाराष्ट्र में डा. आंबेडकर का हिंदू व्यवस्था के खिलाफ सत्याग्रह, उत्तर भारत में स्वामी अछूतानन्द का आदि हिंदू आन्दोलन और पंजाब में मंगूराम मूंगोवालिया का आदधर्म आन्दोलन उस समय अपने चरम पर थे। पंजाब में दलित जातियां बहुत तेजी सेआदधर्म स्वीकार कर रही थीं। आर्य समाज ने इसी क्रांति को रोकने के लिए अमीचंद शर्मा को काम पर लगाया। योजना के तहत अमीचंद शर्मा ने सफाई कर्मचारियों के महल्लों में आना-जाना शुरू किया। उनकी कुछ समस्याओं को लेकर काम करना शुरू किया। शीघ्र ही वह उनके बीच घुल-मिल गया और उनका नेता बन गया। उसने उन्हें डा. आंबेडकर, अछूतानन्द और मंगूराम के आंदोलनों के खिलाफ भडकाना शुरू किया। वे अनपढ़और गरीब लोग उसके जाल में फंस गए। 1925 में अमीचंद शर्मा ने ‘श्री वाल्मीकि प्रकाश’ नाम की किताब लिखी, जिसमें उसने वाल्मीकि को उनका गुरु बताया और उन्हें वाल्मीकि का धर्म अपनाने को कहा। उसने उनके सामने वाल्मीकि धर्म की रूपरेखा भी रखी। डॉ आंबेडकर, अछूतानन्द और मंगूराम के आन्दोलन दलित जातियों को गंदे पेशे छोड़ कर स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरे पेशे अपनाने को कहते थे। इन आंदोलनों के प्रभाव में आकार तमाम दलित जातियां गंदे पेशे छोड़ रही थीं। इस परिवर्तन से ब्राह्मण बहुत परेशान थे। उनकी चिंता यह थी कि अगर सफाई करने वाले दलितों ने मैला उठाने का काम छोड़ दिया, तो ब्राह्मणो के घर नर्क बन जायेंगे। इसलिए अमीचंदशर्मा ने वाल्मीकि धर्म खड़ा करके सफाई कर्मी समुदाय को ‘वाल्मीकि समुदाय’ बना दिया। उसने उन्हें दो बातें समझायीं। पहली यह कि हमेशा हिन्दू धर्म की जय मनाओ, और दूसरी यह कि यदि वे हिंदुओं की सेवा करना छोड़ देंगे, तो न् उनके पास धन आएगाऔर न् ज्ञान आ पा पायेगा। अमीचंद शर्मा का षड्यंत्र कितना सफल हुआ ,सबके सामने है। आदिकवि वाल्मीकि के नाम से सफाई कर्मी समाज वाल्मीकि समुदाय के रूप में पूरी तरह स्थापित हो चुका है। ‘वाल्मीकि धर्म ‘के संगठन पंजाब से निकल कर पूरे उत्तर भारत में खड़े हो गए हैं। वाल्मीकि धर्म के अनुयायी वाल्मीकि की माला और ताबीज पहनते हैं। इनके अपने धर्माचार्य हैं, जो बाकायदा प्रवचन देते हैं और कर्मकांड कराते हैं। ये वाल्मीकि जयंती को “प्रगटदिवस” कहते हैं. इनकी मान्यता है कि वाल्मीकि भगवान हैं, उनका जन्म नहीं हुआ था, वे कमल के फूल पर प्रगट हुए थे, वे सृष्टि के रचयिता भी हैं और उन्होने रामायण की रचना राम के जन्म से भी चार हजार साल पहले ही अपनी कल्पना से लिख दी थी। हालांकि ब्राह्मणों द्वारा “सफाई भंगी जाति” की दुर्दशा की कल्पना तक उन्हें नहीं थी ।
75310आज भी जब हम वाल्मीकि समाज के लोगों के बीच जाते है तो सफाईकर्मी वाल्मीकि के खिलाफ सुनना तक पसंद नहीं करते। बाबा साहब जी ने सही कहा है कि धर्म के कारण ही हम लोग आज भी गुलाम है। और जब तक इन कालपनिक धर्मों को मानते रहोगे तब तक मूलनिवासी चाहे वो किसी भी समुदाय से है उसका उद्दार संभव नहीं है। काल्पनिक कहानियों के आधार पर खुद को सर्वोच्च साबित करना ही असली ब्राह्मणवाद है। और यही काम आज हर कोई मूलनिवासी कर रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज मूलनिवासी ही अपनी गुलामी के लिए मुख्य रूप से जिमेवार है।
धर्म वह व्यवस्था है जिसके अंतर्गत ब्राह्मणवादी लोगों ने मूलनिवासियों को मानसिक गुलाम बनाया है और जब तक मूलनिवासी धर्म को नहीं छोड़ेंगे तब तक ना तो मूलनिवासी समाज एक हो सकता है और ना ब्राह्मणवाद से मुक्त।
शायद मेरे कुछ भाई मेरी इस पोस्ट मुझे गलत समझने लगेंगे। लेकिन यही सच है और हमे इस सच को स्वीकार करना ही पड़ेगा। वाल्मीकि ने अपने समय में या ब्राह्मणों द्वारा लिखित रामायण जैसी किताबों में कही नहीं लिखा कि मूलनिवासियों से प्यार करो। मूलनिवासियों को उनके अधिकार दो या मूलनिवासियों को सम्मान दो। यह बात बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने ही लिखी है। इसलिए हमारा भला कोई भी काल्पनिक भगवान या कहानियों से नहीं हो सकता। बात को समझो “काल्पनिक और मनघडंत कहानियों के आधार पर अपने आप को सर्वोच्च साबित करना ही ब्राह्मणवाद है।” जिस दिन आप लोग यह बात समझ जाओगे ठीक उसी दिन ब्राह्मणवाद से मुक्ति हासिल कर लोगे।
 इतिहास जब पढने बैठता हूं तो काफी तकलीफों से घिर जाता हूं। आखिर किस तरह से अंग्रेज व वामपंथी-कांग्रेसी इतिहासकारों ने हमारे गर्व को कुचला है और हमें अपने ही भाईयों से जुदा कर दिया है, अधकचरा इतिहास लिख-लिख कर। खासकर हिंदू समाज को छिन्‍न-भिन्‍न करने का काम जिस तरह से मध्‍यकाल में इस्‍लामी अक्रांताओं ने किया, उसी तरह ब्रिटिश ने हम पर मानसिक गुलामी थोपी और आजादी के बाद वामपंथी-कांग्रेसियों ने उस गुलामी को हर संभव बनाए रखने का प्रयास किया और यह सब केवल मुस्लिम तष्टिकरण के लिए किया गया जबकि सच्‍चाई यह है कि यहां के मुसलमान कोई विदेशी नहीं हैं, बल्कि हमारे ही रक्‍त, हमारे ही भाई है।
खटिक जाति का इतिहास पढ़ रहा था। आज जिसे दलित और अछूत आप मानते हैं न, उस जाति के कारण हिंदू धर्म का गौरव पताका हमेशा फहराता रहा है। खटिक जाति मूल रूप से वो ब्राहमण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्‍कृत में इनके लिए शब्‍द है, 'खटिटक'।
मध्‍यकाल में जब क्रूर इस्‍लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राहमणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी। मंदिर परिसर में रहने वाले खटिक ही सर्वप्रथम उनका सामना करते थे। तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए लाखों खटिक सैनिकों की हत्‍या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की।
मध्‍यकालीन बर्बर दिल्‍ली सल्‍तनत में गुलाम, तुर्क, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी वंश आदि और बाद में मुगल शासनकाल में जब डरपोक हिंदू जाति मौत या इस्‍लाम चुनने में से इस्‍लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने खुद के धर्म और अपनी बहु बेटियों को बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया। इस्‍लाम में सूअर को हराम माना गया है और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्‍होंने हिंदू के देवता विष्‍णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिम जब गो हत्‍या करने लगे तो उसके प्रतिकार स्‍वरूप खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू किया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पददलित होते चले गए। कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।
1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवार को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्‍साए अंग्रेजों ने 1891 में खटिक जाति को अपराधि जाति घोषित कर दिया। अपराधी एक व्‍यक्ति होता है, पूरा समाज नहीं। लेकिन जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोएं खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारी, बल्कि उनकी पत्‍नी बच्‍चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्‍हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।
आजादी से पूर्व जब मोहम्‍मद अलि जिन्‍ना ने डायरेक्‍ट एक्‍शन की घोषणा की थी तो मुसिलमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मुख्‍यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने वर्तमान बंग्‍लादेश में स्थित नाओखाली में लिया।
आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्‍योंकि हमें ननका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा दिया गया है। आप यह जान लीजिए कि दलित शब्‍द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में 'डिप्रेस्‍ड क्‍लास' के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्‍थान पर दलित शब्‍द में तब्‍दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्‍य में 'दलित' शब्‍द का उल्‍लेख कहीं नहीं मिलता है।
हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोडने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्‍लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्‍यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं। हमें शर्म भी नहीं आती, जिन लोगों ने हिंदू धर्म की रक्षा की, वो लोग ही हमारे समाज से बहिष्‍कृत हैं। आप अपना इतिहास पढिए, नहीं तो आपके पूर्वज आपको माफ नहीं करेंगे और आपकी अगली पीढ़ी सेक्‍यूलर के नाम पर कुत्सित और डरपोक होती चली जाएगी....
साभार: 1) हिंदू खटिक जाति: एक धर्माभिमानी समाज की उत्‍पत्ति, उत्‍थान एवं पतन का इतिहास, लेखक- डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री, प्रभात प्रकाशन
2) आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू मुस्लिम दंगे में खटिक जाति का जिक्र, पुस्‍तक 'अप्रतिम नायक: श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी' में आया है। यह पुस्‍तक भी प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।

चंवरवंश के क्षत्रिए जिन्‍हें सिकंदर लोदी ने 'चमार' बनाया और

हमारे-आपके हिंदू पुरखों ने उन्‍हें अछूत बना कर इस्‍लामी 

बर्बरता का हाथ मजबूत किया!

 09 March 2015 

संदीप देव। आज जिन्‍हें आप 'चमार' जाति से संबोधित करते हैं, उनके साथ छूआछूत का व्‍यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवरवंश के क्षत्रिए हैं। 'हिंदू चर्ममारी जाति: एक स्‍वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास' पुस्‍तक के लेखक डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री लिखते हैं, विदेशी विद्वान कर्नल टाड ने अपनी पुस्‍तक ' राजस्‍थान का इतिहास' में चंवरवंश के बारे में विस्‍तार से लिखा है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्‍लेख है। तुर्क आक्रांतों के काल में इस राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे। इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्‍पा रावल वंश के साथ था। राणा सांगा व उनकी पत्‍नी झाली रानी ने चंवर वंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको अपने मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्‍तौड के किले में रहने की प्रार्थना की थी।
वर्तमान हिंदू समाज में जिनको चमार कहा जाता है, उनका किसी भी रूप में प्राचीन भारत के साहित्‍य में उल्‍लेख नहीं मिलता है। डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री के अनुसार, प्राचीनकाल में न तो यह शब्‍द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी। ऋग्‍वेद के दूसरे अध्‍याय में में बुनाई तकनीक का उल्‍लेख जरूर मिलता है, लेकिन उन बुनकरों को 'तुतुवाय' नाम प्राप्‍त था, चमार नहीं। 
'अर्वनाइजेशन' की लेखिका डॉ हमीदा खातून लिखती हैं, मध्‍यकालीन इस्‍लामी शासन से पूर्व भारत में चर्म एवं सफाई कर्म का एक भी उदाहरण नहीं मिलता है। हिंदू चमड़े को निषिद्ध व हेय समझते थे, लेकिन भारत में मुसलिम शासकों ने इसके उत्‍पादन के भारी प्रयास किए थे।
डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री के अनुसार, मुस्लिम आक्रांताओं के धार्मिक उत्‍पीड़न का अहिंसक तरीके से सर्वप्रथम जवाब देने की कोशिश संत शिरोमणी रैदास ने की थी, जिनको सिकंदर लोदी ने बलपूर्वक चर्म कर्म में नियोजित करते हुए 'चमार' शब्‍द से संबोधित किया और अपमानित किया था। 'चमार शब्‍द का प्रचलन वहीं से आरंभ हुआ।
डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री के मुताबिक, संत रैदास ने सार्वजनिक मंच पर शास्‍त्रार्थ कर मुल्‍ला सदना फकीर को परास्‍त किया। परास्‍त होने के बाद मुल्‍ला सदना फकीर सनातन धर्म के प्रति नतमस्‍तक होकर हिंदू बन गया। इससे सिकंदर लोदी आगबबूला हो गया और उसने संत रैदास को पकड कर जेल में डाल दिया था। इसके प्रतिउत्‍तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्‍ली को घेर लिया था। इससे भयभीत हो सिकलंदर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था।
संत रैदास का यह दोहा देखिए:
बादशाह ने वचन उचारा । मत प्‍यारा इसलाम हमारा ।।

खंडन करै उसे रविदासा । उसे करौ प्राण कौ नाशा ।। 
 .......जब तक राम नाम रट लावे । दाना पानी यह नहीं पावे ।।जब इसलाम धर्म स्‍वीकारे । मुख से कलमा आपा उचारै ।।पढे नमाज जभी चितलाई । दाना पानी तब यह पाई ।।
समस्‍या तो यह है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही  नहीं पढा, जिसमें उस समय के समाज का चित्रण है। बादशाह सिकंदर लोदी के अत्‍याचार, इस्‍लाम में जबरदस्‍ती धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रिए को निम्‍न कर्म में धकेलने की ओर संकेत है। समस्‍या हिंदू समाज के अंदर है, जिन्‍हें अंग्रेजों और वामपंथियों के लिखे पर इतना भरोसा हो गया कि उन्‍होंने खुद ही अपना स्‍वाभिमान कुचल लिया और अपने ही भाईयों को अछूत बना डाला।
आज भी पढे लिखे और उच्‍च वर्ण के हिंदू जातिवादी बने हुए हैु, लेकिन वह नहीं जानते कि यदि आज यदि वह बचे हुए हैं तो अपने ऐसे ही भईयों के कारण जिन्‍होंने नीच कर्म करना तो स्‍वीकार किया, लेकिन इस्‍लाम को नहीं अपनाया। जो इस्‍लामी आक्रांतों से डर गए वह मुसलमार बन गए और जिन्‍होंने उसका प्रतिरोध किया या तो वह मारा गया या फिर निम्‍न कर्म को बाध्‍य किया गया। जो उच्‍च वर्गीय हिंदू आज हैं, उनमें से अधिकांश ने मुस्लिम बादशाहों के साथ समझौता किया, उनके मनसब बने, जागीरदार बने और अपनी व अपनी प्रजा की धर्मांतरण से रक्षा की।
 प्‍लीज अपना वास्‍तविक इतिहास पढिए, अन्‍यथा कहीं आपके बच्‍चे भी कल को किसी नए निम्‍न कर्म में न ढकेल दिए जाएं और मार्क्‍स, मसीह, मोहम्‍मद के अनुयायी कहें यह तो हिंदू समाज का दोष है। वैसे कुछ मसीह के अनुयायियों ने सच भी लिखा है। जैसे- प्रोफेसर शेरिंग ने अपनी पुस्‍तक 'हिंदू कास्‍ट एंड टाईव्‍स' में स्‍पष्‍ट रूप से लिखा है कि '' भारत के निम्‍न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि ब्राहमण और क्षत्रिय ही हैं।'' अब तो भरोसा कीजिए, क्‍योंकि आपको तो उसी पर भरोसा होता है, जिसका प्रमाण पत्र यूरोप और अमेरिका देता है। आप विवेकानंद को कहां स्‍वीकार कर रहे थे। वो तो धन्‍य है अमेरिका कि उसे विवेकानंद में प्रज्ञा दिखी और पीछे पीछे आपमें भी विवेकानंद में प्रज्ञा दिखनी शुरू हो गई। अपनी अज्ञानता समाप्‍त कीजिए, प्‍लीज....
History
Originally Hindus, and the majority still accept their Hindu ancestry. Due to the oppression caused by the caste system of India more prominent amongst the Hindus, many Chamars have converted to other religions such, mainly Sikhism, Islam, Christianity and Buddhism. Many Chamars have also joined smaller yet influential Hindu religious groups such as the Ad-Dharm Movement, Ravidasi, Arya Samaj. Others joined Deras such as Nirankari & Radhaswami.Ravidasia ChamarsSikh converts from the community working professionally in leather are usually referred to as Ravidasia Sikhs. The term Ravidasi is an adaptation from Ravidasias, as some Chamar castes came to be called.The spiritual enlightenment of Saint Guru Ravidas attracted many people toward Ravidassia sect. Saint Ravidass was one of those few saints who were directly linked to God without being stuck to false and hoaxful rites. It was due to such top-graded spiritual enlightenment of Saint Ravidass that many people became his disciples.The teachings of the Sikh gurus, with their rejection of the caste system and emphasis on ethnic equality of all human beings, appealed to them. Of special significance for them was the canonization of the hymns of Shri Guru Ravidas Ji in the Sikh Scripture. Consequently, many Chamars converted to Sikhism and were, as a class, given the respectable name of Ravidassia Chamars.Conversion of Hindu Chamars to Sikhism accelerated towards the end of the nineteenth century. This was due to the rise of the Singh Sabha movement, launched in 1873 for the restoration and propagation of Sikh teachings, including the removal of caste distinctions. The number of Chamars who declared Sikhism as their religion increased from 100,014 in 1881 to 155,717 in 1931.Meanwhile, the term Ravidasias was no longer confined to Sikh Chamars. During the census of 1931, many Hindu Chamars registered themselves as Ravidasias. Nearly 52.8 percent of all Ravidasias declared themselves Sikhs.PoliticsThe Chamar Community are one of the most involved and influential castes involved in Indian politics. The Bahujan Samaj Party (BSP), a dalit-dominated political party, is very powerful in U.P and is expanding all over India. The BSP is one of the most powerful political parties of India. It was founded by Kanshi Ram and is led today by Mayawati Kumari, a Chamar. The BSP was created and is dominated by the dalits but currently includes all castes.MilitaryThe Chamar Community has a history of military service and have their exclusive regiment in Indian army called Sikh Light Infantry. Many Chamar families are descended from Kshatriya communities, which is why they share common family names, for example Bhatti, Chauhan, Toor, Bar gujjar and a number of others. Many Chamars were recruited in British Indian Army during World War I and World War II on various ranks. Their contribution in these great wars was exemplary as mentioned in their discharge certificates. They received many medals and stars in recognition of their bravery and honest contribution in these wars after being recruited in various regiments of British India Army. The 1st Chamar Regiment was awarded the Battle Honor of Kohima for its distinguished role in the 2nd World War. The Chamar Regiment was later disbanded but Chamars still continue to display their valor in various other regiments.During World War II, the Chamar Regiment was created and was involved on the Japanese front. The Chamar Regiment was disbanded after the war. Former Pakistani Leader Ayub Khan was an officer of the Chamar Regiment.Many Chamars have played an active role in the events of 1857.

The bravery of Banke Chamar of Village Kurarpur, Distt. Jaunpur (UP) is highlighted by the historians. This revolutionary laid down his life for the country and was ordered to be hanged by the British for his role in the events of 1857.

Chetram (Jatav) and Belluram also sacrificed their life for being the moving force behind Barrackpur revolution


Social background and origins

In the context of traditional Hindu society, Dalit status has often been historically associated with occupations regarded as ritually impure, such as any occupation involving killing, handling of animal cadavers or night soil (human feces). One million Dalits work as manual scavengers, cleaning latrines and sewers by hand and clearing away dead animals. Engaging in these activities was considered to be polluting to the individual who performed them, and this pollution was considered to be 'contagious'. As a result, Dalits were commonly banned and segregated from full participation in Hindu social life (they could not enter the premises of a temple or a school and stayed outside the village), while elaborate precautions were sometimes observed to prevent incidental contact between Dalits and other Hindus.
There are an estimated 250 million Dalits in India according to Dalitnetwork.org. Most of the Dalits, are bonded workers, many working in slave-like conditions to pay off debts that were incurred generations ago. The majority of Dalits live in segregation and experience violence, murder, rape and atrocities to the scale of 110,000 registered cases a year according to 2005 statistics. No one believes these numbers are anywhere close to the reality of crimes committed against Dalits. Most crimes go unreported, and few registered cases ever get to trial.
There have been studies done to indicate no racial and genetic differences between upper and lower castes. Many sociologists, anthropologists and historians have rejected the racial origins and racial emphasis of caste and consider the idea to be one that has political undertones.
Discrimination against Dalits is not limited to the Hindu community. This situation is exacerbated by the fact that non-Hindu Dalit groups have traditionally not been recognized as Scheduled Castes under hiring quota laws. The Dalit Muslims or "Arzal", as well as Dalit Christians form an integral part of the caste system in South Asia among Muslims and Christians. Many Dalit Muslims are discriminated against by the upper-caste "Ashraf" Muslims, and Dalit Christians are discriminated against by upper caste Christian priests and nuns.
Some Dalits have successfully integrated into urban Indian society, where caste origins are less obvious and less important in public life. In rural India, caste origins are more readily apparent and Dalits remain excluded from local religious life, though this exclusion in its severity is in fact fast diminishing due to changing social norms of acceptable behavior.
Dalits and similar groups are also found in Nepal, Pakistan and Bangladesh. In addition, the Burakumin of Japan are also compared to Dalits, as are the Baekjeong of Korea. Even Dalits in the USA have suggested that discrimination exists within their ethnic community.


Dalits and religion



Hindu Dalits

The large majority of the Dalits are Hindus, although some in Maharashtra have converted to Buddhism, often called Neo-Buddhism mostly by Hindus to mark the line.


Historical attitudes and discrimination

Traditionally, Dalits were not allowed to let their shadows fall upon a non-Dalit caste member and they were required to sweep the ground where they walk to remove the 'contamination' of their footfalls. Dalits were forbidden to worship in temples or draw water from the same wells as caste Hindus, and they usually lived in segregated neighborhoods outside the main village. However, there have been cases of upper caste Hindus warming to the Dalits and Hindu priests, demoted to outcaste ranks, who continued practising the religion. An example of the latter was Dnyaneshwar, who was excommunicated into Dalit status from society in the 13th century, but continued to compose the Dnyaneshwari, a Dharmic commentary on the Bhagwad Gita. Other excommunicated Brahmins, such as Eknath, fought for the rights of untouchables during the Bhakti period. Historical examples of Dalit priests include Chokhamela in the 14th Century, who was India's first recorded Dalit poet, Raidas, born into Dalit cobblers, and others. The 15th century saint Ramananda also accepted all castes, including untouchables, into his fold. Most of these saints subscribed to the Bhakti movements in Hinduism during the medieval period that rejected casteism. Nandanar, a low-caste Hindu cleric, also rejected casteism and accepted Dalits.
Due to their isolation from the rest of the Hindu society, many Dalits continue to debate whether they are 'Hindu' or 'non-Hindu'. Traditionally, Hindu Dalits or Harijans have been barred from many activities that were seen as central to Vedic religion and Hindu practices of orthodox sects. Among Hindus each community has followed its own variation of Hinduism. The wide variety of practices and beliefs observed in Hinduism makes any clear assessment difficult. Each community, including the Dalit see their importance in the history of Hinduism. For example, Sant Tirumalisai was a Hindu saint and Vidura was the ruler of Hastinapur during the Mahabharata war.
The VHP leader Ashok Singhal has said:
The Ravi Dasis, Passis and Khatiks all have a royal lineage. They were the freedom fighters of the medieval times but were turned into scheduled castes and tribes because they were defeated.


Reform Movements

Some of the movements in Hinduism have welcomed Dalits into their fold, the earliest being the Bhakti movements of the medieval period.
In the 19th Century, the Brahmo Samaj under Ram Mohan Roy and later under Keshub Chunder Sen, actively campaigned against untouchability. The Arya Samaj founded by Swami Dayanand also renounced discrimination against Dalits. Sri Ramakrishna Paramahamsa's disciple Swami Vivekananda founded the Ramakrishna Mission that actively participated in the emancipation of Dalits. Upper caste Hindus, such as Mannathu Padmanabhan also participated in movements to abolish Untouchability against Dalits, opening his family temple for Dalits to worship.
While there always have been places for Dalits to worship, the first "upper-caste" temple to openly welcome Dalits into their fold was the Laxminarayan Temple in Wardha in the year 1928 (the move was spearheaded by reformer Jamnalal Bajaj). Also, the Satnami movement was founded by Guru Ghasidas, a Dalit himself.
Other reformers, such as Jyotirao Phule also worked for the emancipation of Dalits. Ayyankali was a prominent figure in the Dalit emancipation struggle in Kerala in the early 20th century. Another example of Dalit emancipation was the Temple Entry Proclamation issued by the last Maharaja of Travancore in the Indian state of Kerala in the year 1936. The Maharaja proclaimed that "outcastes should not be denied the consolations and the solace of the Hindu faith". Even today, the Sri Padmanabhaswamy temple that first welcomed Dalits in the state of Kerala is revered by the Dalit Hindu community.
The 1930s saw key struggles between Mahatma Gandhi and B.R. Ambedkar, most notably over whether Dalits would have separate electorates or joint electorates with reserved seats. The Indian National Congress was the only national organisation with a large Dalit following, but Gandhi failed to gain their commitment. Gandhi however, continued to spread his cause for uplifting the Dalits and began the Harijan Yatra.
Similar padyatras borrowing from Gandhi's example were established to uplift the Harijans including Vishwesha Tirtha Swamiji's Padayatras in Bangalore. The Pradeshika Harijan Sevak Sangha was Gandhi's organization aimed at working on uplifting the backward-castes. Mahatma Gandhi is well respected by the Dalits of today. (A few Dalits, such as those of Bhatra, even worship him.)
Ambedkar, a Dalit himself, developed a deeper analysis of Untouchability, but lacked a workable political strategy: his conversion to Buddhism in 1956, along with millions of followers, highlighted the failure of his political endeavours.
India's first Prime Minister, Jawaharlal Nehru, based on his own relationship with Dalit reformer Ambedkar, also spread information about the dire need to eradicate untouchability for the benefit of the Dalit community.
In more contemporary times, India has had an elected Dalit president, K. R. Narayanan, who has stated that he was well-treated in his community of largely upper-caste Hindus. Another popular Harijan includes Babaji Palwankar Baloo, who joined the Hindu Mahasabha and was both a politician and a cricketer. He was an independence fighter. In addition, other Hindu groups have reached out to the Dalit community in an effort to reconcile with them, with productive results. On August 2006, Dalit activist Namdeo Dhasal, engaged in dialogue with the Rashtriya Swayamsevak Sangh in an attempt to "bury the hatchet".
Also, the "Pandaram" Hindu priests (a task traditionally reserved for the Brahmins) based largely in Nepal and parts of South India. These Pandaram priests maintain the same tradition as the Brahmin priests, including using Sanskrit for the rituals (a language traditionally reserved for the Brahmins). They perform religious ceremonies from weddings to death rituals. They are not generally as well trained as the Brahmin priests, but are highly respected within their community and are addressed reverentially. Also, Hindu temples are increasingly more receptive to Dalit priests, such as Suryavanshi Das, the Dalit priest of a notable temple in Bihar.
Discrimination against Hindu Dalits is on a slow but steady decline. Many Hindu Dalits have achieved affluence in society, although vast millions still remain poor. Recent episodes of Caste-related violence in India have adversely affected the Dalit community. In urban India, discrimination against Dalits in the public sphere is largely disappeared, but rural Dalits are struggling to elevate themselves. Government organizations and NGO's work to emancipate them from discrimination, and many Hindu organizations have spoken in their favor.
Brahmins like Subramania Bharati also passed Brahminhood onto a Harijan. For example, in Shivaji's Maratha Empire there were the several Dalit Hindu warriors Mahar Regiment and the Scindia Dalit Kingdom. In modern there there are several Dalit Hindu figures BJP leaders Ramachandra Veerappa and Dr. Suraj Bhan.



 CHAMAR TRIBES

 History 

The Chamar tribes are usually found in Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Haryana and Maharashtra. They are also known as Chamari, Chambar Boli and Chambari. They are considered untouchables, and most of them know nothing else their entire lives. With a population of over 50 million, they are among the largest untouchables, or Dalit communities in the Hindu world. The Chamars are also known as Bhambi, Asadaru, Khalpa, Machigar, Lingayat, Mochi and Rohit. They are mostly distributed in Maharashtra, Karnataka and Gujarat.Chamars are the tanner and leather workers of north-western India and the western parts of Punjab. Chamar is the name derived from the Sanskrit word 'charmakira' which means 'worker in hides'. In the east of Punjab, they are far more than leather workers, They are the general coolies and field laborers of the villages. They do miscellaneous work such as cutting grass, carrying wood and bundles and acting as watchmen. They take the hides of all the dead cattle and the flesh of all clove-footed animals. They make and mend shoes, thongs for the cart, whips and other leather work. A share of the produce in the fields is given to them in return for the work done. The Chamars are by and large weavers in the eastern and south eastern parts of Punjab. The Chamars are by religion Hindus or Sikhs.


 Origin 

Tanning being profession of Chamars in past, they could be both from the original tribes who were living in India even before the Aryan Invasion and they were also Aryans who came from the Central Asia. Historians believe they are true Hindus. The spiritual enlightenment of Saint Guru Ravidass attaracted many people toward Ravidassia Sect. Saint Ravidass was one of those few saints who were directly linked to God witout being stuck to false and hoaxful rites. It was due to such top graded spiritual enlightenment of Saint Ravidass that many people became his disciple.


 Language  

The Chamar tribal Community speak the language of Chamari. The Chamar use the Devanagari script and speak Kannada, Gujarati and Hindi along with regional languages.

 Culture 

The Chamar are Hindus and they belong to the Shiva and Bhagvat sects. Their deities are Bahiroba, Janai, Kandova of Jejori and Bhawani of Tuljapur. They follow the spiritual teachings of Ravidass and are very much fond of reciting mythological tales and sing songs from the religious epics. They celebrate the festivals such as Diwali, Panchami, Ganesh Chaturthi, Kartik, Holi and Hannami. There is a slightly higher degree of responsiveness to the gospel among the Chamars than among other Dalits.
The Chamar practice monogamy in marriage. Dowry is largely prevalent and is paid in cash and kind. Remarriage is allowed for widowers but not for the widows. The dead body of a bachelor is buried lying on its back with the head facing the south, whereas others are cremated and their mortal remains are immersed in sacred water. Rice balls are offered to the dead and to ancestors on the tenth day after death.
Place /Location (then and now)
Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Punjab, Karnataka & Gujarat
Population
50 Million
Languages spoken
Kannad, Gujarati, Hindi & Chamari
Religion/God
Hinduism/ Bahiroba, Janai, Kandova of Jejori and Bhawani of Tuljapur
Food
Rice & Jowar

 People 

In appearance, Chamars resemble the local population and region. Chamars of Kashmir are very light-skinned, while those in Punjab look like typical Punjabis; may be very light skinned or of darker complexions".

 Occupation 

The traditional occupation of this Chamar tribe was processing, manufacturing and trading in leather and leather goods, but agriculture is another important occupation in which they engage, either as owners or as tenants who farm property on a share-cropping basis.

 Food  

The Chamars will eat food prepared by any tribe except the Khakrob, Kanjar, Sansi and Nat. Their staple cereals are rice and jowar. Men occasionally drink alcohol.

 Politics  

The Chamar Community is one of the most involved and influential castes involved in Indian politics. The Bahujan Samaj Party (BSP), a dalit-dominated political party, is very powerful in U.P and is expanding all over India. The BSP is one of the most powerful political parties of India. It was founded by Kanshi Ram and is led today by Mayawati Kumari, a Chamar. The BSP was created and is dominated by the dalits but currently includes all castes.

 Military  

The Chamar Community has a history of military service and has their exclusive regiment in Indian army called Sikh Light Infantry. Many Chamar families are descended from Kshatriya communities, which is why they share common family names, for example Bhatti, Chauhan, Toor, bar gujjar and a number of others. Many Chamars were recruited in British Indian Army during World War I and World War II on various ranks.



 Tribes in India  

Bagri tribes,Banjara tribesAhir tribesAsur tribesBodo tribesHmar tribesBhutia tribesAndamanese tribes
Khasi tribesBhil tribes, Gaddi tribesDhodia tribesAngami tribesChakmas tribeOran tribeChenchu tribe,Santhal tribeChenchu tribeJarawa tribe
Gujjar tribes,Khond tribes,Munda tribes,Naga tribesGonda tribesLalung tribesChamar tribes, Toda tribes

























  • History and origin
    The Mochi are Hindu. They are spread across entire India and are found in the states of Punjab, West Bengal, Bihar, Uttar Pradesh, Orissa, Madhya Pradesh, Jharkhand, Chhattisgarh, Maharashtra and Gujarat
    mochi word become on the "moja(sock)".because in the chmpaner(pavgadh-gujarat)many century ago mochi person kill to animal and makes sock-moja by using of animal's skin. so that after day-to-day mochi words famouse as a caste(According to tejas mochi).The Mochi of Uttar Pradesh claim to have originated in Rajasthan. Historically, the community was involved in the manufacture of protective leather dresses for soldiers, and the community are closely associated with the Rajput community. They share gotra names with the Rajput community. They have the following sub-groups, the Sinolia, Sasendia, Sonwal, and Nidaria

    Present circumstances

    The Mochi are involved in the manufacture of leather shoes for example Nike, Fila, Adidas, etc. They have Other Backward Class status in Uttar Pradesh and Scheduled Caste status in Punjab and Haryama. The Mochi are an endogamous communities, and maintain gotra exogamy. In Uttar Pradesh, the Hindu Mochi have their own deity by the name of Ramdeo Baba. The Mochi of Haryana are now followers of the Ravidasia sect, and have started to intermarry with other groups within the Chamar community
    The community have a traditional caste council, as is common among many North Indian artisan communities. This caste council acts as an instrument of social control, by punishing those who contravene community norms. Each caste council is headed by a chaudhary, a position that tends to be heredity. The Mochi live in multi-caste villages, but occupy their own distinct quarters.
    The Mochi of Haryana claim to have migrated from Rajasthan, and are found mainly in the cantonment city of Ambala. They still speak the Braj Bhasha dialect. They are strictly endogamous, and practice clan exogamy. There traditional occupation was shoe making, but with the spread of factory manufactured shoes. The majority are landless agricultural labourers, with a small minority now taking up other professions. They enjoy scheduled caste status.
    In Gujarat, the Mochi caste does not enjoy Schedule Caste in Gujarat status except Dangs district and Umargaon Taluka of Valsad district, but is categorized as Backward.In the gujarat many Mochi people live rich life and enjoyfull day.

    Mochi of Punjab

    In Punjab, the members of the Mochi caste are those involved with the working in tanned leather as opposed to a tanner, an occupation associated with the Chamar. Most Mochi are still found in rural Punjab, although there is a steady immigration to the towns and cities, as their traditional occupation is in decline. They are one of the most widespread caste in Punjab, found in almost every district. Most Mochi in Indian Punjab had converted to Islam, and these Muslim Mochis left at the time of the partition of India in 1947. The rump community is largely Hindu, although a small number are Sikh. Many Mochi have now become members of the Arya Samaj sect. The community has now been granted Scheduled Caste status, which allows it to access a number of affirmative actions programmes initiated by the Government of India.  In Gujarat many mochi family stay and many sub caste of mochi like Chauhan, Parmar, Solanki, Chaudhri, vala and many subcaste popular in gujarat The Mochi are strictly endogamous, like other Punjab Hindus strictly practice clan exogamy, as well as in some cases village exogamy as well. There clans, referred to as gotras .

    Chanvar Samrat

    । सम्राट चँवरकाल में आर्यों ने सम्राट चँवर से शरण माँगी थी । अपने मूँह से दिये गये वचनों की प्रतिबद्धता आज भी चमार जाति की पहचान है । सम्राट चँवर भी अपनी बचनबद्धता के आगे विवश थे । बस इसी बात का लाभ उठाकर आर्यों ने भिक्षाटन के बहाने सम्पूर्ण जम्बुद्वीप का भ्रमण किया । सम्पूर्ण जम्बुद्वीप का भ्रमण करके आर्यों ने जम्बु वासियों की काले रंग की शारीरिक कमजोरी पायी । काले रंग की इस शारीरिक कमजोरी के आधार पर ही आर्यों ने सम्राट चँवर के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि यदि आप या कोई जम्बुवासी हमारी स्वर्णवर्णी आर्य सुन्दरियों से विवाह कर ले तो उसकी भविष्यागामी सन्तानों के शारीरिँक रंगो मेँ सुधार हो जायेगा । आर्यों का यह प्रस्ताव आँनुवांशिकी सिद्धान्त के आधार पर पूर्णतः वैज्ञानिक था । जो सम्राट चँवर को अच्छा लगा और उन्होंने आर्यों के इस प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति दे दी । फिर क्या था आर्यों ने सम्राट चँवर के समक्ष अपनी तीन शर्तें रख दी ।
    1- जो भी जम्बुवासी आर्य युवति से विवाह करेगा वह विवाह से पूर्व ही अपनी कुल सम्पत्ती का बीँसवाँ भाग आर्य समुदाय को दान करेगा ।
    2- प्रत्येक आर्ययुवति केवल स्वयंवर के माध्यम से ही जम्बुवासी पुरूष से विवाह करेगी स्वयंवर की शर्ते अलग से होंगी ।
    3- आर्यनारि से उत्पन्न बड़ा पुत्र ही अपने पिता की कुल चल-अचल सम्पत्ती का एकमात्र उत्तराधिकारी होगा ।
    सम्राट चँवर ने आर्यों की इन तीनों शर्तों के पीछे छिपे षड्यन्त्रों को बिना समझे ही स्वाकार लिया बस यहीं से चँवर साम्राज का पतन होना आरम्भ हो गया था ।
    यदि आप आर्यों की उक्त तीनों शर्तों के पीछे छुपे षड्यन्त्रों को पूर्णतः समझ गये हों तो कृपया बताईऐ कि वे षड्यन्त्र क्या-क्या थे और उनके क्या-क्या दुष्परिणाम निकले ?


                          Jatav Chamars
    Chamars however are placed at the lowest end of the social hierarchy. They are denied respect and access to resources like education, land and water. For historians the history of Chamars is not significant because their labour and scientific pursuit is never treated as dignified. Yet the community has an interesting history.



    It was the time during the rule of early Mughals in 15th century Agra, also known as the leather capital, the Chamars had began an interesting journey.



    Emperor Babur was the founder of the Mughal Empire in India. However, his son Humayun, lost to dreams and opium, was not a worthy successor. To make matters worse, he had inherited a fractious kingdom and was forced to engage in battle. Sher Khan, a rebellious Afghan chieftain was soon to oust Humayun to become Emperor Sher Shah Suri founding the short-lived Sur dynasty. He led his soldiers to victory against the Mughals. Hunmayun barely escaped with his life, almost drowning in a river nearby. A bhisti, a low caste water carrier, rescued him and ferried the emperor to safety on an inflated buffalo skin. In a typical expression of gratitude, Humayun made him king for a day. The bhisti invited fellow leather workers from all over to participate in his good fortune, establishing the foundation for Agra's considerable low caste population and its famous leather industry.



    However, Agra's leather industry received its main impetus during the time of Emperor Akbar, who decreed that his soldiers wear shoes. Till that time the Mughal army had fought barefoot. Shoe-makers were summoned from all over the empire and work began to produce hundreds of thousands of pairs per year. Besides the hard-wearing leather jootis with slightly turned up toes for the soldiers, there were also a huge demand for more delicate versions for nobles, their ladies and vast entourages. Besides shoes were the Mughal shields which at least for the common soldiers, were made of leather.



    In the British period the Agra Chamars (known as Jatavs) were the first to enter the manufacture of leather goods. Many became millionaires by supplying shoes and belts to the British army during World War II. That continued after independence aswell. But by the 1970s, non-Dalit traders entered the field. They acquired army tenders and began to fabricate leather goods, forcing many Jatav families out of business.


    मनुवादियों के अत्याचार से परेशान होकर 80,000धानक मुसलमान बन गये थे

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